Thursday, April 21, 2016

उत्तराखंड उच्च न्यालाय का ऐतिहासिक फैसला



यह काफी दुखद है कि राष्ट्रपति शासन को लेकर उत्तराखंड उच्च न्यालाय द्वारा दिये गए फैसले को कुछ लोग राजनीतिक चश्मे से देख रहे है और फैसले के खिलाफ फेसबुक पर अपनी खूब भड़ास निकाल रहे है जबकि यह एक ऐतिहासिक फैसला है I भारतीय लोकतंत्र में नैनीताल हाई कोर्ट के इस फैसले को हमेशा याद रखा जायेगा I नैनीताल हाई कोर्ट में इतने बड़े विवेकवान जज होने के नाते उत्तराखंड को इस पर गौरव करना चाहिए I ऐतिहासिक फैसले को सुनाने वाले खंडपीठ का नेतृत्व करने वाले जज के. एम. जोसेफ वैसे भी अपनी निष्पक्षता और बिद्व्ता के लिए जाने जाते हैं I ऐसा फेसला सुनाकर उन्होंने न्यायपालिका की श्रेष्ठता व विश्वसनीयता को फिर साबित कर दिखाया है I      

Wednesday, April 20, 2016

जीईआर : मौजूदा आरक्षण का ठोस विकल्प




सुभाष रतूड़ी: कल किसी मित्र ने फेसबुक पर एक फोटो शेयर की थी। उसमे माँ के गर्भ में पल रहा एक बच्चा भगवान से प्रार्थना कर रहा है कि ‘हे, भगवान तुझसे सिर्फ इनती विनती है कि मुझे ऐसे माँ-बाप देना जो एससी/एसटी या ओबीसी से हों”। इसके अलावा पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी ही फोटो खूब शेयर की जा रही थी। इस फोटो में अपील की गयी थी कि देश की सीमा पर एससी/एसटी या ओबीसी वाले लोगों को पहले तैनात किया जाए या युद्ध में उन्हें पहले भेजा जाये। जाहिर सी बात है कि ये दोनों फोटो देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक व्यंग्य के रूप में पेश की गयी थी। सोशल मीडिया पर धीरे-धीरे ऐसे लोगों की जमात बढ़ रही है जो देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था का विरोध कर रहे है। जबकि दूसरी तरफ गुजरात के पाटीदार – पटेल समुदाय फिर एक बार आरक्षण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन के ओर बढ़ रहा है।


पिछले दिनों ही हरियाणा में भी आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने भारी हिंसक आंदोलन किया था जिसकी परिणिति दो दर्जन से अधिक मौतों, कई महिलाओं से रेप, कई के जख्मी होने और करोड़ों रूपये के नुकसान के रूप में हुई। हरियाणा के जाट और गुजरात के पाटीदार–पटेल दोनों समुदाय सतही तौर पर आर्थिक रूप से काफी मजबूत होने के बावजूद भी आरक्षण की मांग कर रहे है। पैसों के बूते पर देश में और देश के बाहर भी इन समुदायों ने अच्छी-खासी प्रतिष्ठता अर्जित की है। हाल के वर्षों में इससे पहले गुर्जर समुदाय के लोग भी आरक्षण की मांग को लेकर कई बड़े आंदोलन कर चुके है। राष्ट्रीय स्तर पर अगर बात की जाये तो साफ़ होता है कि आरक्षण को लेकर इससे पहले भी देश कई आंदोलनों को झेल चुका है। देश में आरक्षण की मांग पर हर बार हिंसा भडकी है। कोटे को लेकर हर बार बड़ी बड़ी बहस और झडपें हुई है। जान और माल के रूप में देश को हर बार इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। कई बार रेप और आत्मदाह की घटनायें सामने आई है। कुल मिलाकर आरक्षण ने जितने गहरे घाव देश और समाज को दिये है उतने किसी और आंदोलन ने नहीं दिये। यह भी कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आरक्षण के कारण देश में जातिवाद की खाई और चौड़ी व गहरी हुई। राजनेताओं ने आरक्षण को एक अचूक राजनीतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया है। किसी जातिविशेष को खुश रखने और उस समुदाय का वोट पाने के लिए भी इसका राजीनीति इस्तेमाल खूब किया गया। यह शोध और बहस का दूसरा पहलू हो सकता है कि देश में आरक्षण लागू होने के बाद देश को इसका कितना फायदा हुआ? व्यक्तिगत तौर पर इससे कितने लोग लाभान्वित हुए? आरक्षण के अवरोध के कारण सामान्य वर्ग के कितने प्रतिभाशाली युवा जायज नौकरी या अवसर पाने से वंचित रहे? आरक्षण ने कितने अयोग्य लोगों को योग्य बनाया? और यही नहीं सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इसकी आड़ में कितने जातिवादी नेताओं की जमात ने देश में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया?

