Thursday, May 12, 2016

सोबती, एक ट्रक ड्राइवर से मशहूर लेखक बनने का रोचक सफर



वर्तमान समय में लुधियाना में रहने वाले इशेर सिंह सोबती को बचपन से लेखन का शौक था लेकिन भारत-पाक विभाजन की घटना ने उनके एक अच्छे लेखक बनने के सपने को तब चकनाचूर कर दिया.
विभाजन के समय सोबती सिंध (पकिस्तान) छोडकर भारत चले आये. उन्हें यहाँ अपने जीवन की शुरुवात एक ट्रक ड्राइवर के रूप में करनी पडी. यहाँ लंबे समय तक वह ट्रक चलाकर अपनी पेट की भूख को तो शांत करते रहे लेकिन उनके लेखन की भूख कभी शांत नहीं हुई. ट्रक चलाते हुए भी जब-तब, जहाँ-तहां,जो देखा और जिया उसे वो लिखते रहे. कथा-कहानियों की ही तरह, इस ट्रक ड्राइवर के जीवन में भी कई पडाव आये. ट्रक ड्राईवरी के बाद उन्होंने एक फ्लोर मिल कर्मचारी के रूप में भी काम किया जो बाद में एक कुशल किसान बनने के सफर तक जा पहुंचा. आज सोबती ९५ वर्ष के हैं. उम्र की इस ढलान पर अब सोबती के जीवन में भी किसी उपन्यास के अच्छे क्लाइमेक्स की ही तरह वह सुखद समय आया जिसकी कल्पना उन्होंने अपनी लिखी कहानियों में तो कम से कम कभी नहीं की थी. सोबती को कुछ माह पहले ही ताइवान में वर्ल्ड अकेडमी आफ आर्ट्स एंड कल्चर द्वारा आयोजित वर्ल्ड काँग्रेस ऑफ पोएट्स में साहित्य से सबसे बड़े सम्मान डॉक्टर आफ लिटरेचर (डीलिट) की उपाधि से नवाजा गया.
लुधियाना में बतौर किसानी काम करने वाले इशेर सिंह सोबती का लेखन का काम किसान बनने के बाद भी जारी रहा. बचपन से लिखने का शौक रखने वाले सोबती अब तक कई किताबें लिख चुके हैं. “अनोखे फूल” उनका पहला उपन्यास था. अनोखे फूल लिखने के बाद जीवन संघर्ष के चलते वह लंबे समय तक लिख नहीं सके. भारत में उनकी पहली किताब कहानी संग्रह नेकीके रूप में काफी लंबे समय के बाद 1989 में आयी. उसके बाद उन्होंने कई सारी किताबे लिखी जिनमे पूरब ते पच्छम”,  भारत पाक बंटवारे पर सच्ची कहानी बंटवारे की”, “अमनआदि है. वर्ष 2006 में उन्हें उनकी पंजाबी पोएट्री खायालें दे वेहाँको राज्य सरकार ने सम्मानित किया. यह किताब दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में रिलीज की गयी थी जिसे संस्था ने डीलिट के लिए भेजा और पिछले साल ५ नवम्बर को उन्हें साहित्य की इस बड़ी मानद उपाधि से सम्मानित किया गया. इसके अलावा उनकी कई किताबों में बतौर ट्रक ड्राइवर के अनुभव भी कहानियों के रूप में हैं. 

