- कोरोना संकट का मुंह ताकने वाले राष्ट्राध्यक्षों को उनकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना नेतृत्व के लिये हमेशा कोसा जायेगा।
सुभाष रतूड़ी:
कोरोना वायरस या कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने
इस समय समूचे मानव जगत को भयभीत किया हुआ है। इसका खौफ लगातार बढ़ रहा है। इसका
नकारात्मक प्रभाव मानवीय समाज के अलावा सभी वैश्विक बाजारों, अर्थव्यस्थाओं व उद्योगों
पर साफ देखा जा रहा है। इसे हम कोरोना का आर्थिक संक्रमण भी कह सकते हैं। भारत की
बात करें तो इस संकट ने इंडिया इंक के सामने भी अचानक कुछ ऐसी नई चुनौतियां पेश कर
दीं है, जिसकी कल्पना हमारी सरकार समेत देश के बड़े
ईकोनॉमिस्ट और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स ने कभी नहीं की थी। देश का कारोबारी माहौल कुछ
मोर्चों पर पहले से ही इकॉनामिक स्लोडाउन के सेंटीमेंट्स से जूझ रहा था। इसी बीच
कोरोना हमारे सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य पर अचानक हमलावर हुआ और पूरे माहौल में अभूतपूर्व
भय बन गया। यह भय सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर सबसे ज्यादा है। लेकिन भारत के
मायनों में कोरोना का मौजूदा भय विश्व के अन्य देशों से थोड़ा अलग और कम है।
वर्तमान समय में कोरोना को लेकर यदि समूचे वैश्विक परिदृश्य का आकलन किया जाये तो
भारत के लिये यह संकट भविष्य में कुछ नई सौगात देने वाला जैसा लगता है, जिसका
फायदा हमें देश की औद्योगिक गतिविधियों और अर्थतंत्र पर दिखाई देगा। हालांकि इसके
लिये हमें थोड़ा इंतजार करना होगा। यह फायदा भारत को कोराना के खिलाफ लड़े जा रहे
युद्ध कौशल के कारण पूरे विश्व से मिल सकता है।
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| लॉकाडाउन में IGI Airport Photo by Subhash Raturi |
भारत का युद्ध कौशल:
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत क्रय शक्ति के
दृष्टिकोण से विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। जनसंख्या के लिहाज से
विश्व का दूसरा बड़ा देश होने के नाते भारत में उत्पादन और खपत के अवसर भी सबसे
ज्यादा है। भारत अपनी लगातार विकसित होती अर्थव्यवस्था, अनुकूलन परिस्थितियों और
अपार श्रम शक्ति के कारण घरेलू तथा विदेशी निवेश के लिए सुनहरे और सुरक्षित अवसर
मुहैया कराता है। उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर भारत
सर्वाधिक उदार तथा पारदर्शी नीतियां भी अपनाता रहा है। लेकिन कोरोना के मौजूदा
संकट के कारण भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों में हर तरह के निवेश,
उत्पादन और खपत इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं, जिस कारण कई देशों के समक्ष
भविष्य के लिये नया भय और अनिश्चितता का माहौल भी बन रहा है। लेकिन कोरोना के
खिलाफ भारत का युद्ध कौशल और ब्यूह रचना की तत्कालिक रणनीति उसे अन्य देशों से अलग करती है। इसलिये
भारत के संबंध में यह भय बेहद अल्पकालीन साबित हो सकते है, जबकि विश्व के अन्य
बड़े-बड़े देशों को इस संकट के कारण कई नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
यही नहीं अमेरिका जैसी मजबूत अर्थव्यवस्था और सर्वशक्ति युक्त देश को भी इससे
उबरने में कुछ विकासशील देशों से अधिक समय लग सकता है।
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| लॉकडाउन में दिल्ली की सूनी सड़क Photo Social Media |
लक्षित कारोबार और योजनाएं:
निसंदेह, कोरोना के कारण विश्व के साथ-साथ भारत
को भी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ रहा है, भले ही यह तुलनात्मक तौर पर कम हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत इस लड़ाई में
कई देशों से आगे है और जीत के काफी करीब पहुंच चुका है। कोरोना के कारण फिलहाल
भारत की टूरिज्म, हॉस्पिटीलिटी, एविऐशन,
ट्रांपोर्टेशन, होटल-रेस्टोरेंट्स,
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, लग्जरी प्रोडक्ट्स आदि से जुड़ी इंडस्ट्रीज सबसे ज्यादा
प्रभावित है। लॉकडाउन्स के कारण इंडस्ट्रीयल प्रोडक्शन और गुड्स सप्लाई भी लगभग