अगर एक बार फोरी कल्पना कर यह सोच लिया जाए कि जाट और पटेलों की आरक्षण की मांग उचित है और सरकार उनके आंदोलन से डरकर या अपना वोट बैंक बनाने के लिए उनकी मांग पूरी भी कर देती है तो क्या सरकार समेत हम सब इस बात को लेकर हमेशा के लिए निश्चिन्त हो सकते है कि भविष्य में आरक्षण की मांग को लेकर अब कोई आंदोलन नहीं होगा। रिजर्वेशन के लिए फिर कोई समुदाय कभी हिंसक नहीं होगा। जाहिर सी बात है, भविष्य में इस तरह के शांति की सुनिश्चितता की गारंटी न तो सरकार दे सकती है और ना ही आप और हम। बल्कि इसके उलट यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में आरक्षण को खत्म करने की मांग तेज हो जाए। सामान्य वर्ग के वे लोग आंदोलन पर उतारू हों जिनके मार्ग में आरक्षण एक बाधा बन रहा हो। या फिर वे मेधावी सामान्य वर्ग के लोग इस आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करें जिनकी विलक्षणता को रिजर्वेशन निगल गया हो। ऐसी संभावना इसलिए जताई जा सकती है क्योंकि देश में आधे से अधिक लोग आज भी आरक्षण के खिलाफ है और वे इसका कोई ठोस विकल्प चाहते है। सोशल मिडिया पर कई बार इस तरह के संकेत देखने को मिलते है। तो अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि फिर आरक्षण का ईलाज क्या है?

