Wednesday, April 20, 2016

जीईआर : मौजूदा आरक्षण का ठोस विकल्प




सुभाष रतूड़ी: कल किसी मित्र ने फेसबुक पर एक फोटो शेयर की थी। उसमे माँ के गर्भ में पल रहा एक बच्चा भगवान से प्रार्थना कर रहा है कि ‘हे, भगवान तुझसे सिर्फ इनती विनती है कि मुझे ऐसे माँ-बाप देना जो एससी/एसटी या ओबीसी से हों”। इसके अलावा पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी ही फोटो खूब शेयर की जा रही थी। इस फोटो में अपील की गयी थी कि देश की सीमा पर एससी/एसटी या ओबीसी वाले लोगों को पहले तैनात किया जाए या युद्ध में उन्हें पहले भेजा जाये। जाहिर सी बात है कि ये दोनों फोटो देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक व्यंग्य के रूप में पेश की गयी थी। सोशल मीडिया पर धीरे-धीरे ऐसे लोगों की जमात बढ़ रही है जो देश में मौजूदा आरक्षण व्यवस्था का विरोध कर रहे है। जबकि दूसरी तरफ गुजरात के पाटीदार – पटेल समुदाय फिर एक बार आरक्षण की मांग को लेकर उग्र आंदोलन के ओर बढ़ रहा है।


पिछले दिनों ही हरियाणा में भी आरक्षण की मांग को लेकर जाटों ने भारी हिंसक आंदोलन किया था जिसकी परिणिति दो दर्जन से अधिक मौतों, कई महिलाओं से रेप, कई के जख्मी होने और करोड़ों रूपये के नुकसान के रूप में हुई। हरियाणा के जाट और गुजरात के पाटीदार–पटेल दोनों समुदाय सतही तौर पर आर्थिक रूप से काफी मजबूत होने के बावजूद भी आरक्षण की मांग कर रहे है। पैसों के बूते पर देश में और देश के बाहर भी इन समुदायों ने अच्छी-खासी प्रतिष्ठता अर्जित की है। हाल के वर्षों में इससे पहले गुर्जर समुदाय के लोग भी आरक्षण की मांग को लेकर कई बड़े आंदोलन कर चुके है। राष्ट्रीय स्तर पर अगर बात की जाये तो साफ़ होता है कि आरक्षण को लेकर इससे पहले भी देश कई आंदोलनों को झेल चुका है। देश में आरक्षण की मांग पर हर बार हिंसा भडकी है। कोटे को लेकर हर बार बड़ी बड़ी बहस और झडपें हुई है। जान और माल के रूप में देश को हर बार इसका बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। कई बार रेप और आत्मदाह की घटनायें सामने आई है। कुल मिलाकर आरक्षण ने जितने गहरे घाव देश और समाज को दिये है उतने किसी और आंदोलन ने नहीं दिये। यह भी कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आरक्षण के कारण देश में जातिवाद की खाई और चौड़ी व गहरी हुई। राजनेताओं ने आरक्षण को एक अचूक राजनीतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया है। किसी जातिविशेष को खुश रखने और उस समुदाय का वोट पाने के लिए भी इसका राजीनीति इस्तेमाल खूब किया गया। यह शोध और बहस का दूसरा पहलू हो सकता है कि देश में आरक्षण लागू होने के बाद देश को इसका कितना फायदा हुआ? व्यक्तिगत तौर पर इससे कितने लोग लाभान्वित हुए? आरक्षण के अवरोध के कारण सामान्य वर्ग के कितने प्रतिभाशाली युवा जायज नौकरी या अवसर पाने से वंचित रहे? आरक्षण ने कितने अयोग्य लोगों को योग्य बनाया? और यही नहीं सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इसकी आड़ में कितने जातिवादी नेताओं की जमात ने देश में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया?

अगर एक बार फोरी कल्पना कर यह सोच लिया जाए कि जाट और पटेलों की आरक्षण की मांग उचित है और सरकार उनके आंदोलन से डरकर या अपना वोट बैंक बनाने के लिए उनकी मांग पूरी भी कर देती है तो क्या सरकार समेत हम सब इस बात को लेकर हमेशा के लिए निश्चिन्त हो सकते है कि भविष्य में आरक्षण की मांग को लेकर अब कोई आंदोलन नहीं होगा। रिजर्वेशन के लिए फिर कोई समुदाय कभी हिंसक नहीं होगा। जाहिर सी बात है, भविष्य में इस तरह के शांति की सुनिश्चितता की गारंटी न तो सरकार दे सकती है और ना ही आप और हम। बल्कि इसके उलट यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में आरक्षण को खत्म करने की मांग तेज हो जाए। सामान्य वर्ग के वे लोग आंदोलन पर उतारू हों जिनके मार्ग में आरक्षण एक बाधा बन रहा हो। या फिर वे मेधावी सामान्य वर्ग के लोग इस आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व करें जिनकी विलक्षणता को रिजर्वेशन निगल गया हो। ऐसी संभावना इसलिए जताई जा सकती है क्योंकि देश में आधे से अधिक लोग आज भी आरक्षण के खिलाफ है और वे इसका कोई ठोस विकल्प चाहते है। सोशल मिडिया पर कई बार इस तरह के संकेत देखने को मिलते है। तो अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि फिर आरक्षण का ईलाज क्या है?