बंद है। खाद्यान्न-दवाई जैसी ऐशंसियल चीजों को छोड़कर, समूची
गुड्स मैन्यूफैक्चरिंग और सर्विस इंडस्ट्री कोरोना के दुष्परिणामों से जूझ रही है।
कोरोना ने हमारे लक्षित कारोबार, आर्थिक आंकड़ों और योजनाओं
को कुछ समय के लिये पूरी तरह उलट दिया है और नुकसान लगातार बढ़ता जा रहा है। लेकिन
इस तरह की हताशाओं और निराशाओं के बीच भारत के पक्ष में ऐसे कई फैक्टर्स हैं, जो
भविष्य के लिये हमें कई सुखद संकेत देते हैं।
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| Photo Social Media |
चुनौतियों के साथ अवसर भी:
विज्ञान के संदर्भ में जिस तरह आवश्यकता आविष्कार
को जन्म देती है सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में उसी तरह हर नई चुनौती नये अवसरों का
भी सृजन करती है। लेकिन ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अवसर हमेशा एक निश्चित समय
की सीमा से बंधे होते हैं, जिसे निश्चित समायाविधि में लपका जाये, तो ही यह पूर्ण
लाभाकारी होता है। कोरना महामारी भी अपने साथ समस्याएं और चुनौतियां लेकर आयी। समूचे
विज्ञान के लिये यह नई औषधियों के आविष्कार का कारण बनी है जबकि सामाजिक और आर्थिक
संदर्भ में इसने कई मोर्चों पर नये अवसर भी पैदा किये हैं। इन अवसरों में दुनियाभर
के देशों की नेतृत्व शक्ति, वहां के सिस्टम्स की प्रबंधन दक्षता के अलावा
राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक शक्ति की आजमाइश के साथ हर उस वर्टिकल्स,
सैग्मेंट्स और ह्यूमन एलिमेंट्स की जांच-परख भी शामिल है, जिनसे मिलकर कोई राष्ट्र
मजबूत और महान बनता है। तबलीगी जमात की करतूत जैसे निंदनीय मामलों के साथ एकाध
अपवादों को छोड़ दिया जाये तो कोरोना संकट के खिलाफ भारत का युद्ध दुनिया में अब
तक अव्वल और आदर्श रहा है।
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| कोरोना को लेकर पीएम मोदी ने पांच बार राष्ट्र को संबोधित किया, जो एक तरह का नया रिकार्ड है |
पीएम मोदी की अपील का जादू:
कोरोना के खिलाफ भारत के अब तक के युद्ध कौशल ने
पीएम मोदी के वैश्विक नेता के कद और नेतृत्व क्षमता को पहले के मुकाबले ज्यादा
बड़ा, सशक्त और स्वीकार्य भी बनाया है। शानदार ब्यूह रचना के कारण विश्व में भारत के प्रति सम्मान और विश्वास भी बढा है। कई विकसित देश, वहां के नेता और कई बड़े
राष्ट्राध्यक्ष भी अब अचानक मोदी और भारतीयों के मुरीद बन गये हैं। दरअसल, मोदी का
मुरीद बनने की वजहें भी साफ है। मुरीद बनने वालों में दो तरह के नये विदेशी वर्गों
का जिक्र पहले जरूरी है। एक वो, जो मोदी की अगुवाई में कोरोना के खिलाफ भारत
द्वारा उठाये गये कदमों की निस्वार्थ होकर तारीफ कर रहे हैं और दूसरा वो, जो
थोड़ा-बहुत स्वार्थ रखकर ऐसा कर रहे हैं। दरअसल दूसरा वर्ग स्वार्थ के साथ
दूरदृष्टिता भी रखता है। यह वैश्विक वर्ग जानता है कि निकट भविष्य में भारत उनके
देश के लिये सबसे बड़ी जरूरत बनने है। वे लोग भी कम आश्चर्य में नहीं हैं, जो कोरोना
को ‘भगाने’ के लिये ‘मोदी मंत्र’ मतलब शाम को घंटी-शंख, थाली-ताली
बजाने को ‘टोटका’ कहकर खिल्ली
उड़ा रहे थे। उनकी खिल्ली की जगहंसाई तब हुई, जब महज कुछ ही दिनों के अंदर ही मोदी
ने फिर से कोरोना के खिलाफ रात को 9 बजे 9 मिनट तक कैंडल-दीपक, टार्च-मोबाइल जलाने
का ‘अमोघ मंत्र’ दिया। देश की
जनता ने इन दोनों मौकों पर मोदी की अपील पर जो जबरदस्त जोश दिखाया, वह भी एक तरह
से इतिहास में दर्ज हो गया। जोश इतना कि भारत की जनता में थाली-ताली का जमकर आनंद
लिया और कैंडल-दीपक के साथ पटाखे भी छोड़े। वैश्विक संकट के समय भारत में मनाये
गये इन दो ‘जश्नों’ ने भी मोदी
समेत भारतीयों के नये प्रंशसकों की सूची तैयार की। देशी-विदेशी संस्थाएं और कई लोग
हैरान हैं कि 21वीं सदी में भी भारत के पढ़े-लिखे लोगों पर भी आखिर मोदी मैजिक वह
भी टोटके जैसी बातें कैसे काम करती है? वे इस बात को भी
नहीं पचा पा रहें हैं कि अल्प संसाधन और विशाल जनसंख्या वाला भारत आखिर कोरोना के
सामने कैसे इतने दमखम और बहादुरी से खड़ा और अडिग है? कैसे
आपातकाल में ‘गैर-वैज्ञानिक, तथ्यहीन और आधारों से परे’ मोदी की अपील अधिसंख्य भारतीयों के मन में घर कर जाती है?