व्यक्तिगत तौर पर मै भी चाहता हूँ कि गरीब और वंचित को आरक्षण का हक मिलना चाहिए। जो लोग दो जून की रोटी जुटाने में सक्षम न हों, जो नौनिहाल माँ-बाप की आर्थिक तंगी के कारण शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित हों, जो लोग परस्थितिजन्य कारणों से रोजगार पाने या कमाई हेतु काम करने में अक्षम हों। इस तरह के लोगों को आरक्षण जरूर दिया जाना चाहिए ताकि देश में आर्थिक और सामाजिक तौर पर समानता बनायी जा सके। देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीविकोपार्जन के लिए सभी को समान अवसर मिल सके, इस आधार पर आरक्षण एक अच्छा विकल्प है। लेकिन गुजरात के पटेल, हरियाणा के जाट या इसी तरह अन्य समुदाय के वे लोग जो पहले से ही हर मामले में सक्षम हों, आर्थिक तौर पर मजबूत हों, उनकी आरक्षण की मांग समझ से परे है। हाँ, इन समुदायों में कुछ लोग जरूर ऐसे हो सकते है जो वास्तव में आर्थिक तौर पर पिछड़े हों, ऐसे लोगों द्वारा आरक्षण की मांग करना समझ में आता है और सरकार यदि ऐसे लोगों की मांग मानती भी है तो उसे सौ फीसदी जायज ठहराया जा सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि देश के हर हिस्से, हर समुदाय में आज भी कई ऐसे लोग हैं जो वास्तव में आर्थिक तौर काफी पिछड़े है और आर्थिक तंगी के कारण ऐसे लोग दो जून की रोटी पाने, स्कूल जाने, उच्च शिक्षा हासिल करने में सक्षम नहीं है। निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि ऐसे लोग आरक्षण प्राप्त दलित–पिछड़े लोग भी हैं और आरक्षण से वंचित सामान्य समुदायों (वर्ग) से भी है और ब्राहमण भी है। इस हिसाब से हमें हर समुदाय में समान रूप से थोडा थोडा आरक्षण की जरूरत महसूस होती है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण या कोटे को बहाल करने (इकोनॉमिक रिजर्वेशन) के अलावा एक बात और है जिसके आधार पर भी आरक्षण लागू किया जा सकता है। इसे हम भौगोलोक आरक्षण (जियोग्रोफिकल रिजर्वेशन) कह सकते है और इन दोनों को मिलाकर देश में केवल जीईआर (जियोग्रोफिकल एंड इकोनॉमिक रिजर्वेशन) की व्यवस्था की जा सकती है। इससे जातिवाद की संकीर्णता भी खत्म होगी और जरूरतमंद को इसका लाभ भी मिलेगा, चाहे वह किस भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो। ऐसे क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, पानी, बिजली, बाजार आदि चीजों से दूर है। ऐसे दूरस्थ गावों और क्षेत्रों में कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। वहाँ के नौनिहाल आज भी जंगल-पहाड़ों के रास्ते से होकर और जान जोखिम में डालकर कई किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में पढ़ने को जाते है। ऐसे-तैसे यदि उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की भी तो आगे की पढाई के लिए वे बड़े स्कूल में नहीं जा पाते। ऐसे बड़े स्कूलों में केवल वहाँ के वे ही बच्चे जा पाते है जो आर्थिक रूप से मजबूत होते है। क्योंकि घर से दूर बड़े स्कूल में जाने का मतलब होता है कि आपे पास शहर में रहने लायक पैसा होना चाहिए, जिसमे किराए के घर, स्कूल की फीस और अन्य दैनिक खर्चे शामिल हैं। ऐसी विकट स्थिति केवल पहाड़ी या हिमालयी क्षेत्रों में ही नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े मैदानी राज्यों में भी इस तरह की दिक्कतें हैं। जिन क्षेत्रों में ये समस्याएं हैं, वहाँ के लोग हर स्तर पर उस क्षेत्र को छोड़ने के प्रयास में लगे रहते है ताकि शहर में बसकर सब तरह की सुविधाएँ उन्हें प्राप्त हो सके। ऐसे लोग जानबूझकर नहीं बल्कि परस्थितियों से तंग आकार बड़े पैमाने पर शहर की ओर पलायन करते है जिससे गांव के गांव खाली हो रहे है और देश के बड़े शहरों पर भी जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे क्षेत्र के लोगों को जियोग्रोफिकल रिजर्वेशन दिया जाना चाहिए। ताकि पलायन पर रोक लगने के साथ रोजगार के जरिये आर्थिक तौर पर ये लोग ज्यादा सक्षम हो सकें।  अत: जीईआर मौजूदा आरक्षण का एक अकाट्य विकल्प बन सकता है बशर्ते यदि हमारे नेता वोट बैंक की मानसिकता का त्याग करें। जाहिर है कि ऐसे नेता जो हमेशा जाति-धर्म को आधार बनाकर सत्ता की सीढी चढ़ते है वे इस तरह के जीईआर की कभी पैरवी नहीं करेंगे, ऐसे में हम  आरक्षण को लेकर जनमत संग्रह का एक ठोस विकल्प चुन सकते है।
By Subhash Raturi, 21/04/16

