Wednesday, December 28, 2016

अब नोटबंदी के परिणामों का इन्तजार करें

सुभाष रतूड़ी:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के नाम दिए औचक संदेश के बाद 8 नवम्बर की मध्यरात्रि से देश में 500 और 1000 के पुराने नोटों का चलन बाजार में खत्म हो गया. प्रधानमंत्री मोदी ने इसके लिए जनता से 50 दिन का
वक्त माँगा था, जिसकी मियाद अगले 2-3 दिनों में (31 दिसम्बर) खत्म होने जा रही है. नोटबंदी को शुरू हुए डेढ़ माह से अधिक का समय बीत चुका हैं लेकिन कैश की किल्लत अब भी जारी है. कुछ बड़े लोग अपने पुराने नोटों को ठिकाने लगाने की अंतिम जुगाड़बाजी में अब तक जुटे-डटे हुए है. बैंक और एटीएम की लाइन में अब भी धक्के खा रहे लोगों को देखकर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जरूरतमंदों को उनकी इच्छानुसार उनके पैसे मिलने में अभी और वक्त लग सकता है. नए नोटों की अपर्याप्त छपाई ब्यवस्था, बैंकों तक उनकी धीमी आपूर्ति और जनता के बीच नकदी की ज्यादा मांग को देखते हुए हो सकता है कि स्थिति को सामान्य होने और पटरी पर वापस लौटने में घोषित वक्त नाकाफी साबित हो जाये. इसी तरह नोटबंदी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले स्पष्ठ परिणामों के सामने आने में भी और अधिक समय की जरूरत है, जिसका सबको बेसब्री से इन्तजार है. नोटबंदी की मियाद खत्म होने के साथ ही यह वर्ष भी खत्म होने जा रहा है इसलिए वर्ष 2016 को नोटबंदी वर्ष के रूप में भी याद रखा जायेगा.     
मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले पर कई तरह के मत सामने आ रहे है. ये मत पूरी तरह बंटे हुए है. राजनीतिक लाभ-हानि को मद्देनजर रखते हुए राजनेताओं की राय को छोड़ दिया जाये तो अर्थशास्त्री भी इस मुद्दे पर बंटे हुए लगते है. हालांकि नोटबंदी के पीछे सरकार ने अपने तर्क दिए है कि ऐसा करने से ब्लैक मनी में कमी आएगी. नकली नोटों का सर्कुलेशन खत्म हो जायेगा. भ्रष्ट व आतंकवादी गतिविधियों पर अंकुश लगेगा. इन वजहों से सरकार की मंशा कहीं से गलत नजर नहीं आती फिर भी कई वर्ग ऐसे है जो नोटबंदी से खुश नहीं है. कुछ उद्योगपति और आर्थिक विशेषज्ञ जहां एक ओर इसे देश के व्यापक हित के लिए सही मान रहे है वहीं दूसरे कुछ विशेषज्ञ ये भी मान रहे हैं कि इसके फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था की गति आने वाले कुछ समय के लिए धीमी पड़ जाएगी. अर्थब्यवस्था से जुड़े जो लोग इस फैसले को गलत बता रहे है उनका कहना है कि करीब 2 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी वाले देश की 20 पर्सेंट संख्या और करीब  80 पर्सेंट रोजगार असंगठित क्षेत्र से जुडी हुई है. देश के करीब आधे से अधिक लोगों के पास अभी भी बैंक अकाउंट नहीं हैं और 30 करोड़ से अधिक लोग अभी भी इन्टरनेट का इस्तेमाल नहीं करते, जिसके कारण ज्यादातर लोग इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट नहीं कर पाते हैं. ऐसी व्यवस्था से उद्योग-धंधे में गिरावट होना स्वाभाविक से बात है.
नोटबंदी को लेकर अर्थशास्त्रियों समेत बाजार विशेषज्ञों की अभी भी एक राय नहीं बन पायी है, जबकि इसकी समय सीमा अगले दो दिनों में खत्म होने को है. इस मुद्दे पर अलग अलग राय होने के कारण यही है कि अभी इसके सटीक आंकडें सामने नहीं है. चालू वित्त वर्ष के लिए दिसंबर तिमाही के आंकड़ों के साथ बाजार और कोर्पोरेट परिणाम आने पर ही साफ़ हो सकेगा यह कितना प्रभावकारी रहा है. इसके सटीक परिणाम इस वित्त वर्ष के खत्म होने पर ही सामने आ सकते है. इसलिए भारतीय अर्थब्यवस्था व बाजार पर नोटबंदी के प्रभावों का आंकलन करने में अभी और वक्त की जरूरत है.