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| KOVID-19 पर सार्क सम्मेलन को संबोधित करते पीएम मोदी |
दुनिया को जोड़ने की पीएम मोदी की पहल:
कोरोना के संकट काल में अब यदि घर (भारत) से बाहर
झांके तो देखने को मिलेगा कि यहां भी पीएम मोदी की अगुवाई में भारत ने बड़ी उदारता
दिखाते हुए विश्वभर एक नई प्रतिष्ठा और अभूतपूर्व जीत हासिल की है। “सर्वे भवन्तु सुखीन” और “वसुधैव कुटुम्बकम” को अपनाते हुए भारत की
सनातन संस्कृति और संस्कार को और ज्यादा प्रासंगिक बनाते हुए मोदी ने ही सबसे पहले
कोविड-19 की चिंताओं और इसके निवारण को लेकर सार्क देशों का सम्मेलन आयोजित करने
की पहल की। इसमें सबसे बड़ी बात कि धुर विरोधी पाकिस्तान को भी बकायदा न्यौता दिया
गया। इस सम्मेलन में ही सबसे पहले कोविड-19 आपातकालीन फंड बनाने की कवायद भारत
द्वारा की गयी, जो काफी सफल रहा और विश्व भर में सराहा गया। कोरोना की भयावहता को
भांपते हुए मोदी ने अपना प्रयास सार्क देशों तक ही सीमित नहीं रखा और बड़ा कदम
उठाते हुए शीघ्र जी-20 देशों का वर्चुअल सम्मेलन बुलाने की भी पहल कर डाली। पीएम मोदी
ने ही इस सम्मेलन में कोरोना के खिलाफ दुनिया के तमाम देशों को एकजुट होकर लड़ने
का प्रस्ताव भी दिया। कोरोना वायरस के लेकर अमेरिका शुरूआत से ही चीन पर हमलावर
रहा है लेकिन जी-20 देशों की वीडियो कांफ्रेंसिंग में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ किया
कि ऐसी बातों का कोरोना संकट के समय कोई मतलब नहीं है। भारत के रवैये से चीन को भी
राहत मिली।
भारत की सार्वजनिक सराहना:
कोरोना के खिलाफ सभी देशों को जोड़ने की पहल के
अलावा पीएम मोदी कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से भी निरंतर बात करते रहे, जो अब
भी जारी है। इन सबका नतीजा ये है कि कोरोना महामारी के खिलाफ हर तरह की लड़ाई में
मदद करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायली
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, ब्राजील के राष्ट्रपति
बोल्सोनारों के अलावा स्पेन, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई देश और उनके
राष्ट्राध्यक्ष अब दिल खोल कर भारत की तारीफ कर रहे हैं और सार्वजनिक मंच पर
बेहिचक भारत का धन्यवाद भी कर रहे हैं। संकट के समय में हर देश और व्यक्ति का हित
सोचने की भारत की सनातन सीख दुनिया भर में आज फिर जीवंत हो उठी है और हैरान-परेशान
हर राष्ट्र इसकी सराहना कर रहा है।
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| लॉकडाउन के दौरान सुनसान T3 (डिपार्चर), IGI Airport : Photo Subhash Raturi |
भारत का वैश्विक नेतृत्व:
कोरोना के संकट काल में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर भारत ने जिस तरह से एक जिम्मेदार और महत्पवूर्ण मित्र राष्ट्र की भूमिका
निभाई, उससे वैश्विक समुदाय के बीच भारत के कद में एकाएक अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हो
गयी है। हालांकि भारत के इन मानवतावादी कदमो से कुछ राजनैतिक और कूटनीतिक आहट भी
मिल सकती है, जो आज के वैश्विक चाल-चलन के तौर-तरीकों के अनुकूल है, इसलिये इन्हें
पूरी तरह प्रासंगिक ठहराया जा सकता है। बहरहाल, कोरोना संकट के समय भारत जिस उदारता
के साथ सभी देशों के हितों को लेकर आगे चला उसने भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता
को भी उजागर कर दिया है। इन सभी कारणों से भारत के प्रति सभी देशों की निष्ठा और