By Subhash Raturi, 13th May 2016

Sunday, May 8, 2016

ऑटिज्म मांगे सहानुभूति और प्यार



रोज की तरह सुबह ९–१० बजे के बीच दिल्ली मेट्रो में मेरा वह एक रूटीन सफर था,सामान्यत: सुबह १० बजे तक ऑफिस पहुँचने के लिए. इस समय मेट्रो अक्सर आफिस जाने वाले लोगों से भरी होती है. ऑफिस की जल्दी के कारण न चाहते हुए भी मै भी इस भीड़ भरी मेट्रो में चढ़ गया. मेट्रो कोच की सीट में बैठे लोगों के अलावा काफी लोग बीच में तीन पंक्तिनुमा लाइनों में खड़े थे. मैं भी थोडा स्पेस देखकर बीच वाली पंक्ति में खड़ा हो गया. दो-तीन स्टेशनों के बाद मैंने नोटिस किया कि मेरे सामने की सीट की ओर से किसी बच्चे की बुदबुदाने की आवाज आ रही है. बच्चे की वह आवाज और उसकी भाषा साफ़ नहीं थी. भीड़ होने की वजह से मै उसे देख नहीं पा रहा था, सिर्फ उसके कुछ अस्पष्ट शब्द (येयेयेये, येयेयेये...) सुनाई दे रहे थे. हाँ, उसके पापा उसे प्यार से ये सब नहीं करने को कह रहे थे. उसके पापा बच्चे से – “नहीं बेटा, नहीं बेटा, शांत बैठो प्लीज”...कहे जा रहे थे. मेरी तरह लगभग सब लोगों की निगाहें उस बच्चे के ओर लगी थी, लेकिन भीड़ की वजह से मेरी तरह ही कुछ लोग उसे नहीं देख पा रहे थे.  तीन – चार स्टेशन के बाद मेरे सामने खड़े दो लोग मेट्रो से उतरने के लिए दरवाजे की ओर चल पड़े. अब मुझे सीट के सापेक्ष वाली बनी स्टेंडिंग लाइन में खड़े होने की जगह मिल गयी थी. अब मै देख पा रहा था कि वह बच्चा लगातार वही आवाज निकाल रहा है और अपने सामने खड़ी एक लड़की की ओर अपनी अस्पष्ट आवाज के साथ साथ अपना दायाँ हाथ भी लगातार उस लड़की की ओर उठा रहा था. बच्चे की इस अदा पर वह लड़की लगातार मुस्करा रही थी और ऐसा करके शायद वह बच्चे का ध्यान भी अपनी ओर खीचने की कोशिश कर रही थी. इतना साफ़ था कि वह लड़की बच्चे की इस “मासूम” अदा से बिल्कुल नाराज नहीं थी. बच्चा अपने पिता की गोद में बैठे हुए लगातार हाथ उठाते हुए  वही शब्द और तरीका दोहरा रहा था. पिता द्वारा कई बार बहलाने के बाद भी जब बच्चे ने अपनी “हरकत” बंद नहीं की तो बगल में बैठी उसकी माँ बच्चे पर अचानक झल्ला उठी. बच्चे की माँ न अपना हाथ उठाते हुए बच्चे को मारने का इशारा करते और जोर से डांटते हुए कहा “अब चुप, यदि अब चुपचाप नहीं बैठा तो पुलिस को बुला लूंगी, मेट्रो से बाहर फैंक दूंगी”. माँ के गुस्से - डांट और पुलिस के भय से वह बच्चा सकपकाते हुए अपने पापा की छाती से चिपट गया था. अब बच्चा भयभीत था और पूरी तरह खामोश भी.