Sunday, April 17, 2016

किसी से कम नहीं भारतीय ट्रक ड्राइवर



नई दिल्ली (सुभाष रतूड़ी) : टी१ प्राइमा ट्रक रेसिंग चैम्पियनशिप में भारतीय ट्रक ड्राइवरों ने अपने अनूठे प्रदर्शन से  साबित कर दिया कि वे दुनिया में किसी से कम नहीं है. भारतीय खेमे के विजेता ट्रक ड्राइवर जगत सिंह और नागार्जुन ए की ड्राइविंग निपुणता और तकनीकी विलक्षणता ने यह सन्देश दे दिया कि देश के ट्रक ड्राइवरों को हरगिज कम न आंका जाए बल्कि उन्हें ऐसे ही बेहतर अवसर और बड़े प्लेटफोर्म उपलब्ध कराया जाए जहां से वो अंतराष्ट्रीय ट्रक रेसिंग में भारत का परचम लहरा सकें. इस चैम्पियनशिप में पहली बार भारतीय ट्रक ड्राइवरों की भागीदारी ने देश की समूची ट्रकिंग इंडस्ट्री में नया जोश और उत्साह भर दिया है. जगत सिंह और नागार्जुन ए देश के सैकड़ों ट्रक ड्राइवरों के आदर्श और प्रेरणाश्रोत बन चुके है. सभी चार रेसों में से दो भारतीय ट्रक ड्राइवरों और दो अन्तराष्ट्रीय ट्रक ड्राइवरों के लिए आयोजित रेसों की तुलना की जाये तो साफ़ पता चलता है कि देश के ड्राइवरों का प्रदर्शन काफी सराहनीय रहा है. भारतीय ट्रक रेसिंग (८ ८ लेप) सुपर क्लास के विजेता नागार्जुन ए (ट्रक नंबर ४) और जगत सिंह (ट्रक नंबर ४) की औसतन स्पीड क्रमश:  ७८.३३ और ७७.१५ किलोमीटर प्रति घंटा थी जिसके लिए उन्होंने क्रमश: १५ मिनट १९ सेकेण्ड और १५ मिनट ३३ सेकेण्ड का समय लिया जबकि प्रो-क्लास केटीगिरी  में अंतराष्ट्रीय ट्रक रेसिंग (८ लेप) के विजेता मेट समरफील्ड (ट्रक नंबर १४) की स्पीड ७९.६६ किलोमीटर प्रति घंटा थी, इसके लिए उन्होंने १५ मिनट ३ सेकेण्ड का समय लिया. अंतराष्ट्रीय ट्रक रेसिंग की मुख्य चैम्पियनशिप के विजेता डेविड जेनकींस (ट्रक नंबर ११)  की स्पीड ७९.८३ किलोमीटर प्रति घंटा थी और इसके लिए उन्होंने ३७ मिनट ३४ सेकेण्ड का समय लिया, हालांकि यह रेस २० लेप की थी. ट्रक रेसिंग में स्पीड और टाइमिंग के ये नतीजे बताते है कि प्रोफेशनल विदेशी ट्रक रेसर्स की स्पीड और भारत के इन केजुअल ट्रक रेसर्स की स्पीड में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रहा. विदेशी ट्रक रेसर्स की तर्ज पर यदि भारत में भी ट्रक रेसिंग के लिए रेगुलर ट्रैनिंग व चैम्पियनशिप आयोजित होते रहें तो देश के ड्राइवर अंतराष्ट्रीय ट्रक रेसिंग में भी बादशाहत हासिल कर सकते है.
चैम्पियनशिप में भाग लेने वाले सभी भारतीय ट्रक ड्राइवरों ने भी रेसिंग ट्रेक पर साबित कर दिखाया कि वे अंतराष्ट्रीय स्तर के प्रोफेशनल ट्रक ड्राइवर्स रेसर्स से किसी भी मायनो में कम नहीं है. भारत में ट्रक रेसिंग के लिए प्रतिकूल माहौल और नियमित तौर पर उपयुक्त ट्रैनिंग की ब्यवस्था न होने के बावजूद भी देशी ट्रक ड्राइवरों में वे सभी स्किल्स देखने को मिले जो सामान्य तौर पर किसी प्रोफेशनल विदेशी ट्रक रेसिंग चैम्पियंस में मौजूद होते हैं. भारतीय ट्रक रेसिंग मुकाबले के दौरान एक ट्रक द्वारा दूसरे ट्रक को पीछे से टक्कर मारने के अपवाद या घटना को छोड़ दिया जाये तो पूरी रेस में सभी ड्राइवरों का अपने ट्रक पर पूरा नियंत्रण बना रहा. भारतीय ट्रक ड्राइवर हर बार रेसिंग ट्रेक पर पूरे प्रोफेशनल रेसर्स नजर आये. उनका जोश जज्बा और मानसकि एकाग्रता देखते ही बनती थी. कहीं भी, किसी को भी ऐसा नहीं लगा कि वो पहली बार किसी अंतराष्ट्रीय ट्रेक पर रेसिंग के मैदान में उतरें हों. हालांकि इसका श्रेय इन रेस का आयोजन करने वाली देश की प्रमुख ट्रक निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स को भी जाता है जिसने भारतीय ट्रक ड्राइवरों को यह सुनहरा मौका उपलब्ध कराया. इस रेस के लिए ट्रक ड्राइवरों को एक माह से अधिक समय तक बेहतर प्रशिक्षण दिया और ड्राइवरों को अंदर छिपी प्रतिभा को इतने कम समय में बखूबी निखारा. आयोजकों का कहना है बिजेता भारतीय ट्रक ड्राइवरों की जीत का सफर यहीं नहीं रुकेगा और उन्हें लगातार प्रशिक्षण के बाद अंतराष्ट्रीय ट्रक चैम्पियनशिप के लिए तैयार किया जायेगा, जो देश और देश की उपेक्षित ट्रकिंग इंडस्ट्री के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा.   
             Published in TransREporter Newspaper – 1st April 2016