विश्वसनीयता में भी इजाफा हुआ है, जिसका दीर्घकालीन फायदा भी भारत को मिलने वाला
है।
अवसरों की चूक और खास किस्म के मुगालते या अहम में उलझे रहने के कारण इन दोनो देशों पर कोरोना की जबरदस्त मार पड़ी है
अमेरिका-चीन की चूक, भारत की सीख:
कोरोना संकट के समय सबसे अधिक मददगार बनने वाले
भारत को विश्व अब एक नई, सकारात्मक और आशा भरी नजरों से देख रहा है। भारत के प्रति
इस नये नजरिये में कई देशों नया विश्वास भी शामिल है, जबकि इसके उलट कुछ देशों के
प्रति वैश्विक समुदाय का नजरिया ज्यादा सशंकित और नकारात्मक हो उठा है। जिसका
मुख्य कारण इन देशों द्वारा संकट की पहचान और उसके रोकथाम के अवसर को गंवाना है,
साथ ही अंत तक किसी मुगालते को पाले रखना है। इसका अव्वल उदाहरण दो शक्तिशाली देश
अमेरिका और चीन है। अवसरों की चूक और खास किस्म के मुगालते या अहम में उलझे रहने
के कारण इन दोनो देशों पर कोरोना की जबरदस्त मार पड़ी है, जबकि इन दोनों देशों के
पास ही दुनिया के सबसे अव्वल संसाधन, इंफ्रास्ट्रकचर और अर्थतंत्र मौजूद हैं। इनके
विपरीत बेहद कम संसाधनों के बावजूद भी भारत ने जिस तरह से इस संकट को हराने का काम
किया, उनसे खुद ये बड़े देश सीख ले रहे है।
कोरोना के संकट का मुंह ताकते रहने वाले विश्व के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को इतिहास में उनकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना नेतृत्व के लिये हमेशा याद किया जायेगा
कई समीकरणों में उलझन:
कुल मिलाकर, कोरोना के संकट का मुंह ताकते रहने
वाले विश्व के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों को इतिहास में उनकी लापरवाही और
गैर-जिम्मेदाराना नेतृत्व के लिये हमेशा याद किया जायेगा। जबकि कई देश एक सच्चे
हितैशी के रूप में भारत को भविष्य में याद करते रहेंगे। कोरोना के संकट ने कई
देशों के आपसी व मित्रवत संबंधों को भी संकट में डाल दिया है। लेकिन इस संकट के
खिलाफ भारत जिस तरह खड़ा हुआ और आगे बढ़ा है, उससे कई देश भारत के साथ अब कदमताल
करने को तैयार हैं। दरअसल, कोरोना ने केवल मानवीय जीवन को ही संकट में नहीं डाला,
बल्कि कई देशों के राजनयिक और आर्थिक संबंधों के समीकरणों को भी उलझा दिया है। अब
सभी देश इन समीकरणों को अपने अनुकूल बनाने और उन्हें पुन: परिभाषित करने में जुट गये है, जिसका सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिलने
वाला है।
धीमी रफ्तार से पांव फैला रहे कोरोना को यदि भारत शीघ्रता से रोक लेता है तो निश्चित ही सभी देशों के लिये भारत निवेश का सबसे पसंदीदा गंतव्य स्थल बन जायेगा
एफडीआई में बढ़ोत्तरी:
कोरोना फैक्टर भविष्य की कई सारी चीजों को तय
करने वाला है। धीमी रफ्तार से पांव फैला रहे कोरोना को यदि भारत शीघ्रता से रोक
लेता है तो निश्चित ही सभी देशों के लिये भारत निवेश का सबसे पसंदीदा गंतव्य स्थल
बन जायेगा, जो एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के रूप में होगा। कोरोना के खिलाफ
भारत की अब तक की मजबूत लड़ाई के आधार पर कुछ देशों ने भारत में नये निवेश की
इच्छाएं भी जता दी हैं। कोरोना फैक्टर्स ने इन्हें अपनी योजनाओं की पुनर्समीक्षा
करने को विवश किया। इसका ताजा उदाहरण जापान है। बताया जाता है कि जापान ने अपना
2.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का उत्पादन कार्य चीन से शिफ्ट करने का मन बना लिया है।
जापान जिस देश में यह उत्पादन कार्य शिफ्ट करना चाहता है, उसमें भारत उसकी पसंदीदा