राजनीतिक तौर पर देख जाए तो इसमें कोई संदेह नहीं कि एक प्रधानमंत्री और राजनेता के रूप में मोदी ने जो फैसला लिया वह एक ऐसा साहसिक फैसला है जिसे लेने की क्षमता हर राजनेता में नहीं हो सकती. अगर जनता को यह रास न आया तो यह एक जोखिम भरा फैसला भी है. यह राजनीतिक लाभ-हानि से जुड़ा गणित भी है. इसलिए ऐसे फैसले से पहले एक राजनेता को हजारों बार सोचना पड़ता है. जाहिर है, प्रधानमंत्री ने भी जरूर सोचा होगा. इस कारण उनकी मंशा पर सवाल उठाने की गुंजाइश कम है. इसलिए फिलहाल यही कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार समेत तामाम तरह के राष्ट्रीय “रोगों” के खात्मे के लिए उन्होंने नोटबंदी के रूप में जिस कड़वी दवाई का डोज देश की जनता को दिया है उसके प्रभाव महसूस होने अभी बाकी है. शायद जनता, कैशलैस या लेसकैश की सरकारी अपील या थैरेपी को अपनाकर अब प्रधानमंत्री के इस मकसद को सफल बना सकती है. (By Subhash Raturi)

Monday, December 26, 2016

नोटबंदी: सफलता और संशय

हर्षित कुमार:
अजीब क्या नहीं है, जो हमे अच्छा नहीं लगता वही अजीब है। जिसमें हमारी व्यक्तिगत् स्वार्थ सिद्ध नहीं होती वो काम अजीब है। वर्तमान परिदृश्य में विमुद्रिकरण भी एक अजीव बात हो सकती है, क्योंकि सरकार की नीति विपक्ष के लिए फल दाई कम और गुठली दायक अधिक है। वहीं सामाजिक तौर पर जनसामान्य के लिए मानों किसी कैन्सर की बीमारी के लिए दवाई दी गई हो। अब परिणाम की कल्पना तुरन्त की जाय तो ये भी संभव नही है. अगर सरकार 50 दिन के साथ सुधारने कि बात करती है तो मुझे कुछ परेशानी होती है मुझे लगता है ये परेशानी दूर होने वाली नहीं है और न होनी चाहिए। अगर सरकार पर्याप्त मात्रा में पैसे
छापना शुरू कर दे  और वो बैंक के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँच भी जाए तो  फिर प्रचलित मुद्रा बाजार के बजाय स्टॉकर के पास जमा होगा और भारतीय आर्थिक नीति को फिर से उसी गर्त में जाना होगा  जो हाल आज तक है। फिर सुधार किस बात की। सरकार जब तक प्रचलित मुद्रा के मात्रक को कण्ट्रोल नहीं करेगी तब तक आर्थिक असमानता बनी रहेगी। क्या होता है, जब आप बाजार को पूर्ण रूप से कैश से युक्त करते है तो  
सरकार के टेंडर आधारित मुद्रा के समानांतर एक मुद्रा कारोबार शुरू हो जानता है। जो बाजार पर आधारित होता है जिसमे जिसे बैंकिंग प्रक्रिया से नहीं गुजरनी पड़ती है और वो बाजार के बीच मंहगाई लेकर आती है। वो पैसा बाजार में घूमता रहता है। वही दूसरी तरफ सरकार की नीति आधारित मुद्राओं की किल्लत बढ़ जाती है तब जाकर सरकार फिर से बाजार में नए नोट को छाप कर भेज देती है। भारत में 60 साल तक यही होता रहा है, मुद्रा जमा होती रही ।बैंक ट्रांजेक्शन घटता रहा और रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया पैसे छापती रही। जिस कारण से भारत के अंदर अमीर अमीर होता गया और गरीब गर्त को प्राप्त करता चला गया. जिस कारण से काले कारोबार फलता फूलता रहा ।
जब प्रधानमंत्री मोदी जी कह रहे है कि छोटे तबके का महत्व बढ़ेगा। इसकी सम्भावनाएँ भी पर्याप्त है। आर्थिक सर्वेक्षण 2001 -2 के अनुसार जम्मू कश्मीर में सबसे कम निर्धनता अनुपात है 3.5 फिसदी। वहीं बिहार और उड़ीसा सबसे आगे है निर्धनता अनुपात में बिहार 42.6 प्रतिशत, उड़ीसा 47.7, पश्चिम बंगाल 27.7प्रतिशत और उत्तर प्रदेश 31.2प्रतिशत हैं। अब देखना ये है कि जिन राज्यों में सबसे अधिक निर्धनता है और वहां बीजेपी से इतर सरकार है उन राज्यों ने भारत सरकार के नीति का समर्थ किया है। इस के पीछे का तर्क है पिछड़ा प्रदेश अपने को समृद्ध बनाना चाहता है वही पश्चिम बंगाल ,दिल्ली ,और जम्मू कश्मीर सरकार के नीति के विरुद्ध इस लिए है क्योंकि इनकी आर्थिक स्थिति भारत के अन्य राज्यों से बेहतर है ।
विश्व विकास रिपोर्ट 2001 के अनुसार एक डॉलर से कम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन कम पाने के मामले में भारत पाकिस्तान से आगे है। पाकिस्तान की 17 प्रतिशत आवादी एक डॉलर से कम प्रतिदन कमाती है वही भारत में 35.5 प्रतिशत आवादी एक डॉलर से कम कमाती है। एक तरफ विकास और दूसरी तरफ आर्थिक अमानांताए का बढ़ना ये तब जाकर सम्भव हुआ जब कैश स्टॉक को बल मिला।

