Wednesday, August 31, 2016

हिंदी-अंग्रेजी ने बदले उत्तराखंड के कई कुलनाम


सुभाष रतूड़ी
हिंदी और अंग्रेजी के घालमेल ने पहाड के कई सरनेम (जाति या कुलनाम) बदल दिये है. उदाहरण के तौर पर आजकल खण्डूड़ी को खंडूरी, रतूड़ी को रतूरी, बहुगुणा को बहुगुना, मैठाणी को मैथानी या मैठानी, देवराड़ी को दैवरारी, कुडियाल को कुरियाल, असनोड़ा को असनोरा, गौड़ को गौर, लखेडा को लखेरा, सजवाण को सजवान कहा-लिखा जा रहा है. उत्तराखंड से जुड़े इसी तरह के कई और कुलनाम (जातियां) भी है जिनका मूल व वास्तविक उच्चारण हिंग्लिश के बढते प्रभाव के कारण तेजी से बदल गया है या यूं कहें कि विकृत हो गया है. अंग्रेजी की अक्रामकता ने इनको अपने जद में ले लिया है. हालांकि जानकार और स्थानीय लोग इन नामों को पूर्ववत व यथावत शुद्ध लिख-बोल रहे है. लेकिन परेशानी तब होती है जब किसी नए या मूल शहरी ब्यक्ति को आप अपना अंग्रेजी नाम लिखा कोई दस्तावेज या विजिटिंग कार्ड देते है और वह ब्यक्ति आपको नए व परिवर्तित या अपभ्रंश नाम (कुलनाम) से पुकारता है. अंग्रेजी के इतर हिंदी में भी कई जगह इन कुलनामों को बदले हुए रूप में लिखा जा रहा है. इसलिए स्वाभाविक है कि पुराने वास्तविक कुलनाम अपने मूल उच्चारण से अलग होते जा रहे है.  

सहकर्मियों और पेशेवर समूह के लोगों में शामिल मेरे पास ऐसे कई नामों की सूची है जो मुझे रतूड़ी की जगह हमेशा रतूरी कहते है. जबकि मैंने उन्हें कई बार Raturi का सही उच्चारण रतूड़ी भी बताया. लेकिन उन्होंने अपना लहजा नहीं बदला और अब मेरे सुनने की आदत सी हो गयी है. हिंदी की ही तरह यह मेरी लाचारी भी बन गयी है कि मूल रूप से शहरी और खासकर अंग्रेजी भाषी भद्रजनों के मुख से न चाहते हुए भी मुझे अपना गलत नाम सुनना पड़ता है. जाहिर है मेरी ही तरह मेरे कई और मित्र-बंधू भी इस परेशान से जूझते होंगे.

कल-परसों के एक प्रमुख राष्ट्रीय हिंदी दैनिक (दिल्ली संस्करण) में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी के संदर्भ में एक समाचार प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुआ था. इस समाचार के शीर्षक में भी “खंडूरी” शब्द ही लिखा गया था. हालांकि इस हिंदी समाचार पत्र में ऐसा छपना अपेक्षित भी था, इसलिए मुझे आश्चर्य भी नहीं हुआ. इसकी दो प्रमुख वजहें थी. पहला यह कि इस पत्र ने बहुत पहले ही अपनी सम्पादकीय नीति में हिंग्लिश को प्रमुखता से शामिल करने की नीति अपना ली है. और संभवत: इसी बदलाव के लिए इसे सराहा भी जाता होगा. दूसरा यह कि यह पत्र देश की राजधानी दिल्ली से प्रकाशित होता है. मेरा अनुमान है कि बढती अंग्रेजियत के कारण दिल्ली के कई लोग “खण्डूड़ी” को सही ढंग से पढकर उच्चारित भी नहीं कर सकेंगे. इस पत्र में उक्त खबर और हैडलाइंस को पढ़ने के बाद मेरी जिज्ञासा अब उत्तराखंड से प्रकाशित होने वाले स्थानीय समाचार पत्रों में इस बात को लेकर बढ़ गयी है कि क्या वे भी अपनी ख़बरों में खण्डूड़ी को खंडूरी लिखते होंगे या फिर खण्डूड़ी को खण्डूड़ी ही लिखते होंगे? अगर ये स्थानीय समाचार पत्र भी “खंडूरी” ही लिखते होंगे तो सचमुच मुझे बड़ी निराशा होगी. क्योंकि स्थानीय समाचारपत्रों से यह बिल्कुल अपेक्षित नहीं है जिसकी कई वजहें है. यदि ये स्थानीय समाचारपत्र भी “खंडूरी” (उदाहरण हेतु) ही लिखते होंगे तो मै इतना ही कहूँगा कि क्या अब हमें अपने बदले-बिगड़े और विकृत हुए नयें कुलनामों-उपनामो को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए?  आप भी बताएं, क्या आप इसके लिए तैयार हैं?
Subhash.raturi@gmail.com          

