Tuesday, May 12, 2020

उत्तराखंड के प्रवासियों के लिये संकटमोटक बने डा. देवेश्वर भट्ट, चलवाई दो ट्रेनें

सुभाष रतूड़ी:
कोरोना की वैश्विक महामारी में जहां-तहां फंसे प्रवासियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने सुरक्षित ठिकानों और घरों तक पहुंचने की है। इस समस्या को लेकर सरकार भी खासा चिंतित है। देश में लॉकडाउन के चलते घर-गांव से दूर फंसे प्रवासियों को इस मुश्किल समय में कोई संकट से उबारे तो उसे बड़ा संकटमोचक ही कहा जायेगा। उत्तराखंड के मूल निवासी और सूरत (गुजरात) में रहने वाले डा. देवेश्वर केशवानंद भट्ट भी इसी तरह की एक शख्सियत बनकर सामने आयी है, जिन्होंने के संकट में फंसे सैकड़ों प्रवासियों को गुजरात से उत्तराखंड अपने गांवों को वापस भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरकार से समन्वय कर इसके लिये दो ट्रेनों को भी चलावाया। अब तक कुल 2400 प्रवासियों के लिये टिकट और ट्रेन की व्यस्था करने वाले डा भट्ट अन्य लोगों के लिये 2 और ट्रेन लगवाने के प्रयास में जुटे हुए है।
डां भट्ट ने खुद और सामाजिक तौर पर सक्रिय व सक्षम प्रवासियों की मदद से 11 और 12 मई की सुबह सूरत से क्रमश काठगोदाम और हरिद्वार के लिये अपने प्रयासों से दो ट्रेनों को चलावाया, जिनमें 1200-1200 प्रवासी सवार हुए। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने सभी 2400 लोगों के लिये टिकट की व्यस्था भी करवाई।  
डा. भट्ट की बेटी ममता भट्ट, जो कि एक रेडियो जैकी है, ने उत्तराखंड के लोगों के लिये उनके पिता द्वारा किये गये इस सराहनीय कार्य को गर्व के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया है। पिता के साथ एक वीडियो साझा करते हुए ममता भट्ट ने 1200 टिकटों का वो बंच भी दिखाया है, जो प्रवासियों के लिये ट्रेन द्वारा घर जाने के लिये बनवाई गयीं है। गुजरात में रहने वाले उत्तराखंड के प्रवासी और घर लौटे लोग डा भट्ट और उनकी टीम के इस उपकार को अब शायद ही कभी भूल पाएंगे।
डा. देवेश्वर भट्ट
पूरे पहाड़ के फोन और नींद गायब
बेटी ममता भट्ट के साथ वीडियो में बातचीत करते हुए डा. भट्ट कहते हैं कि कोरोना के कहर के कारण ही ऐसा हो पाया है। वे कहते हैं, गुजरात मेंफैक्ट्रियां, होटल, रेस्टोरेंट्स आदि बंद हो गये थे। कारीगर, वर्कर्स सभी खाली बैठकर एक नई मूसीबत में फंस गये। सभी लोग तरह तरह की चिंताओं औऱ भय से घिरे हुए थे। यहां तक कि कुछ तो भागने की बात तक कर रहे थे। मुझे जब ये सब पता चला तो मैंने उन्हें समझाया कि भागने और चिंता करने की कोई बात नहीं है। हम कुछ जरूर करेंगे और समस्या का समाधान निकालेंगे
डा. भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड समाज सूरत (गुजरात) का प्रेसीडेंट होने के नाते भी पूरे पहाड़ से उनके पास कई फोन आने शुरू हुए। उत्तराखंड के लोग अपने परिजनों की मदद करने और कुशल क्षेम पूछने के लिये उनके पास ही कई फोन कॉल करते रहे। तभी से उन्होंने संकट में फंसे लोगों की मदद करने की ठीन ली और इस मुहिम में कुछ सक्रिय लोगों को भी अपने साथ जोड़ा।
प्रवासियों को संकट में फंसा देख डा भट्ट की नींद गायब होनी स्वाभाविक थी, जिसके बाद वे दिन-रात अपने लोगों को घर भेजने के प्रयासों में जुट गये। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई। डा. भट्ट कहते हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर, स्थानीय प्रशासन और लोकल लोगों ने भी उनकी पूरी मदद की।
एक कार्यक्रम में दीप प्रज्वलित करते डा. भट्ट
..मेहनत लाई रंग
आखिरकार डा भट्ट व उनकी टीम की दिन-रात की मेहनत रंग लायी और उनकी गुहार पर सरकार उत्तराखंड के लिये दो ट्रेने चलाने को राजी हो गयी। पहली ट्रेन 11 मई को सूरत से हलद्वानी (काठगोदाम) के लिये रवाना हुई। जबकि दूसरी ट्रेन आज सुबह 4 बजे 12 मई को सूरत से हरिद्वार के लिये रवाना हुई है। इन दोनो ट्रेनों में 1200-1200 प्रवासी सवार हुए हैं।
मूल रूप से पौड़ी के रहने वाले डा. भट्ट वीडियो में कहते हैं कि उनके पास अब तक कुल लगभग 5000 ऐसे लोगों के नाम आ चुके हैं, जो अपने गांव उत्तराखंड जाना चाहते हैं, इसलिये वे दो और ट्रेनों को चलाने के प्रयास में जुटे हुए है। उनका कहना है कि इनके अलावा कई ऐसे लोग भी हों, जो बसों और अन्य साधनों से उत्तराखंड रवाना हो चुके हैं। डा. भट्ट ने टिकट के अलावा ट्रेन से सवार होने से पहले प्रवासियों के लिये एक मीटिंग स्पॉट भी तय किया, जहां उन्हें टिकट वितरित किया गया साथ डॉक्टरी चेकअ और नाश्ते की भी व्यस्था की गयी।

