हर्षित कुमार
(harshitkumar68@gmail.com)
श्री अरविन्द ने भारत भूमि पर पद रखा ही था कि उनके चित्त से पुकार उठने लगी, हमारा श्रमिक वर्ग अज्ञान से परा हुआ है। उसके सामने
तत्व ज्ञान की समस्या नहीं बल्कि कर्म के साध्य का सवाल हैं ।अब जब कर्म की
बात होगी तो क्या मानव कर्म करने के लिए पृथ्वी पर है। यह जानना भी महर्षि
के लिए आवश्यक हो गया था। और इस विचार को आत्मसार करने के लिए कौन सी
कार्यप्रणाली उपयुक्त होगी ? ये प्रश्न महर्षि के मन में हर समय चलता ही
रहा। विषयांतर के
लिए पाठक वर्ग क्षमा करेगें। महर्षि अरविन्द के विचार को आज जब वर्तमान
परिदृश्य में देखा जाए तो बहुत ही व्यापक स्तर की सोच विकसित होगी।
हिन्दू धर्म पर उपलब्ध पुस्तकों से ऐसा लगता है जैसे वह किसी पुरातन कालीन अवशेष का वर्णन हों, जिसके अंदर संस्कृत के लम्बे लम्बे शब्द भरे है। मानो भारत तो एक कट्टर दार्शनिक के विचारों का मूर्ति उपासक भी है। किन्तु यदि हम भारत को वैसे ही देखें तो उसके अंदर मौजूद हिंदू धर्म के अनुच्छेदों में यह बड़ी भूल होगी। यह भी दशा उस यात्री जैसी हो जाने का डर है जिसने कई माह तक दिल्ली का दर्शन किया हो और कल्पना कर लिया भारत अत्युष्ण राष्ट्र है। अगर वो व्यक्ति दक्षिण में और पूर्व में ,नम्बर के और मार्च के महीनें में, और अन्य सब दिशाओं में गया हो तो वो देखेगा कि भारत ठंडा भी है उबला भी है,आद्र भी है और मरुवत् शुष्क भी, भूमध्यसम गर्म खुश्क भी है और सुहावन भी. उसे पता चलेगा कि भारत तो एक पूरा लोक है जिसका वर्णन उतना ही कठिन हैं जितना उसके हिन्दू धर्म का ।हिन्दू धर्म नाम की कोई चीज है ही नहीं, न ही कोई मत शेष है, न ही वो कोई आध्यात्मिक माप हैं ,वह स्थिति विशेष नहीं दर्शाता, सारी संभव स्थितियां उसमें समाविष्ट हैं। जिसे हिंदू धर्म कहते हैं यह तो पश्चिमवालों का आविष्कार हैं। भारतवासी तो सनातन धर्म कहते हैं। जो प्रमाणिक विधान हैं। वो ये भी जानते है कि उस पर मात्र भारतीयों का अधिकार नहीं बल्कि वो सब का हैं, मुसलमानों, हबिशियो, मनीषियों, ईसाइयो और एनाबैप्टिस्ट तक का भी पश्चिम के लिए जो धर्म का महत्वपूर्ण अंग होता है ,वह है बाहरी स्वरूप वो उसे दूसरे धर्म से अलग करता हैं जिसके कारण मनुष्य मनुष्य तब तक कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट नहीं कहलाता ,जब तक वो निश्चित विचारधारा न रखता हों या उस मत के विशेष नियमों को स्वीकार न करता हो। भारतीयों के लिए तो ये बिलकुल ही गौंण चीज है। उनकी तो मानसिकता रहती हैं कि बाहरी भेदों को मिटा कर सब के साथ उस केन्द्र स्थल पर सम्पर्क करें, जहां सब मिल रहा हो ।
हिन्दू धर्म पर उपलब्ध पुस्तकों से ऐसा लगता है जैसे वह किसी पुरातन कालीन अवशेष का वर्णन हों, जिसके अंदर संस्कृत के लम्बे लम्बे शब्द भरे है। मानो भारत तो एक कट्टर दार्शनिक के विचारों का मूर्ति उपासक भी है। किन्तु यदि हम भारत को वैसे ही देखें तो उसके अंदर मौजूद हिंदू धर्म के अनुच्छेदों में यह बड़ी भूल होगी। यह भी दशा उस यात्री जैसी हो जाने का डर है जिसने कई माह तक दिल्ली का दर्शन किया हो और कल्पना कर लिया भारत अत्युष्ण राष्ट्र है। अगर वो व्यक्ति दक्षिण में और पूर्व में ,नम्बर के और मार्च के महीनें में, और अन्य सब दिशाओं में गया हो तो वो देखेगा कि भारत ठंडा भी है उबला भी है,आद्र भी है और मरुवत् शुष्क भी, भूमध्यसम गर्म खुश्क भी है और सुहावन भी. उसे पता चलेगा कि भारत तो एक पूरा लोक है जिसका वर्णन उतना ही कठिन हैं जितना उसके हिन्दू धर्म का ।हिन्दू धर्म नाम की कोई चीज है ही नहीं, न ही कोई मत शेष है, न ही वो कोई आध्यात्मिक माप हैं ,वह स्थिति विशेष नहीं दर्शाता, सारी संभव स्थितियां उसमें समाविष्ट हैं। जिसे हिंदू धर्म कहते हैं यह तो पश्चिमवालों का आविष्कार हैं। भारतवासी तो सनातन धर्म कहते हैं। जो प्रमाणिक विधान हैं। वो ये भी जानते है कि उस पर मात्र भारतीयों का अधिकार नहीं बल्कि वो सब का हैं, मुसलमानों, हबिशियो, मनीषियों, ईसाइयो और एनाबैप्टिस्ट तक का भी पश्चिम के लिए जो धर्म का महत्वपूर्ण अंग होता है ,वह है बाहरी स्वरूप वो उसे दूसरे धर्म से अलग करता हैं जिसके कारण मनुष्य मनुष्य तब तक कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट नहीं कहलाता ,जब तक वो निश्चित विचारधारा न रखता हों या उस मत के विशेष नियमों को स्वीकार न करता हो। भारतीयों के लिए तो ये बिलकुल ही गौंण चीज है। उनकी तो मानसिकता रहती हैं कि बाहरी भेदों को मिटा कर सब के साथ उस केन्द्र स्थल पर सम्पर्क करें, जहां सब मिल रहा हो ।
(लेखक – ब्लॉगर मॉस
कम्युनिकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट) स्टूडेंट है. इस ब्लॉग पर लिखे यह उनके निजी विचार
है. ब्लॉग मोडरेटर का लेखक के विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)

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