
रोज की तरह सुबह ९–१० बजे के बीच दिल्ली मेट्रो में मेरा वह एक रूटीन सफर था,सामान्यत: सुबह १० बजे तक ऑफिस पहुँचने के
लिए. इस समय मेट्रो अक्सर आफिस जाने वाले लोगों से भरी होती है. ऑफिस की जल्दी के
कारण न चाहते हुए भी मै भी इस भीड़ भरी मेट्रो में चढ़ गया. मेट्रो कोच की सीट में
बैठे लोगों के अलावा काफी लोग बीच में तीन पंक्तिनुमा लाइनों में खड़े थे. मैं भी
थोडा स्पेस देखकर बीच वाली पंक्ति में खड़ा हो गया. दो-तीन स्टेशनों के बाद मैंने नोटिस
किया कि मेरे सामने की सीट की ओर से किसी बच्चे की बुदबुदाने की आवाज आ रही है.
बच्चे की वह आवाज और उसकी भाषा साफ़ नहीं थी. भीड़ होने की वजह से मै उसे देख नहीं
पा रहा था, सिर्फ उसके कुछ अस्पष्ट शब्द (येयेयेये, येयेयेये...) सुनाई दे रहे थे.
हाँ, उसके पापा उसे प्यार से ये सब नहीं करने को कह रहे थे. उसके पापा बच्चे से – “नहीं
बेटा, नहीं बेटा, शांत बैठो प्लीज”...कहे जा रहे थे. मेरी तरह लगभग सब लोगों की
निगाहें उस बच्चे के ओर लगी थी, लेकिन भीड़ की वजह से मेरी तरह ही कुछ लोग उसे नहीं
देख पा रहे थे. तीन – चार स्टेशन के बाद
मेरे सामने खड़े दो लोग मेट्रो से उतरने के लिए दरवाजे की ओर चल पड़े. अब मुझे सीट
के सापेक्ष वाली बनी स्टेंडिंग लाइन में खड़े होने की जगह मिल गयी थी. अब मै देख पा
रहा था कि वह बच्चा लगातार वही आवाज निकाल रहा है और अपने सामने खड़ी एक लड़की की ओर
अपनी अस्पष्ट आवाज के साथ साथ अपना दायाँ हाथ भी लगातार उस लड़की की ओर उठा रहा था.
बच्चे की इस अदा पर वह लड़की लगातार मुस्करा रही थी और ऐसा करके शायद वह बच्चे का
ध्यान भी अपनी ओर खीचने की कोशिश कर रही थी. इतना साफ़ था कि वह लड़की बच्चे की इस “मासूम”
अदा से बिल्कुल नाराज नहीं थी. बच्चा अपने पिता की गोद में बैठे हुए लगातार हाथ
उठाते हुए वही शब्द और तरीका दोहरा रहा था.
पिता द्वारा कई बार बहलाने के बाद भी जब बच्चे ने अपनी “हरकत” बंद नहीं की तो बगल
में बैठी उसकी माँ बच्चे पर अचानक झल्ला उठी. बच्चे की माँ न अपना हाथ उठाते हुए बच्चे
को मारने का इशारा करते और जोर से डांटते हुए कहा “अब चुप, यदि अब चुपचाप नहीं
बैठा तो पुलिस को बुला लूंगी, मेट्रो से बाहर फैंक दूंगी”. माँ के गुस्से - डांट
और पुलिस के भय से वह बच्चा सकपकाते हुए अपने पापा की छाती से चिपट गया था. अब
बच्चा भयभीत था और पूरी तरह खामोश भी.