दो-दो महाभारत
डा. भट्ट की बिटिया कहती है कि पिछले कुछ दिनों में घर से दो महाभारत चल रहे थे, एक टीवी पर और एक पिता के साथ। वे कहती है कि उनके परिवार वालों को भी कभी यकीन नहीं कि पिता इस मुश्किल घड़ी में ट्रेन चलवाने जैसा काम कर सकेंगे। लेकिन अब उन्होंने जब असंभव को संभव कर दिखाया तो सभी को उन पर नाज है। डा भट्ट और उनकी टीम ने संकट की इस घड़ी में मदद और मानवता की जो मिसाल कायम की है, वह सरकार समेत आम आदमी को प्रेरित करने वाली है। उत्तराखंड समाज के कई लोग डा. भट्ट का इस नेक कार्य के लिये लगातार आभार जता रहे हैं और इसके लिये उन्हें कई तरह के संदेश लिखकर भेज रहे हैं।  

Saturday, May 9, 2020

उत्तराखंड को मिला नया गौरव, बना विश्व का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन



सुभाष रतूड़ी:
देवभूमि उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसी हिमनगरी मुनस्यारी अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिये दुनिया भर में जानी जाती है। धवल हिमालय की गोद और खूबसूरत हरे-भरे पहाड़ इसके सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं। लेकिन अब मुनस्यारी के सौन्दर्य में और भी निखार देखने को मिलेगा। यहां का ईको पार्क और ट्यूलिप गार्डन अब पर्यटकों के लिये कभी न भूलने वाला अनुभव बन जायेगा। यहां बना ट्यूलिप गार्डन अब विश्व का सबसे बड़ा और खूबसूरत ट्यूलिप गार्डन होगा।

Munsiyari based Tulip Garden

 मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत में शनिवार को अपने ऑफिशियल ट्वीटर हैंडल पर यहां बन रहे मुनस्यारी नेचर एजूकेशन एंड ईको पार्क सेंटर की कुछ खूबसूरत तस्वीरें साझा की। श्री रावत ने तस्वीरों के साथ अपनी ड्रीम परियोजना के पूरे होने पर खुशी भी जताई है। इस परियोजना की घोषणा उन्होंने 2017 में मुख्यमंत्री बनने के समय की थी।   
Munsiyari based Tulip Garden