Friday, August 26, 2016

हिंदू नहीं, सनातन धर्म कहिये जनाब




हर्षित कुमार
(harshitkumar68@gmail.com)
श्री अरविन्द ने भारत भूमि पर पद रखा ही था कि उनके चित्त से पुकार उठने लगी, हमारा श्रमिक वर्ग अज्ञान से परा हुआ है। उसके सामने तत्व ज्ञान की समस्या नहीं बल्कि कर्म के साध्य का सवाल हैं ।अब जब कर्म की बात होगी तो क्या मानव कर्म करने के लिए पृथ्वी पर है। यह जानना भी महर्षि के लिए आवश्यक हो गया था। और इस विचार को आत्मसार करने के लिए कौन सी कार्यप्रणाली उपयुक्त होगी ? ये प्रश्न महर्षि के मन में हर समय चलता ही रहा। विषयांतर के लिए पाठक वर्ग क्षमा करेगें। महर्षि अरविन्द के विचार को आज जब वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए तो बहुत ही व्यापक स्तर की सोच विकसित होगी।
हिन्दू धर्म पर उपलब्ध पुस्तकों से ऐसा लगता है जैसे वह किसी पुरातन कालीन अवशेष का वर्णन हों, जिसके अंदर संस्कृत के लम्बे लम्बे शब्द भरे है। मानो भारत तो एक कट्टर दार्शनिक के विचारों का मूर्ति उपासक भी है। किन्तु यदि हम भारत को वैसे ही देखें तो उसके अंदर मौजूद हिंदू धर्म के अनुच्छेदों में यह बड़ी भूल होगी। यह भी दशा उस यात्री जैसी हो जाने का डर है जिसने कई माह तक दिल्ली का  दर्शन किया हो और कल्पना कर लिया भारत अत्युष्ण राष्ट्र है। अगर वो व्यक्ति दक्षिण में और पूर्व में ,नम्बर के और मार्च के महीनें में, और अन्य सब दिशाओं में गया हो तो वो देखेगा कि भारत ठंडा भी है उबला भी है,आद्र भी है और मरुवत् शुष्क भी, भूमध्यसम गर्म खुश्क भी है और सुहावन भी. उसे पता चलेगा कि भारत तो एक पूरा लोक है जिसका वर्णन उतना ही कठिन हैं जितना उसके हिन्दू धर्म का  ।हिन्दू धर्म नाम की कोई चीज है ही नहीं, न ही कोई मत शेष है, न ही वो कोई आध्यात्मिक माप हैं ,वह स्थिति विशेष नहीं दर्शाता, सारी संभव स्थितियां उसमें समाविष्ट हैं। जिसे हिंदू धर्म कहते हैं यह तो पश्चिमवालों का आविष्कार हैं। भारतवासी तो सनातन धर्म कहते हैं। जो प्रमाणिक विधान हैं। वो ये भी जानते है कि उस पर मात्र भारतीयों का अधिकार नहीं बल्कि वो सब का हैं, मुसलमानों, हबिशियो, मनीषियों, ईसाइयो और एनाबैप्टिस्ट तक का भी पश्चिम के लिए जो धर्म का महत्वपूर्ण अंग होता है ,वह है बाहरी स्वरूप वो उसे दूसरे धर्म से अलग करता हैं जिसके कारण मनुष्य मनुष्य तब तक कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट नहीं कहलाता ,जब तक वो निश्चित विचारधारा न रखता हों या उस मत के विशेष नियमों को स्वीकार न करता हो। भारतीयों के लिए तो ये बिलकुल ही गौंण चीज है। उनकी तो मानसिकता रहती हैं कि बाहरी भेदों को मिटा कर सब के साथ उस केन्द्र स्थल पर सम्पर्क करें, जहां सब मिल रहा हो ।          
 
(लेखक – ब्लॉगर मॉस कम्युनिकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट) स्टूडेंट है. इस ब्लॉग पर लिखे यह उनके निजी विचार है. ब्लॉग मोडरेटर का लेखक के विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)