सुभाष रतूड़ी:-
नये कानून की मुखालफत वाले लोग भारी भरकम चालान के कड़वे सच व सरकारी मंशा को लेकर अनभिज्ञ हैं, पढें..आंखें खोलने वाला लेख..
सुभाष
रतूड़ी :
देश
में नया मोटर वाहन अधिनियम-2019 के लागू होने से सोशल मीडिया के विभिन्न
प्लेटफॉर्म्स पर तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं देखने-पढने को मिल रही है। ऐसे बहुत कम
लोग दिखाई दे रहे हैं जो इस कानून की सराहना कर रहे हैं। यातायात नियमों के
उल्लंघन पर भारी भरकम चालान की राशि अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियां बनीं हुई
है। चालान की राशि 10 गुना बढाये जाने पर सरकार की भी खूब खिंचाई हो रही है। कुछ
तो यहां तक कह रहे हैं कि सरकार ने अपना खजाना बढ़ाने के लिये ही इस नये कानून को
बनाया। कुछ लोग क्रोधित होने पर या फिर मजे लेने के लिये सामने वाले या फिर दुश्मन
के लिये ‘तेरा चालान कट जाए’ की बददुआ या गालियां दे रहे हैं। इस तरह
की तमाम प्रतिक्रियाओं और चर्चाओं के बीच इस नये कानून की मुखालफत करने वाले अधिकतर
लोग संभवत: भारी भरकम चालान के पीछे छिपे कड़वे सच और
सरकार की गंभीर मंशा को लेकर अनभिज्ञ हैं या उन्होंने इसे समझने की कभी ईमानदार
कोशिशें नहीं की। इस कानून पर सबसे बेहतर और ईमानदार प्रतिक्रिया कोई विशेषज्ञ या
सड़क हादसे से प्रभावित ऐसा कोई निर्दोष व्यक्ति ही दे सकता है, जिसने इस हादसे
में किसी अपने को गंवाया हो या फिर आजीवन अपंगता का शिकार हो गया हो। आगे का यह
लेख, इस संबंध में हर किसी की आंखे खोलने वाला है।
नये
कानून के संबंध में सरकार ने भी साफ किया कि देश में सड़क हादसों में कमी लाने के
उद्देश्य से ही इसे लाया गया है। वास्तव में भारत में सड़क हादसों की रफ्तार काबू
से बाहर है और यह जिस तेजी के साथ बढ़ी है, उस पर किसी कठोर कानून से ही ब्रेक
लगाना एकमात्र उपाय दिखता है। समय-समय पर मोटर व्हीकल एक्ट में अब तक कई संशोधन
किये जा चुके हैं लेकिन अपवाद को छोड़कर इसमें कठोरतम दंड का प्रावधान अभी तक नहीं
किया गया। यह भी तब, जबकि भारत में औसतन डेढ़ लाख लोग प्रतिवर्ष सड़क हादसों में
जान गंवा देते है और लाखों लोग स्थाई या अस्थाई विकलांगता का शिकार हो जाते है। इन
सबके बावजूद भी सड़क हादसों के लिये दोषी व्यक्ति को जुर्माने, मामूली सजा या फिर
उसके परिवहन संबंधी जरूरी दस्तावेजों (डीएल, आरसी आदि) को रद्द करने के साथ ही
रिहा कर दिया जाता है। सड़क परिवहन संबंधी हल्के अपराधों में तो मामूली आर्थिक दंड
लेकर दोषियों को तत्काल मौके पर ही छोड़ने का प्रावधान काफी पुराना है। ऐसे अपराध तो
हर दूसरे-तीसरे वाहन चालक या मालिक की फितरत सी बन गयी थी। इन अपराधों में हेलमेट
और सीट बेल्ट न पहनना, ओवर स्पाडिंग, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बातचीत, ड्रंकन
ड्राइविंग, ओवर लोडिंग जैसे कई अपराध शामिल है। सरकार समेत हर रोड यूजर्स भलिभांति
जानता है कि ये सभी अपराध किसी भी पल जानलेवा बन सकते हैं लेकिन इसके बावजूद भी हर
कोई इनकी अनदेखी करता रहा और सड़क पर मौत का कहर बरपता रहा।
यातायात
नियमों के पालन को लेकर हम भारतीय लोग सबसे ज्यादा उदासीन हैं। अधिकतर लोग इस सच
को देर से स्वीकार करते या समझते हैं कि सड़क संबंधी हर कानून वाहन चालक और रोड़
यूजर्स की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये बनाया गया है। नियमों के उल्लंघन को
वह सुरक्षा के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सरकारी कोष को बढ़ाने वाले नजरिये से देखता