मैंने देखा कि वह
काफी कमजोर बच्चा था. उसके हाथ भी बहुत पतले थे. सर का पिछले वाला हिस्सा पूरी तरह
सपाट था. अत्यधिक कमजोरी के कारण मै उसकी सही उम्र का अंदाज नहीं लगा सका फिर भी
वह कुछ ८-९ साल का लगता था. पूछने पर, उसके पापा अपने बगल में बैठे बुजुर्ग को बता
रहे थे कि बच्चा बचपन से ही कुछ ऐसा है. ठीक से चल भी नहीं हो पाता और बड़ी मुश्किल,
बड़ी देर बाद ही अपनी कोई बात कह पाता है. क्या करें, इसके साथ बहुत परेशानी है.
बच्चे के प्रति मेरे मन में सहानभूति के साथ जिज्ञासा भी जग उठी थी. उसे देखकर मुझे
अपने पड़ोस में ३-४ साल पहले रहने वाला ऐसा ही बच्चा याद आया. उस बच्चे का नाम
दिब्यांश था, जो बाहरी तौर पर इस बच्चे के उलट दिखने में तो स्मार्ट और हेल्दी था
लेकिन वह भी न तो ढंग से कुछ बोल पाता था और ना ही चल पाता था. मेट्रो में सफर कर
रहा यह बच्चा शारीरिक तौर पर देखने में
दिब्यांश से काफी कमजोर और अलग था. २ – ३ साल पहले मैंने किसी पत्रिका (शायद
इंडिया टुडे) में इस तरह के बच्चों के बारे में एक आर्टिकल पढ़ा था. इस आर्टिकल में
इस तरह के बच्चों के बारे में विस्तार से एक बड़ा लेख छपा था, जिसमे ऐसे बच्चों की परेशानियों,
परवरिश, बीमारी के कारणों आदि के बारे में लिखा था. तब मैंने उस आर्टिकल का प्रिंट
आउट लिया था. घर जाकर मैंने यह प्रिंट आउट मल्ली (मेरे पत्नी का घरेलु व प्यार का
नाम) को देते हुए कहा कि वह इसे बगल में रहने वाले उस बच्चे की माँ को दे दे, शायद
उनके कुछ काम आ जाए. हालांकि मुझे कुछ दिन बाद पूछने पर पता चला कि मल्ली ने वह
आर्टिकल उस बच्चे की माँ को नहीं दिया. खुद एक माँ होने के नाते मल्ली ने इसके
पीछे जो तर्क दिये थे, वो मुझे भी उन परिस्थियों में ठीक लगे थे. हाल ही में मुझे
यह जानकार भी बड़ा दुःख हुआ कि दिब्यांश के माँ-पिता का तलाक हो गया है. उसकी माँ
ने किसी ओर शख्स से शादी कर ली और दिब्यांश अब उसके पिता के पास रहता है. यह
स्थिति भी दिब्यांश की एक और बदनसीबी कही जा सकती है.
बहरहाल, उस आर्टिकल
को पढ़ने के बाद मुझे पहली बार इस तरह के बच्चों – लोगों के बारे में जानकारी मिली.