 मुख्यमंत्री का कहना है कि पंचाचूली हिमालय की पृष्ठभूमि में मुनस्यारी में बने ईको पार्क का तुलिप गार्डन विश्व का सबसे बड़ा ट्यूलिप गार्डन है। इसके बनने से मुनस्यारी रैंज में पर्यटन की नई और अपार संभावनाएं विकसित होंगी। पातलथौड़ ईको पार्क में पर्यटक प्रकृति एवं पंचाचूली हिमालय की खूबसूरती का अभूतपूर्व आनंद उठा सकेंगे।

पार्क में बने Huts

मुख्यमंत्री श्री रावत के मुताबिक इस पार्क में पर्यटकों के लिये हट्स के साथ टेन्ट में रहने की सुविधा भी उप्लब्ध है। पिथौरागढ़ के प्रसिद्ध मोस्टामानु मंदिर के समीप 50 हेक्टेयर भूमि में भी एक ट्यूलिप गार्डन का विकास किया जा रहा है। यह दोनों परियोजनाएं ऑल वेदर रोड,पिथौरागढ़ एयर कनेक्टिविटी  एवं हाल ही में राष्ट्र को समर्पित किए गये धारचुला-लिपुलेख मार्ग से जुड़ेंगे, जिससे यहां के पर्यटन को विकास के नए पंख लगेंगे।

Huts के अंदर का दृश्य

हिमाच्छादित पर्वतों की पृष्ठभूमि वाले इस ईको पार्क के एक हिस्से को खूबसूरत ट्यूलिप गार्डन के रूप में विकसित करना उत्तराखंड को पर्यटन के दृष्टिकोण से और भी ज्यादा समृद्ध बनाता है। यह गार्डन पिथौरागढ़ में बन रहे ट्यूलिप गार्डन से अलग है। भविष्य में यहां आने वाला पर्यटक शायद ही अब कभी मुनस्यारी को भुला सकेगा।

(All Photos from CM Handles @tsrawatbjp) 
Subhash Raturi

Friday, May 8, 2020

उत्तराखंड: संकट के पिटारे से निकले इस गिफ्ट को भुना सकेगी सरकार?

 जो सरकारें और राजनीतिक पार्टियां आज तक प्रवासियों को घर वापसी के सपने बेचती और दिखाती रहीं, यह समय उनकी इच्छाशक्ति की परीक्षा का है।
सुभाष रतूड़ी: 
कोरोना महामारी को यदि हम संकटों का पिटारा कहें, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन संकट के इस पिटारे से एक ऐसा खुशनुमा सरप्राइज पैकेज या गिफ्ट भी हमारी सरकार को प्राप्त हुआ है, जिसको पाने के लिये लंबे अरसे से काम किया जा रहा था और पैसा भी पानी की तरह बहाया जा रहा था, लेकिन फिर भी इसमें अब तक सफलता हासिल न हो सकी। कोरोना के पिटारे से निकला यह गिफ्ट हमें शहरों का रुख करने वाले प्रवासियों का इस समय अपने गांवों या मूल जड़ों की तरफ वापस लौटने के रूप में मिला है। बड़ी संख्या में रिवर्स माइग्रेशन के इस नये ट्रेंड ने राज्य सरकारों के बहुप्रतिक्षत लक्ष्यों को कुछ हद तक आसान कर दिया है लेकिन उनके सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी है। शहरों की तरफ हुए पलायन की तरह ही अब गांवों की ओर हो रहे इस बेवक्त प्रवासन (रिवर्स माइग्रेशन) के भी कई जटिल आयाम और चिंताजनक कारण हैं। इन जटिलताओं को सुलझाना सरकारों के लिये फिलहाल इतना आसान तो नहीं है, फिर भी यह देखना काफी दिलचस्प है कि हाथ लगे इस सुनहरे मौके को सरकारें किस तरह अपने लिये उपयोगी बनाती हैं।