मैंने देखा कि वह काफी कमजोर बच्चा था. उसके हाथ भी बहुत पतले थे. सर का पिछले वाला हिस्सा पूरी तरह सपाट था. अत्यधिक कमजोरी के कारण मै उसकी सही उम्र का अंदाज नहीं लगा सका फिर भी वह कुछ ८-९ साल का लगता था. पूछने पर, उसके पापा अपने बगल में बैठे बुजुर्ग को बता रहे थे कि बच्चा बचपन से ही कुछ ऐसा है. ठीक से चल भी नहीं हो पाता और बड़ी मुश्किल, बड़ी देर बाद ही अपनी कोई बात कह पाता है. क्या करें, इसके साथ बहुत परेशानी है. बच्चे के प्रति मेरे मन में सहानभूति के साथ जिज्ञासा भी जग उठी थी. उसे देखकर मुझे अपने पड़ोस में ३-४ साल पहले रहने वाला ऐसा ही बच्चा याद आया. उस बच्चे का नाम दिब्यांश था, जो बाहरी तौर पर इस बच्चे के उलट दिखने में तो स्मार्ट और हेल्दी था लेकिन वह भी न तो ढंग से कुछ बोल पाता था और ना ही चल पाता था. मेट्रो में सफर कर रहा यह बच्चा  शारीरिक तौर पर देखने में दिब्यांश से काफी कमजोर और अलग था. २ – ३ साल पहले मैंने किसी पत्रिका (शायद इंडिया टुडे) में इस तरह के बच्चों के बारे में एक आर्टिकल पढ़ा था. इस आर्टिकल में इस तरह के बच्चों के बारे में विस्तार से एक बड़ा लेख छपा था, जिसमे ऐसे बच्चों की परेशानियों, परवरिश, बीमारी के कारणों आदि के बारे में लिखा था. तब मैंने उस आर्टिकल का प्रिंट आउट लिया था. घर जाकर मैंने यह प्रिंट आउट मल्ली (मेरे पत्नी का घरेलु व प्यार का नाम) को देते हुए कहा कि वह इसे बगल में रहने वाले उस बच्चे की माँ को दे दे, शायद उनके कुछ काम आ जाए. हालांकि मुझे कुछ दिन बाद पूछने पर पता चला कि मल्ली ने वह आर्टिकल उस बच्चे की माँ को नहीं दिया. खुद एक माँ होने के नाते मल्ली ने इसके पीछे जो तर्क दिये थे, वो मुझे भी उन परिस्थियों में ठीक लगे थे. हाल ही में मुझे यह जानकार भी बड़ा दुःख हुआ कि दिब्यांश के माँ-पिता का तलाक हो गया है. उसकी माँ ने किसी ओर शख्स से शादी कर ली और दिब्यांश अब उसके पिता के पास रहता है. यह स्थिति भी दिब्यांश की एक और बदनसीबी कही जा सकती है.
बहरहाल, उस आर्टिकल को पढ़ने के बाद मुझे पहली बार इस तरह के बच्चों – लोगों के बारे में जानकारी मिली. तब मै पहली बार यह समझ पाया था कि इंसानों की इस समस्या को ऑटिज्म (स्वलीनता) कहते है. सामान्य शब्दों में कहा जाए तो ऑटिज्म (Autism) एक तरह का मानसिक विकार, मानसिक विकलांगता या मंदबुद्धि की ही तरह का एक रोग है. भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऑटिज्म से ग्रस्त लोगों की संख्या लाखों में है. इस बीमारी को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसआर्डर (ASD) के नाम से भी जाना जाता है. अपवाद स्वरुप कुछ मामलों में इससे ग्रस्त लोगों को प्रतिभाशाली भी माना जाता है. अधिकतर मामलों में यह माना जाता है कि यह एक आनुवांशिक (Heredity or Genetic) बीमारी है जो किसी भी जनरेशन में सामने आ सकती. जबकि कुछ मामलों में यह गर्भावस्था के दौरान गलत खान-पान के कारण भी हो सकती है. इससे ग्रस्त लोगों के लिए इसे दुर्भाग्य ही माना जायेगा कि इस बामारी का अभी तक कोई सटीक ईलाज मेडिकल साइंस उपलब्ध नहीं करा पाया है. यह बीमारी अभी