व्यक्तिगत तौर पर मै भी चाहता हूँ कि गरीब और वंचित को आरक्षण का हक मिलना चाहिए। जो लोग दो जून की रोटी जुटाने में सक्षम न हों, जो नौनिहाल माँ-बाप की आर्थिक तंगी के कारण शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित हों, जो लोग परस्थितिजन्य कारणों से रोजगार पाने या कमाई हेतु काम करने में अक्षम हों। इस तरह के लोगों को आरक्षण जरूर दिया जाना चाहिए ताकि देश में आर्थिक और सामाजिक तौर पर समानता बनायी जा सके। देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और जीविकोपार्जन के लिए सभी को समान अवसर मिल सके, इस आधार पर आरक्षण एक अच्छा विकल्प है। लेकिन गुजरात के पटेल, हरियाणा के जाट या इसी तरह अन्य समुदाय के वे लोग जो पहले से ही हर मामले में सक्षम हों, आर्थिक तौर पर मजबूत हों, उनकी आरक्षण की मांग समझ से परे है। हाँ, इन समुदायों में कुछ लोग जरूर ऐसे हो सकते है जो वास्तव में आर्थिक तौर पर पिछड़े हों, ऐसे लोगों द्वारा आरक्षण की मांग करना समझ में आता है और सरकार यदि ऐसे लोगों की मांग मानती भी है तो उसे सौ फीसदी जायज ठहराया जा सकता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि देश के हर हिस्से, हर समुदाय में आज भी कई ऐसे लोग हैं जो वास्तव में आर्थिक तौर काफी पिछड़े है और आर्थिक तंगी के कारण ऐसे लोग दो जून की रोटी पाने, स्कूल जाने, उच्च शिक्षा हासिल करने में सक्षम नहीं है। निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि ऐसे लोग आरक्षण प्राप्त दलित–पिछड़े लोग भी हैं और आरक्षण से वंचित सामान्य समुदायों (वर्ग) से भी है और ब्राहमण भी है। इस हिसाब से हमें हर समुदाय में समान रूप से थोडा थोडा आरक्षण की जरूरत महसूस होती है।

आर्थिक आधार पर आरक्षण या कोटे को बहाल करने (इकोनॉमिक रिजर्वेशन) के अलावा एक बात और है जिसके आधार पर भी आरक्षण लागू किया जा सकता है। इसे हम भौगोलोक आरक्षण (जियोग्रोफिकल रिजर्वेशन) कह सकते है और इन दोनों को मिलाकर देश में केवल जीईआर (जियोग्रोफिकल एंड इकोनॉमिक रिजर्वेशन) की व्यवस्था की जा सकती है। इससे जातिवाद की संकीर्णता भी खत्म होगी और जरूरतमंद को इसका लाभ भी मिलेगा, चाहे वह किस भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो। ऐसे क्षेत्र शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, पानी, बिजली, बाजार आदि चीजों से दूर है। ऐसे दूरस्थ गावों और क्षेत्रों में कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। वहाँ के नौनिहाल आज भी जंगल-पहाड़ों के रास्ते से होकर और जान जोखिम में डालकर कई किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में पढ़ने को जाते है। ऐसे-तैसे यदि उन्होंने स्कूली शिक्षा प्राप्त की भी तो आगे की पढाई के लिए वे बड़े स्कूल में नहीं जा पाते। ऐसे बड़े स्कूलों में केवल वहाँ के वे ही बच्चे जा पाते है जो आर्थिक रूप से मजबूत होते है। क्योंकि घर से दूर बड़े स्कूल में जाने का मतलब होता है कि आपे पास शहर में रहने लायक पैसा होना चाहिए, जिसमे किराए के घर, स्कूल की फीस और अन्य दैनिक खर्चे शामिल हैं। ऐसी विकट स्थिति केवल पहाड़ी या हिमालयी क्षेत्रों में ही नहीं है बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे बड़े मैदानी राज्यों में भी इस तरह की दिक्कतें हैं। जिन क्षेत्रों में ये समस्याएं हैं, वहाँ के लोग हर स्तर पर उस क्षेत्र को छोड़ने के प्रयास में लगे रहते है ताकि शहर में बसकर सब तरह की सुविधाएँ उन्हें प्राप्त हो सके। ऐसे लोग जानबूझकर नहीं बल्कि परस्थितियों से तंग आकार बड़े पैमाने पर शहर की ओर पलायन करते है जिससे गांव के गांव खाली हो रहे है और देश के बड़े शहरों पर भी जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे क्षेत्र के लोगों को जियोग्रोफिकल रिजर्वेशन दिया जाना चाहिए। ताकि पलायन पर रोक लगने के साथ रोजगार के जरिये आर्थिक तौर पर ये लोग ज्यादा सक्षम हो सकें।  अत: जीईआर मौजूदा आरक्षण का एक अकाट्य विकल्प बन सकता है बशर्ते यदि हमारे नेता वोट बैंक की मानसिकता का त्याग करें। जाहिर है कि ऐसे नेता जो हमेशा जाति-धर्म को आधार बनाकर सत्ता की सीढी चढ़ते है वे इस तरह के जीईआर की कभी पैरवी नहीं करेंगे, ऐसे में हम  आरक्षण को लेकर जनमत संग्रह का एक ठोस विकल्प चुन सकते है।
By Subhash Raturi, 21/04/16

1 comment:

Unknown said...

अति उत्तम... लाखों लोगों के मन की बात आपके शब्दा में