लिस्ट में सबसे ऊपर है। भारत में जापान की फिलहाल 1441 कंपनियां पंजीकृत हैं और
उसके कुल 5102 व्यवसायिक प्रतिष्ठान मौजूद हैं। जापान और भारत के बेहद प्राचीन
रिश्ते हैं, जिनमें हाल के दिनो में और भी ज्यादा मजबूती आयी है।
वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब बनेगा भारत:
चीन को दुनिया का सबसे बड़ा मैन्यूफैक्चरिंग हब
माना जाता है लेकिन अब कोरोना के कारण वहां मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां ठप है और
सप्लाई चेन बुरी तरह टूटी हुई है। कई देश चीन पर कोरोना वायरस संबंधी वास्तविक
तथ्यों को छुपाने का आरोप भी लगा रहे, जिससे चीन की साख इस समय संदिग्ध और कमजोर
हो गयी है। इन सभी कारणों से विभिन्न देशों द्वारा मैन्यूफैक्चरिंग के लिए चीन का
विकल्प ढूंढा जा रहा है। इन विकल्पों में भारत को सबसे अधिक पसंदीदा और अनुकूलतम
देश माना जा रहा है। काउंटर प्वाइंट रिसर्च के अनुमान के मुताबिक यदि भारत ने
समझदारी भरे कदम उठाए तो मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने का यह मौका उसके हाथ लग सकता है।
कुछ वैश्विक समुदायों का यहां तक भी कहना है कि चीन को दरकिनार कर भारत को अब
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नियुक्त किया जाये। इसके अलावा भारतीय
निर्यात संगठनों के महासंघ (फियो) ने भी चीन से अपना विनिर्माण आधार हटाने पर
विचार कर रही कंपनियों को आकर्षित करने के लिये विभिन्न कदम उठाने का सुझाव दिया
है। इस मामले में संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हस्तक्षेप का आग्रह किया
है। इसके लिये कंपनियों को कई तरह की आकर्षक छूट देने के भी प्रस्ताव संगठन द्वारा
दिये गये है। कुछ यूरोपीय देशों की प्रमुख कंपनियां भी चीन के बजाए भारत में अपनी
नई विनिर्माण इकाइयों को स्थापित करने की योजना बना रही है। ऐसी कंपनियां भारत में
सुरक्षित माहौल, दूरदृष्टिता वाली पहल, पारदर्शी योजनाओं और किसी भी तरह के संकट
से जूझने की उसकी तात्कालीक दक्षता समेत पीएम मोदी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा जता
रही है। कम संसाधनों के बूते पर अधिकतम आउटपुट को लक्षित करना और उसे पूर्ण रूप से
प्राप्त करने की भारत की कला ने भी ऐसी कंपनियों को अपना कायल बना दिया है।
पांच ट्रिलियन इकॉनमी की राह:
भारत पर दुनिया का भरोसा कोरोना संकट के समय में
सबसे ज्यादा बढ़ा है, जो भारत की उदारवादी और मानवतावादी नीति का नतीजा है। भारत
ने मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिये एक पल गंवाए बिना संपूर्ण लॉकडाउन जैसा
अभूतपूर्व फैसला लिया और औद्योगिक गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई। भारत
ने इन फैसलों से दुनिया को ये स्पष्ट संदेश दिया कि कोई भी कारोबार मानवीय जीवन से
बड़ा नहीं होता है। ये सभी संदेश दर्शाते हैं कि संकट खत्म होते ही भारत को उसकी
सर्वहित की पहल, त्याग, तपस्या, मदद, भेदभाव रहित पारदर्शी नीति और औद्योगिक बलिदान
का फल दुनिया में सबसे ज्यादा मिलने वाला है और भारत के लिये एक तरह के लिये नया
वरदान बनने वाला है। निश्चित ही यह फल औद्योगिक निवेश समेत कई मोर्चों पर मिलेगा
और भारत की आर्थिकी फिर पटरी पर लौटकर सबसे तेज गति पकड़ेगी। इसमें कोई अतिशयोक्ति
नहीं कि कोरोना संकट में भारत की उदार नीतियों और नेतृत्व ने उसके लिये 5 ट्रिलियन
इकॉनमी के लक्ष्य को अर्जित करने के द्वार भी खोल दिये हैं।
Subhash Raturi