तब मै पहली बार यह समझ पाया था कि इंसानों की इस समस्या को ऑटिज्म (स्वलीनता) कहते
है. सामान्य शब्दों में कहा जाए तो ऑटिज्म (Autism) एक तरह का मानसिक विकार, मानसिक विकलांगता या मंदबुद्धि की ही तरह का एक
रोग है. भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऑटिज्म से ग्रस्त लोगों की संख्या लाखों में
है. इस बीमारी को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (ASD) के नाम से भी जाना
जाता है. अपवाद स्वरुप कुछ
मामलों में इससे ग्रस्त लोगों को प्रतिभाशाली भी माना जाता है. अधिकतर मामलों में यह माना जाता है
कि यह एक आनुवांशिक (Heredity or Genetic) बीमारी है जो किसी भी जनरेशन में सामने आ सकती. जबकि कुछ मामलों में यह गर्भावस्था
के दौरान गलत खान-पान के कारण भी हो सकती है. इससे ग्रस्त लोगों के लिए इसे
दुर्भाग्य ही माना जायेगा कि इस बामारी का अभी तक कोई सटीक ईलाज मेडिकल साइंस उपलब्ध
नहीं करा पाया है. यह बीमारी अभी भी लाईलाज है. इससे ग्रस्त लोगों का असामान्य
ब्यवहार इसे और गंभीर बना सकता है. इसलिए इसमें ब्यावारिक शिक्षा या सूझबूझ से ही सुधार
लाया जा सकता है. इससे ग्रस्त किसी बच्चे को प्यार – दुलार और खेल-कूद जैसी
एक्टिविटीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया में
ऑटिज्म से ग्रस्त लगभग ८० फीसदी से अधिक लोग बेरोजगार हैं. दूसरे शब्दों में कहें
तो ऑटिज्म की बीमारी दिब्यांगों (विकलांगों) अथवा डिफ्रेंटली एब्ल्ड लोगों की
तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण या परेशानियों वाली है. इसलिए इसमें स्पेशल केयर की
अधिक जरूरत महसूस होती है. मनोवैज्ञानिक तौर पर माता-पिता अथवा करीबियों से ऐसे
बच्चे स्पेशल केयर की अपेक्षा ज्यादा रखते है. ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चों को प्यार
और सहानुभूती की ज्यादा जरूरत होती है.
ऑटिज्म से ग्रस्त
मेट्रो में बैठे इस बच्चे को मै लगातार देख रहा था, उसे पढ़ने की कोशिश कर रहा था. मेट्रो
की ही तरह मन में भी कई तरह के भाव चलायमान व अस्थिर थे, स्टेशनों की तरह मेरे भाव
भी लगातार बदल रहे थे. बच्चा अभी भी अपने पिता की छाती की तरफ मुँह करके चिपटा था
और गोद में डरा - सहमा सा बैठा था. मै मन ही मन बच्चे की इस स्थिर स्थिति को बदलने
और उसके कुछ शरारत करने की कामना कर रहा था. हुआ भी ठीक ऐसा, कुछ डेरा बाद बच्चे
ने अपने पापा की छाती से मुँह थोड़ा बायीं ओर घुमाया, धीरे से अपनी आँखे खोली और
चुपके से बगल में बैठी अपनी माँ की तरफ देखा. बच्चे की इस हरकत पर उसके पापा प्यार
से उसका सर सहलाने लगे. वह बच्चे को दुलार रहे थे. बच्चे ने झुकी नजरों से अपनी
माँ की तरफ देखा. उसकी माँ उसके बगल में बैठी सो रही थी. फिर बच्चे ने अपना सर
उठाया और अपने पापा की तरफ देखने लगा. इस बार बच्चे के चेहरे पर निश्चिन्तता के
भाव थे. उसके पापा ने भी बच्चे के गाल प्यार से थपथपाए और मुस्कराते हुए एक पप्पी
दी. बच्चे ने कुछ कहने के लिए अपने पापा के कानो तक अपना मुँह उठाया. उसके पापा शायद
समझ गए थे. उन्होंने भी मुस्कराते हुए अपना सर हिलाकर बच्चे को जैसे बोलने के लिए
प्रेरति किया. बच्चा बोला “पा..पा.., पु...इस तो नी आयेगी न”? बच्चे का यह सवाल
सुन सभी लोग मुस्कराने लगे. उसके पापा ने प्यार से मुस्करा कर कहा, “नहीं बेटा,
पुलिस नहीं आयेगी”. बच्चे ने फिर माँ की ओर देखा. बच्चे के चेहरे पर खुशी के भाव
थे, उसकी माँ अब भी सो रही थी. इस बीच मेट्रों में मेरा गंतब्य स्टेशन आने की घोषण
हो गयी. बीते गुरुवार को जनकपुरी वेस्ट से बाराखम्बा रोड तक का लगभग ४० मिनट का
मेरा यह रूटीन सफर उस दिन बिल्कुल भी बोरिंग नहीं लगा.
By Subhash Raturi, 09th May 2016