Monday, December 26, 2016

नोटबंदी: सफलता और संशय

हर्षित कुमार:
अजीब क्या नहीं है, जो हमे अच्छा नहीं लगता वही अजीब है। जिसमें हमारी व्यक्तिगत् स्वार्थ सिद्ध नहीं होती वो काम अजीब है। वर्तमान परिदृश्य में विमुद्रिकरण भी एक अजीव बात हो सकती है, क्योंकि सरकार की नीति विपक्ष के लिए फल दाई कम और गुठली दायक अधिक है। वहीं सामाजिक तौर पर जनसामान्य के लिए मानों किसी कैन्सर की बीमारी के लिए दवाई दी गई हो। अब परिणाम की कल्पना तुरन्त की जाय तो ये भी संभव नही है. अगर सरकार 50 दिन के साथ सुधारने कि बात करती है तो मुझे कुछ परेशानी होती है मुझे लगता है ये परेशानी दूर होने वाली नहीं है और न होनी चाहिए। अगर सरकार पर्याप्त मात्रा में पैसे
छापना शुरू कर दे  और वो बैंक के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँच भी जाए तो  फिर प्रचलित मुद्रा बाजार के बजाय स्टॉकर के पास जमा होगा और भारतीय आर्थिक नीति को फिर से उसी गर्त में जाना होगा  जो हाल आज तक है। फिर सुधार किस बात की। सरकार जब तक प्रचलित मुद्रा के मात्रक को कण्ट्रोल नहीं करेगी तब तक आर्थिक असमानता बनी रहेगी। क्या होता है, जब आप बाजार को पूर्ण रूप से कैश से युक्त करते है तो  
सरकार के टेंडर आधारित मुद्रा के समानांतर एक मुद्रा कारोबार शुरू हो जानता है। जो बाजार पर आधारित होता है जिसमे जिसे बैंकिंग प्रक्रिया से नहीं गुजरनी पड़ती है और वो बाजार के बीच मंहगाई लेकर आती है। वो पैसा बाजार में घूमता रहता है। वही दूसरी तरफ सरकार की नीति आधारित मुद्राओं की किल्लत बढ़ जाती है तब जाकर सरकार फिर से बाजार में नए नोट को छाप कर भेज देती है। भारत में 60 साल तक यही होता रहा है, मुद्रा जमा होती रही ।बैंक ट्रांजेक्शन घटता रहा और रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया पैसे छापती रही। जिस कारण से भारत के अंदर अमीर अमीर होता गया और गरीब गर्त को प्राप्त करता चला गया. जिस कारण से काले कारोबार फलता फूलता रहा ।
जब प्रधानमंत्री मोदी जी कह रहे है कि छोटे तबके का महत्व बढ़ेगा। इसकी सम्भावनाएँ भी पर्याप्त है। आर्थिक सर्वेक्षण 2001 -2 के अनुसार जम्मू कश्मीर में सबसे कम निर्धनता अनुपात है 3.5 फिसदी। वहीं बिहार और उड़ीसा सबसे आगे है निर्धनता अनुपात में बिहार 42.6 प्रतिशत, उड़ीसा 47.7, पश्चिम बंगाल 27.7प्रतिशत और उत्तर प्रदेश 31.2प्रतिशत हैं। अब देखना ये है कि जिन राज्यों में सबसे अधिक निर्धनता है और वहां बीजेपी से इतर सरकार है उन राज्यों ने भारत सरकार के नीति का समर्थ किया है। इस के पीछे का तर्क है पिछड़ा प्रदेश अपने को समृद्ध बनाना चाहता है वही पश्चिम बंगाल ,दिल्ली ,और जम्मू कश्मीर सरकार के नीति के विरुद्ध इस लिए है क्योंकि इनकी आर्थिक स्थिति भारत के अन्य राज्यों से बेहतर है ।
विश्व विकास रिपोर्ट 2001 के अनुसार एक डॉलर से कम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन कम पाने के मामले में भारत पाकिस्तान से आगे है। पाकिस्तान की 17 प्रतिशत आवादी एक डॉलर से कम प्रतिदन कमाती है वही भारत में 35.5 प्रतिशत आवादी एक डॉलर से कम कमाती है। एक तरफ विकास और दूसरी तरफ आर्थिक अमानांताए का बढ़ना ये तब जाकर सम्भव हुआ जब कैश स्टॉक को बल मिला।

मुझे लगता है सरकार का पहला कदम कहि न कहि सफल है। इसका परिणाम देखने को आगे मिल सकता है ।विरोध के स्वर जिनके हसिया कचिया से शुरू होती थी और आर्थिक सामाजिक समानता के लिए नक्सलबाड़ी की परिकल्पना पर आधारित थी उनका भी विरोध आर्थिक दोहन प्रिक्रिया को बहाल करने के लिए है और सरकार को घेरने के लिए है ।अब जब हम कहते है असगठित मजदूर की बात कृषिक की बात तो तत्काल ध्यान आता है परेशानी तो होगी लेकिन दूरगामी परिणाम क्या होगा ।इसपर भी सोचने  का विषय है ।जब आप कहते है भारत की 70 प्रतिशत आवादी कृषि आधारित जीवन जीती है तो उस 70 प्रतिशत आवादी के लिए कौन सी योजना 60 साल में चली जिससे उनके स्थिति में सुधार हो जाए। लेकिन अब ग्रामीण जीवन शैली में सुधार आएगी इसका एक पक्ष है ।BPLबिलों पोभ्टि लाईन अभी भारतीय समाज की ये स्तिथि है समृद्ध परिवार भी BPL और APL के लाईन में लगा है और कहि न कहि फायदा भी ले रहा है। कई तो अंतोदय आधारित योजना का लाभ लेकर भी समाजिक तौर पर समृद्ध है। अगर सरकार की नीति जनधन आधारित हुए तो समाज को अत्यधिक लाभ मिलने बाली है। सरकार को गरीबी निर्धारण में आसानी होगी और गरीबी को आसानी से समझा जा सकेगा। जब सरकार तय कर लेगी जिस जनधन खाते में 39000 हजार से ज्यादे का कारोबार हो रहा है उसे गरीबी रेखा के अंतर्गत नहीं मानी जाएगी। और उन्ही व्यक्ति को गरीबी होने का फायदा मिलेगा जो वास्तविक गरीब होगा।
अब देखना होगा सरकार के कार्यप्रणाली कितने तन्मयता के साथ नीति पर खड़ी रहती है या विरोधी के विरोध के बिच कहि पीछे हट जाती है। नीति का निर्धारित अगर सफलता के साथ होगा तो सरकार की सफलता जनसामान्य को नजर आएगी।
(लेखक ब्लॉगर मॉस कम्युनिकेशन (पोस्ट ग्रेजुएट) स्टूडेंट है. इस ब्लॉग पर लिखे यह उनके निजी विचार है. ब्लॉग मोडरेटर - सम्पादक का लेखक के विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है)

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