भी लाईलाज है. इससे ग्रस्त लोगों का असामान्य ब्यवहार इसे और गंभीर बना सकता है. इसलिए इसमें ब्यावारिक शिक्षा या सूझबूझ से ही सुधार लाया जा सकता है. इससे ग्रस्त किसी बच्चे को प्यार – दुलार और खेल-कूद जैसी एक्टिविटीज की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया में ऑटिज्म से ग्रस्त लगभग ८० फीसदी से अधिक लोग बेरोजगार हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो ऑटिज्म की बीमारी दिब्यांगों (विकलांगों) अथवा डिफ्रेंटली एब्ल्ड लोगों की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण या परेशानियों वाली है. इसलिए इसमें स्पेशल केयर की अधिक जरूरत महसूस होती है. मनोवैज्ञानिक तौर पर माता-पिता अथवा करीबियों से ऐसे बच्चे स्पेशल केयर की अपेक्षा ज्यादा रखते है. ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चों को प्यार और सहानुभूती की ज्यादा जरूरत होती है.
ऑटिज्म से ग्रस्त मेट्रो में बैठे इस बच्चे को मै लगातार देख रहा था, उसे पढ़ने की कोशिश कर रहा था. मेट्रो की ही तरह मन में भी कई तरह के भाव चलायमान व अस्थिर थे, स्टेशनों की तरह मेरे भाव भी लगातार बदल रहे थे. बच्चा अभी भी अपने पिता की छाती की तरफ मुँह करके चिपटा था और गोद में डरा - सहमा सा बैठा था. मै मन ही मन बच्चे की इस स्थिर स्थिति को बदलने और उसके कुछ शरारत करने की कामना कर रहा था. हुआ भी ठीक ऐसा, कुछ डेरा बाद बच्चे ने अपने पापा की छाती से मुँह थोड़ा बायीं ओर घुमाया, धीरे से अपनी आँखे खोली और चुपके से बगल में बैठी अपनी माँ की तरफ देखा. बच्चे की इस हरकत पर उसके पापा प्यार से उसका सर सहलाने लगे. वह बच्चे को दुलार रहे थे. बच्चे ने झुकी नजरों से अपनी माँ की तरफ देखा. उसकी माँ उसके बगल में बैठी सो रही थी. फिर बच्चे ने अपना सर उठाया और अपने पापा की तरफ देखने लगा. इस बार बच्चे के चेहरे पर निश्चिन्तता के भाव थे. उसके पापा ने भी बच्चे के गाल प्यार से थपथपाए और मुस्कराते हुए एक पप्पी दी. बच्चे ने कुछ कहने के लिए अपने पापा के कानो तक अपना मुँह उठाया. उसके पापा शायद समझ गए थे. उन्होंने भी मुस्कराते हुए अपना सर हिलाकर बच्चे को जैसे बोलने के लिए प्रेरति किया. बच्चा बोला “पा..पा.., पु...इस तो नी आयेगी न”? बच्चे का यह सवाल सुन सभी लोग मुस्कराने लगे. उसके पापा ने प्यार से मुस्करा कर कहा, “नहीं बेटा, पुलिस नहीं आयेगी”. बच्चे ने फिर माँ की ओर देखा. बच्चे के चेहरे पर खुशी के भाव थे, उसकी माँ अब भी सो रही थी. इस बीच मेट्रों में मेरा गंतब्य स्टेशन आने की घोषण हो गयी. बीते गुरुवार को जनकपुरी वेस्ट से बाराखम्बा रोड तक का लगभग ४० मिनट का मेरा यह रूटीन सफर उस दिन बिल्कुल भी बोरिंग नहीं लगा. 
                                              By Subhash Raturi, 09th May 2016