Saturday, April 16, 2016

एक फूल एक खुशी एक महक है तू


 एक फूल एक खुशी एक महक है तू
सबके जहां के आँगन की चहक है तू 
माना आज एक नया छोटा सितारा है तू
लेकिन कल की दुनियाँ का उजियारा है तू
बिखेरे चमन में जो खुशियाँ सुबह की
क्षितिज में उगते उस सूरज की धमक है तू

नाखुश बजट के लिए ट्रांसपोर्टर्स भी दोषी

सुभाष रतूड़ी : वित्त वर्ष २०१६-१७ के लिए पेश हुए बजट से ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री फिर एक बार खासी नाराज दिख रही है. ट्रांसपोर्टर पिछले कुछ महीनों से इस बजट का इन्तजार कर रहे थे. उनको उम्मीद थी कि कम से कम टीडीएस और सर्विस टेक्स में कटौती या उनको राहत देने की उनकी मांग सरकार इस बजट में जरूर पूरी करेगी. लेकिन ट्रांसपोर्टरों के सभी सपने ढेर हो गए. कुछ हद तक इसके लिए ट्रांसपोर्टरों को भी खुद जिम्मेदार माना जा सकता है और इसके पीछे कई कारण भी है. अन्य कारणों के अलावा इसके लिए जो अति महत्वपूर्ण कारण है, वह यह कि एकत्व की भारी कमी के कारण बजट से पूर्व ट्रांसपोर्टर सरकार के समक्ष अपनी मांग या परेशानियों को प्रभावकारी तरीके से रखने में पूरी तरह विफल रहे. गुटों और धडों में बंटकर ट्रांसपोर्टर इंडस्ट्री और ट्रेड की प्राथिमकताओं को चयन करने में भी विफल हुए है. मुद्दों में अंतर के चलते सरकार के समक्ष भी अलग अलग तथ्य और मांगे रखी जाती रही है. ट्रांसपोर्टरों का एक गुट यदि सर्विस टैक्स में राहत चाहता है तो दूसरा टीडीएस खत्म करने की अपनी मांग सरकार के सामने रखता है. वे प्रभावकारी तरीके से सरकार को यह बताने में भी अक्सर नाकाम रहते है कि उन्होंने इन टेक्सों में क्यों राहत दी जाने चाहिए. जबकि इसके विपरीत सरकार की यह काफी पुरानी धारणा है कि ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री में टैक्स की काफी चोरी होती है और ट्रांसपोर्टरों के ट्रांजेक्शन के तरीके पारदर्शी नहीं होते है.
दरअसल उक्त चीजों को लेकर कई सारी बिडंबनायें और बिरोधाभास भी है. ट्रांसपोर्टरों की मांग अगर कहीं जायज हैं तो उनके प्रति सरकार की धारणा भी बिना किसी वजह के नहीं है. ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री में मल्टीपल टेक्सटेशन की बात किसी से छुपी हुई नहीं है. ट्रक व इसके साजो सामान खरीदने, ट्रक को सड़क पर चलाने, परमिट पाने से लेकर माल ढुलाई और डीजल भरने तक, सभी जगह कई तरह के टैक्स ट्रक मालिक या ट्रांसपोर्टरों को देने होते है. इसके बाद माल परिवहन के एवज में भुगतान पाने या करने पर भी टीडीएस या अन्य तरह की टेक्स की देनदारी करनी होती है. इस इंडस्ट्री में टेक्सटेशन जितना जटिल है उससे कहीं अधिक जटिल इस इंडस्ट्री का संरचनात्मक या संगठनात्मक ढांचा भी है. इसे इंडस्ट्री का स्टेटस तक हासिल नहीं है. इसी जटिल ढाँचे व कार्यप्रणाली के कारण ट्रांसपोर्टर अपने को जस्टिफाइड करने में असफल होते है और सरकार भी इसका बखूबी फायदा लेती है.  