मुझे लगता है सरकार का पहला कदम कहि न कहि सफल है। इसका परिणाम देखने को आगे मिल सकता है ।विरोध के स्वर जिनके हसिया कचिया से शुरू होती थी और आर्थिक सामाजिक समानता के लिए नक्सलबाड़ी की परिकल्पना पर आधारित थी उनका भी विरोध आर्थिक दोहन प्रिक्रिया को बहाल करने के लिए है और सरकार को घेरने के लिए है ।अब जब हम कहते है असगठित मजदूर की बात कृषिक की बात तो तत्काल ध्यान आता है परेशानी तो होगी लेकिन दूरगामी परिणाम क्या होगा ।इसपर भी सोचने  का विषय है ।जब आप कहते है भारत की 70 प्रतिशत आवादी कृषि आधारित जीवन जीती है तो उस 70 प्रतिशत आवादी के लिए कौन सी योजना 60 साल में चली जिससे उनके स्थिति में सुधार हो जाए। लेकिन अब ग्रामीण जीवन शैली में सुधार आएगी इसका एक पक्ष है ।BPLबिलों पोभ्टि लाईन अभी भारतीय समाज की ये स्तिथि है समृद्ध परिवार भी BPL और APL के लाईन में लगा है और कहि न कहि फायदा भी ले रहा है। कई तो अंतोदय आधारित योजना का लाभ लेकर भी समाजिक तौर पर समृद्ध है। अगर सरकार की नीति जनधन आधारित हुए तो समाज को अत्यधिक लाभ मिलने बाली है। सरकार को गरीबी निर्धारण में आसानी होगी और गरीबी को आसानी से समझा जा सकेगा। जब सरकार तय कर लेगी जिस जनधन खाते में 39000 हजार से ज्यादे का कारोबार हो रहा है उसे गरीबी रेखा के अंतर्गत नहीं मानी जाएगी। और उन्ही व्यक्ति को गरीबी होने का फायदा मिलेगा जो वास्तविक गरीब होगा।
अब देखना होगा सरकार के कार्यप्रणाली कितने तन्मयता के साथ नीति पर खड़ी रहती है या विरोधी के विरोध के बिच कहि पीछे हट जाती है। नीति का निर्धारित अगर सफलता के साथ होगा तो सरकार की सफलता जनसामान्य को नजर आएगी।
(लेखक ब्लॉगर मॉस कम्युनिकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट) स्टूडेंट है. इस ब्लॉग पर लिखे यह उनके निजी विचार है. ब्लॉग मोडरेटर - सम्पादक का लेखक के विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)