Tuesday, May 3, 2016

क़ानूनी भय नहीं, सुरक्षा के लिए करें ट्रैफिक नियमों का पालन



भारत के लिए यह काफी चिंताजनक बात है कि देश में सड़क हादसों की तादाद प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है. बीते वर्ष 2015 में 1.46 लाख लोग सड़क हादसों में मारे गए, यह संख्या वर्ष 2014 की तुलना में 5 फीसदी अधिक है. यानि देश की सड़कों पर पिछले वर्ष 2015 में 3.6 मिनट के अंतराल में औसतन एक ब्यक्ति की मौत हुई. भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ सर्वाधिक सड़क हादसे होते है और इन हादसों में सबसे ज्यादा लोग जान गँवा बैठते है. पिछले कुछ सालों में देश में हुई अप्राकृतिक मौतों की तुलना में अगर सड़क हादसों में हुई मौतों से की जाये तो जो आकडें सामने आते है वे काफी चौकाने वाले है. इन आकडों के मुताबिक़ आतंकवादी हमलों, देश की सीमाओं पर सैन्य बलों के साथ होने वाली मुठभेड़, प्राक्रतिक आपदा आदि के कारण हुई मौतों से ज्यादा लोग देश की सड़कों पर होने वाले सड़क हादसों में मारे गए. जाहिर है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों के कारण जान माल का भारी नुकसान होने के अलावा जो राष्ट्रीय और सामाजिक क्षति देश को उठानी पड़ती है उसकी भरपाई मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है.
ऐसा नहीं कि सरकार देश में बढते सड़क हादसों को लेकर चिंतित नहीं है या सरकार द्वारा सड़क हादसों में कमी लाने के प्रयास नहीं किया जा रहे है. दरअसल केन्द्र और राज्य सरकारें भी हर बार सड़क हादसों से निपटने के लिए कुछ न कुछ नयी
योजना लाती रहती है लेकिन अभी तक हादसों में कोई अपेक्षित कमी नहीं आ सकी. रोड इंजीनियरिंग और वाहन की तकनीक जैसी खामियों को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर सड़क हादसों के पीछे ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करना सबसे बड़ा कारण है. ट्रैफिक नियमों की अनदेखी में ड्रंकन ड्राइविंग, ओवरस्पीडिंग, ओवरटेकिंग जैसे बड़े कारण भी शामिल हैं. समाज में आम आदमी समेत सड़क पर रोड यूजर्स और वाहन चालकों में बढ़ती संवेदनहीनता का मनोविज्ञान भी बढते सड़क हादसों के ग्राफ को बढ़ा रहा है. जीवन की आपाधापी, तेज रफ़्तार जीवन शैली और दौड़-धूप के कारण घर के अंदर और बाहर सड़क पर भी आम आदमी की सब्र की क्षमता कमजोर होती जा रही है जिसकी परिणिति सड़क पर हादसों के रूप में हो रही है, हालांकि यह बात दिल्ली जैसे बड़े महानगरों पर ज्यादा सटीक बैठती है, जहां हर आदमी में दूसरे से आगे निकलने की होड मची हुई है. हकीकत में देखा जाए तो सड़क हादसों में कमी लाने की जिम्मेदारी सरकार से पहले हर उस आदमी की भी है जो रोड यूजर्स है. यदि प्रत्येक ब्यक्ति स्वयं वाहन चलाते हुए दूसरे का भी ध्यान रखे और यातायात नियमों का विधिवत पालन करे तो सड़क हादसों में कमी आ सकती है. हर रोड यूजर्स और ड्राइवर्स को इस बात का ध्यान रखना  होगा कि रोड सेफ्टी के नियम उनकी कानूनी बाध्यता न होकर उनकी सुरक्षा के लिए बने है. जब हर ब्यक्ति के अंदर यह भावना जागेगी तो निश्चित ही सड़क हादसों में होने वाली अकाल मौतों पर ब्रेक लग सकेगा. सड़क सुरक्षा के प्रति जब तक प्रत्येक आदमी जागरूक नहीं होता और इसे अपनी प्रार्थमिकता नहीं मानता तब तक सड़क दुर्घटनाओं में कमी नहीं लाई जा सकती है. 
                                                           