आंकड़ों के मुताबिक़ देश की ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री में  लगभग ८५ प्रतिशत लोग सिंगल ट्रक ओनर हैं. मुश्किल से ३ - ५ फीसदी ट्रांसपोर्ट कंपनियों के पास ही १०० के आसपास या इससे अधिक फ्लीट्स है. माल परिवहन समेत तमाम मानदंडों के आधार पर ट्रांसपोर्टरों की भी कई कैटिगिरी है. इन कैटिगिरी के आधार पर ही ऐसे अनिवार्य टैक्सों जिनकी देनदारी से बचना मुश्किल है ( जैसे कि एक्साइज ड्यूटी, रोड टेक्स, परमिट टैक्स आदि) को छोड़कर बाकी टैक्सों को लेकर कई ट्रांसपोर्टरों की समझ काफी सीमित है और इन्हें वो अनिवार्य मानते भी नहीं और संभवत: भरते भी नहीं. तरह तरह की कैटिगिरी होने के नाते सभी ट्रांसपोर्टरों की टैक्स संबंधी जरूरतें और कारोबार को लेकर चिंताएं भी अलग अलग है. ट्रेड के ट्रेंड में भिन्नताएं होने के साथ ट्रेडर्स बाडी भी अलग अलग है. उनमे वैचारिक समानता का बन पाना भी कई बार मुश्किल होता है. ऐसे में वे सरकार के समक्ष आपसी रायशुमारी से भी कोई अपनी जायज मांग भी नहीं रख पाते. क्योंकि आपसी रायशुमारी न होने से अलग अलग संगठनों की प्रार्थिमिकता भी सरकार के समक्ष अलग अलग ही होती है. ऐसे में सरकार के समक्ष भी उनकी प्राथिम्क्ताओं को समझने में असमंजस की स्थिति बनी रहती है या फिर सरकार यह निर्णय करने में आसमर्थ रहती है कि कों सा मुद्दा जरूरी है और किसकी बात ज्यादा गौर करने लायक है. जाहिर है कि सरकार बजट से पूर्व सभी उद्योगों से औपचारिक बातचीत करती है और उन्हें वाली परेशानियों को समझने की कोशिश करती है. देश की आर्थिकी में सुधार को सुनिश्चित करने के लिए उनसे लिखित सुझाव भी मांगे जाते है. 
तथ्यों और मुद्दों को लेकर ट्रांसपोर्टरों में एकमत न होने से समझा जा सकता है कि उनके सुझाव व मांगे भी अलग होंगी और उनके पेश करने के तरीकों में भी भिन्नता होगी. इस लिहाज से सरकार भी उनकी प्राथिमिक्ताएं आसानी से नहीं समझ सकती है और सैकड़ों सुझावों या मांगों में ऐसे मुद्दों को बजट में विचार हेतु शामिल करना सरकार के लिए भी बड़ी चुनौती होती है. अत: साफ़ कहा जा सकता है कि बजट में ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री को किसी तरह की रहत न मिलने के पीछे स्वयं ट्रांसपोर्टर्स भी इसके लिए जिम्मेदार होते है.