है। कमोबेश इसके लिये हमारा सिस्टम भी बहुत ज्यादा दोषी है। नियम-कानूनो के उल्लघंन
पर पुलिस या परिवहन विभाग द्वारा दोषी का चालान काटने या उसके खिलाफ केस बनाने के
बजाए अवैध पैसे लेकर मामले को खत्म करने की परंपरा ने भी रोड यूजर्स को लापरवाह
बनाने का काम किया है। परिवहन विभाग का भ्रष्टाचार जग-जाहिर है। कुछ वर्षों पहले
आयी ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट ने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी में डूबी
पुलिस समेत भारतीय परिवहन और संबंधित तंत्र का जो चेहरा उजागर किया, वह चौंकाने
वाला था। इस रिपोर्ट के मुताबिक परिवहन विभाग और यातायात पुलिस को भारतीय ट्रकिंग
इंडस्ट्री से प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये रिश्वत के रूप में मिलते है। ट्रकों की
फिटनेस, परमिट, बॉडी डायमेंशनल, ओवरलोडिंग, डीएल, आरसी के नाम पर समेत दूसरे राज्य
में प्रवेश के वक्त पड़ने वाले टोल-नाका व हर सड़क पर ट्रकर्स द्वारा भारी-भरकम
रिश्वत ऑफर की जाती है। जाहिर सी बात है कि यह रिश्वत नियम-कानूनों की शर्त को
पूरा न करने के ऐवज में दी जाती है। यह भी चौंकाने वाला तथ्य है कि राजमार्गों पर
होने वाले अधिकतर सड़क हादसों के लिये ट्रकर्स ही दोषी पाये जाते हैं।
सड़क
दुर्घटनाओं के मामले में भारत की स्थिति काफी चिंताजनक है। केंद्रीय सड़क परिवहन
एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय द्वारा पिछले साल जुलाई 2018 में कैलेंडर वर्ष
2017 के लिये सड़क दुर्घटनाओं के जो आंकड़े पेश किये, वह काफी भयावह हैं। इस
रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में देश में कुल 4,64,910 सड़क दुर्घटनाएं हुई, जिसमें
1,47,913 लोगों की मौतें हुईं और 4,70,975 लोग घायल हुए। कई लोग स्थाई तौर पर
हमेशा के लिये काम करने के अयोग्य हो गये। इन हादसों में मरने वाले सबसे ज्यादा 72
प्रतिशत लोग देश के यंग एडल्ट (18-45 आयु वर्ग) वाले थे। सबसे ज्यादा मौतें
दो-पहिया वाहन चालकों (33.9 फीसदी) की हुई। कानूनों के उल्लंघन से हुई सभी मौतों
में ओवर स्पीडिंग (70 प्रतिशत) दुर्घटना का सबसे बड़ा कारण रही, जिसके कारण 66.7
प्रतिशत मौतें हुईं। अन्य कानूनों का भी जमकर उल्लंघन हुआ और कई लोग अकाल मौत के
मुंह में समा गये। यह भी चौंकाने वाली बात है कि सड़क हादसों के इन मामलों में
10.4 प्रतिशत केस बिना वैलेड लाइसेंस वाले मिले। तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक,
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सबसे ज्यादा सड़क हादसे वाले टॉप पांच राज्यों में
शामिल रहे।
केंद्रीय
परवहन मंत्रालय के मुताबिक देश में वर्ष 1970 में सड़कों पर 1,14,100 हादसे, 1980
में 1,53,200 हादसे, 1990 में 2,82,600 हादसे दर्ज किये गये। वर्ष 2001 और इसके
बाद सड़क हादसों में तेज बढ़ोत्तरी देखने को मिली और आंकड़ा सालाना 4 लाख के ऊपर
पहुंचा। इसी अनुपात में हादसों के कारण मौतों की संख्या भी बढ़ती चली गयी। सडक
नेटवर्क और वाहनों की संख्या जिस तेजी के साथ बढ़ी उसी अनुपात में दुर्घटनाएं का
ग्राफ भी बढ़ता चला गया। रोड यूजर्स की लापरवाही भी इसी तेजी के साथ बढ़ती चली
गयी। मार्च 2016 में देश का कुल सड़क नेटवर्क 56 लाख किमी आंका गया जबकि इसी समय
में देश में रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या 230 मिलियन रही। जिसमें लगभग 10 फीसदी की
सालाना बढ़ोत्तरी का आंकलन किया गया। देश के पूरे सड़क नेटवर्क में राष्ट्रीय