Saturday, December 17, 2016

सैक्सी बराबर दमदार माल

हर्षित कुमार
आप भी माल हो, आप के लिए वो भी माल है। कोई लडकी भी माल है, दुकान के खीरे व सब्जी भी माल है। आजकल जहां देखों वहीं माल है। ये माल शब्द आधुनिक समाज के लिए अब अतिविशिष्ट शब्द संरचना हैं।
कुछ समय पहले की तो बात है, जब "sexy" शब्द अभद्र और अश्लील लगता था। लेकिन अब देखिए न, "sexy" शब्द प्रतिष्ठा के उपरी पायदान का प्रतीक बन गया हैं।इसलिए कह रहा हूँ, इस नए शब्द "माल" को भी सैक्सी शब्द की तरह ही स्वीकार कर लीजिए। क्योंकि आप के लिए भी कोई माल है और आप भी किसी के माल है। फिर परहेज क्यों? जब मानसिकता परिवर्तन के तौर पर माल शब्द बना और इसका चलन बढ़ा है तो इसे स्वीकार भी कर लीजिए।

क्या गजब माल है, ठोस माल है, ताजा माल है, महंगा है पर माल गजब का है, माल नहीं है... इस तरह की बातें कई जगह सुनने को मिलती है. खासकर तब या तो कोई बाजार से सम्बंधित बात हो होती या फिर कोई लड़का अपने दोस्त से किसी लडकी या महिला के बारे में बात कर रहा होता है. लड़के या महिला के लिए माल कहने का मतलब उसकी “तारीफ़” करने से होता है.  भाई माल ही तो है, इसमें नाराज होने की बात नहीं है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, लोग कह रहे है. बाजार का चलन कह रहा है, युवा कह रहे है। माना कोई महिला बाजार गई कुछ खरीदने। आप कहेंगे वो समान ख़रीदने गई। लेकिन जिस दुकानदार के पास गई उसके लिए वो उसका माल ख़रीदने गई। वो दुकानदार कहता है “मैम क्या माल है,ये देखिए न, आप भी क्या याद करोगी।“
कोई जाता है सब्जीवाले भैया के पास। पूछते है, भैया फलां सब्जी कैसे है. जबाब मिलता है 50 या ६० रु किलो. सब्जी वाला यही नहीं रुकता, सब्जी की तारीफ़ में कहता है – ताजा माल है, टाइट है, नया और अच्छा माल है. ये लीजिए न एक बार ले जाएगें तो बार बार आयेंगे. अब फल वाले भैया के पास चलते है। भैया मौसमी कैसे है। जबाब मिलता है - अरे मैम देखने की बात क्या है, इसका तो अपना मजा है। पूरी मार्किट में इस माल जैसा कोई माल नही है, मैम बहुत मिठी है। 

दरअसल, आज के परिवेश में माल शब्द ने कई रूपक धारण कर लिए है. इसका इस्तेमाल भी ब्यापक रूप में होने लगा है. कई जगह सभ्य और सौम्य युवा भी सैक्सी शब्द के स्थान पर इस शब्द (माल) का खूब इस्तेमाल करते है. मॉल कल्चर में मनचलों व दिलफेंक लड़कों द्वारा लड़कियों को माल कहा जाने लगा है, जिस पर कुछ तो बिगड़ जाती है और कुछ तारीफ़ में खुश भी हो जाती है. कुछ वर्षों पहले सैक्सी शब्द पर लड़कियों की इसी तरह की गरम-नरम प्रतिक्रिया देखने को मिलती थी. लेकिन अब अधिकतर लडकियां सैक्सी शब्द का बुरा नहीं मानती, बशर्ते उसे सभ्य तरीके  से कहा जाए. लगता है कि ऐसा ही कुछ माल शब्द के साथ भी होना चाहिए. सब्जी या बाजार वाले परिवेश में तो माल शब्द को स्वीकार किया जाने लगा है. लडकी की तारीफ में और सैक्सी शब्द के सामान्तर या समानार्थक इसे कब तक स्वीकार किया जाएगा, यह देखना अभी बाकी है. देखते है माल शब्द में आखिर कितना माल (दम) है और यह सैक्सी बराबर दमदार कब तक बनता है.       
 (लेखक के बारे में : हर्षित कुमार मॉस कम्युनिकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट) के स्टूडेंट है. इस ब्लॉग में लिखे यह उनके निजी विचार है. ब्लॉग मोडरेटर अथवा सम्पादक का लेखक के विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)