By Subhash Raturi, 04 May 2016


Monday, May 2, 2016

झुलसता, बहता, ठिठुरता और दम तोडता उत्तराखंड




पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड (देवभूमि) में एक के बाद एक अलग अलग तरह की आपदा-विपदा लगातार बढ़ती जा रही है, अब लगभग हर ऋतु में वहाँ कुछ न कुछ अनिष्ट हो रहा है. आजकल गर्मियों में भयंकर आग ने त्रासदी मचा रखी है, बरसात के दिनों में भूस्खलन से तबाही और शीतकाल में असहनीय बर्फवारी जैसी पीड़ा इस हिमालयी राज्य की नियति बनती जा रही है. जाहिर है कि वहाँ अब दनावल के कारण वसंत आने से पहले ही मुरझाता जा रहा है. देवभूमि और वहाँ के लोग न जाने किस चक्रचाल में फंसते जा रहे हैं? वहाँ लगातार जंगल कट रहे है और हरियाली खत्म हो रही है. जंगलों में सुनियोजित प्लांटेशन और पर्यावरणीय देखभाल के अभाव में चीड के वृक्ष लगातार बढ़ रहे है, जो जंगलों में आग भड़कने के सबसे बड़े कारणों  में से एक है. शहरों के निकट नित नयी बस्तियां बस रही है और सुदूर बसे प्राचीन गांव खाली हो रहे, नदियों को रोका जा रहा है और बहुतायत छोटे-बड़े बांधों का निर्माण हो रहा है. सूदूरवर्ती गांव तक सुगम पहुँच के लिए सडकों के निर्माण के लिए हरे-भरे घने जंगलों के सीने चीरे जा रहे है. विभिन्न कारणों से उजडते जंगलों की वजह से वहाँ की प्राचीन वनस्पतियां भी खत्म होती जा रही है और पारस्थिकीय संतुलन निरंतर बिगडता जा रहा है. इस वजह से जंगली जानवर भोजन की तलाश में इंसानी बस्तियों की ओर बढ़ रहे है. उत्तराखंड में प्रतिवर्ष दर्जनों लोग इन जानवरों के हमलों का शिकार बन रहे है. इन सब वजहों से जानवरों के साथ साथ वहाँ प्रक्रति भी हमलावर होने लगी है.
वैसे यह सब कुछ अनायास नहीं है, इसके लिए हम और हमारी लोग या यूं कहें कि तुच्छ मानवीय
सोच ही जिम्मेदार है. प्रकृति से अनावाश्यक छेड़छाड़ और उससे कुछ पाने के तुच्छ लालच ने ही इन त्रासदियों को जन्म दिया है. वर्तमान समय में वहाँ लगी आग की ही बात करें तो इसके पीछे भी कुछ इंसानों की तुच्छ सोच ही सामने आती है. जंगलों में लगी आग के पीछे टिम्बर मर्चेंट्स (लकड़ी के ब्यापारियों) और कुछ भू माफियाओं का हाथ बताया जा रहा है. टिम्बर मर्चेंट्स वन विभाग के साथ मिलकर करोड़ों रूपये की लकड़ी प्रतिवर्ष बेचते है जबकि भू-माफिया इस तरह की जमीन खरीद-फरोख्त का काम करते है. हालांकि कभी-कबार मानवीय लापरवाही से भी आग लग जाती है लेकिन इस तरह की आग का एक सीमित दायरा होता है. यह किसी गाँव के जंगल या इसके अहाते,पट्टी आदि तक ही सीमित होती है. इसके अलावा वहाँ के ग्रामीण भी कभी कभी किसी निश्चित जगह या छोटे छोटे हिस्सों में जानबूझकर भी आग लगाते है ताकि पशुओं के लिए ज्यादा चारा पैदा हो सके या फिर ग्रामीण लोगों को सूखी लकडियाँ मिल सके. लेकिन मौजूदा वनाग्नि पूरी तरह से अलग है. उत्तराखंड के सभी १३ जनपदों के जंगल में इतने बड़े पैमाने पर आग का लगना कोई संयोग या मानवीय लापरवाही नहीं बल्कि एक सोची समझी साजिश ही है. अब तक वहाँ के 13 जिलों में फैला 2800 हेक्टेयर से भी ज्यादा जंगल तबाह हो चुका है. वन्यजीव, जड़ीबूटियां और वहाँ की दुर्लभ वनस्पतियां राख हो रही है, मवेशी चारे और पानी के बिना बेहाल हैं, वातावरण में घना धुँआ भरा हुआ है, कई गाँव के लोगों को सांस लेने में तकलीफें हो रही है. उत्तराखंड के पौड़ी, चमोली, नैनीताल और अल्मोड़ा जिलों में  हालात ज्यादा खराब हैं. बताया जाता है कि अब तक वनाग्नि से अलग-अलग जगहों पर छह लोगों की मौत हो चुकी है. कई लोग घायल हैं. यह हरे-भरे वनों से आच्छादित, हिमालयी नदियों से सींचित और हमेशा से शुद्ध वायुमंडल वाले उत्तराखंड के लिए लिए एक बुरे सपने की तरह है. इन सभी तुच्छ मानवीय क्रियाकलापों पर यदि समय रहते विराम नहीं लगा तो भविष्य में उत्तराखंड के सौंदर्य पर और भी कई काले दाग लग सकते हैं, इसका अस्तित्व झुलस सकता है या फिर बरसात में बहकर या हिमपात में ठिठुरकर धराशायी हो सकता है. हमें इसके प्राकृतिक वजूद को बचाने के लिए समय रहते जरूरी कदम उठाने होंगे.
By Subhash Raturi, 02 May 2016