राजमार्ग की हिस्सेदारी आज भी महज 2 फीसदी के आसपास है, जिस पर रिकार्ड 30.4
प्रतिशत सड़क हादसे और 36 फीसदी मौतें दर्ज की गयी। सड़का हादसों का ट्रेंड बताता
है कि इसके लिये वाहन चालक की लापरवाही और कानूनों का उल्लघंन सबसे बड़ा कारण है।
यह आंकड़ा भी इसकी बानगी है कि रिपोर्टिंग वर्ष (2017) में लगभग 3 लाख सड़क हादसे
केवल स्ट्रेट रोड़ (सीधी सड़कों) पर हुए, जिसमें सबसे ज्यादा 64.2 फीसदी लोग मारे
गये। जबकि घुमाव और मोड़दार सड़कों पर 11.6 प्रतिशत और निर्माणाधीन सड़कों पर
11.80 फीसदी सड़क हादसे हुए। ओवर स्पाडिंग के कारण सबसे ज्यादा मौतों के साथ ये
सभी आंकड़े सड़क पर मानवीय लापरवाही और नियम-कानूनों के घोर उल्लंघन के गवाह है।
सभी
जानते हैं कि सड़क पर नियम-कानूनों का पालन न करना मौत को दावत देना है। इन मौतों
से होने वाले सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत नुकसान का आंकलन सरकार समेत हर व्यक्ति
के लिये काफी मुश्किल है। ये हादसे काफी डरावने, चौंकाने, दिल दहलाने और गंभीर
चिंता को उजागर करने वाले हैं। इन्हें रोड टेरर नाम भी दिया जा सकता है। हमारे देश
में सड़क दुर्घटनाओं में बेवजह मरने वाले लोगों की संख्या राष्ट्र की सुरक्षा के
लिये देश की सरहदों पर शहीद होने वाले सैनिकों से भी कई ज्यादा हैं। यह संख्या
आतंकवादी घटनाओं में मारे जाने वाले लोगों से भी अधिक है। सड़क हादसों में जान
गंवाने वालों की संख्या किसी तरह के एक गंभीर रोग से मरने और प्रभावित होने वालों
की संख्या से भी अधिक है। यह सब तब है, जबकि सरकार समेत तमाम संस्थानों और संगठनों
द्वारा रोड सैफ्टी को लेकर कई तरह की मुहिम वर्षों से चलाई जा रही है। परिवहन
मंत्रालय समेत तमाम विभागों और पुलिस द्वारा भी समय-समय पर सड़क सुरक्षा को लेकर
कई तरह के जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जाते रहते हैं। लेकिन हादसों की यह
रफ्तार थमने या कम होने का नाम नहीं ले रही है, जो सरकार की सबसे बड़ी चिंता है।
और यह चिंता हर नागरिक की भी होनी चाहिये, क्योंकि यह उसके जीवन का मामला है।
यद्यपि मौत जीवन का अटल सच है लेकिन अकाल मौत इस सच पर सवाल उठाने और इसे छोटा या
झूठा साबित करने का काम करती है। यह प्रकृति को चुनौती देने और हिंसा को बढ़ाने
वाला जैसा है। इसलिये इन हादसों को यदि सड़क पर होने वाले ‘बेफजूल आतंक’ की संज्ञा दी जाये तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सड़क
पर अनियोजित हादसों के आतंक से बचाव का एकमात्र तरीका ट्रैफिक रूल्स को फॉलो करना
है। यह अपनी जान और दूसरे की जान बचाने के लिये जरूरी है। सड़क हादसों के कारण
भारत जिस सामाजिक, आर्थिक समेत विभिन्न तरह की संपत्ति को खो चुका है अथवा खो रहा,
उसकी भरपाई चालान के रूप में लिये जाने वाले नये बढ़े अर्थदंड से कभी नहीं हो
सकेगी। नया कानून और नया चालान हर किसी को सड़क पर नियमों के पालन को मजबूर करता
है, भले इसके पीछे भारी भरकम अर्थदंड की विवशता हो। किसी के जीवन का परमानेंट ‘चालान’
कटने की कीमत पैसों से चुकता होने वाले चालान से कई कीमती होता है, क्योंकि जीवन
का चालान कभी पैसों से चुकता नहीं होता। हमें यह समझना होगा कि सड़क पर जीवन बचाने
के लिये दंड के तौर जितना बड़ा चालान भी कटे, वह हमेशा छोटा ही होगा। निर्दोष का
चालान कटे तो सरकार को जरूर कौसें। लेकिन सरकार को कौसने से पहले खुद को ट्रैफिक
संबंधी कानून की तुला पर जरूर तौलें। इसलिये हर तरह के चालान से बचाव के लिये
ट्रैफिक रूल्स को जरूर फॉलो करें।