सरकार की अग्नि परीक्षा का समय
यह मौका उत्तराखंड समेत उन सभी राज्य सरकारों की इच्छाश्क्ति की परीक्षा भी है, जो दशकों से बाहर गये अपने लोगों या प्रवासियों की हिमायती होने का दंभ भरती रहीं हैं। जो सरकारें आज तक प्रवासियों को घर वापसी के सपने बेचती और दिखाती रहीं, यह समय उन सरकारों के लिये जागने और वास्तविक धरातल पर कार्य करने का है। शहरों पर बढ़ते जनसंख्या बोझ के कारण घटते संसाधनों का रोना रोने वाली केंद्र सरकार के लिये भी यह नया अवसर है, जिसे वह राज्यों के साथ बेहतर तालमेल व समन्वय स्थापित करके और उन्हें जरूरी मदद की उपल्धता के साथ माहौल को अपने अनुकूल बना सकती है। शहरों में जनसंख्या घनत्व आज एक बहुत बड़ी चुनौती है, जिसके लिये जन-शून्यता की तरफ बढ़ रहे गांवों में लोगों का नियोजन या नई बसावट के अवसर पैदा करना बेहद जरूरी है। सरकारें मिलकर इस दिशा में इस समय काम कर सकती है। यह वक्त देश की डेमोग्रैफिकल समस्याओं को सुलझाने की दिशा में ठोस कार्य योजनाएं व नीतियां बनाने के साथ ही नियोजन की एक अभिनव प्रणाली को विकसित करने की भी मांग करता है। इस तरह के नये तंत्र के विकसित होने से सुरक्षित रोजगार की कमी को खत्म करने में मदद मिलेगी और शहरों को घनी आबादी के घुटन और बिगड़ते ईको सिस्टम से भी निजात मिलेगी।
घर जाने से पहले हरिद्वार में जांच और पंजीकरण
रोजगार, भरण-पोषण सबसे बड़ी समस्या
यद्यपि हमारा संविधान भारतीय नागरिकों को उनके मूलभूत अधिकारों (अनुच्छेद 19) के तहत उन्हें किसी भी प्रांत या राज्य में आने-जाने, घूमने और सैटल होने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस कानूनी आधार के अलावा भी कई ऐसे कारण है, जिनसे पलायन पर अंकुश लगाया जाना असंभव है। इसलिये पलायन को खत्म करने वाली सोच इंसान और समाज को खतरे में डालने और विकास को बाधित करने वाली जैसी है। लेकिन जब अनियोजित, अंधाधुंध और बेतरतीब पलायन के कारण भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांव खाली होने लगे हों और शहरों पर जनसंख्या घनत्व का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा हो,  पूरा ईकोसिस्टम खराब हो रहा हो, तो ऐसे में इन गंभीर समस्याओं का समाधान तलाशना सरकारों की प्राथमिकता में जरूर शामिल होना चाहिये। मानवीय दृष्टिकोण से भी गांवों से होने वाला यह पलायन बेहद चिंताजनक है। क्योंकि पलायन के सभी दर्जन भर बड़े कारणों में रोजगार, परिवार का भरण-पोषण या उदर पूर्ति सबसे बड़ा कारण है। दूसरे शब्दों में पलायन के पीछे का सबसे बड़ा कारण लोगों की विवशता है। इसलिये इससे संबंधित अधिकतर मामलों को अनैच्छिक पलायन भी कहा जा सकता है।

महानगरों का नया संकट
पूरे देश में अनियोजित पलायन से समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही है। सीमित भूमि व क्षेत्रफल के कारण अधिकतर महानगरों की विस्तारण क्षमता भी लगभग खत्म हो चुकी है। यही कारण है कि देश की राजधानी दिल्ली का एनसीआऱ क्षेत्र पिछले कुछ सालों में नोएडा, गुणगांव और फरीदाबाद से निकलकर कई अन्य शहरों और कस्बों को भी अपने कब्जे में ले चुका है। हालत यह है कि नये उद्योगों और आवासीय योजनाओं की स्थापना दिल्ली में अब संभव नहीं है। क्षमता से अधिक जनसंख्या के बड़े दुष्परिणाम पर्यावरणीय और पारिस्थिकीय तंत्र के खतरे के रूप में सामने आ रहे है। इंसानो के साथ वाहनों की निरंतर बढती संख्या, प्रदूषण का चरम स्तर, मानव जनित गंदगी और कचरे जैसे कारणों से दिल्ली का इको सिस्टम खतरे की रेखा को पार कर चुका है। इंसानी जीवन शैली, काम-काज, स्वास्थ्य और हमारे व्यवहार पर भी इन सबके कुप्रभाव देखने को मिल रहे है।
बस में सवार होने से पहले मां-बेटे की जांच
यूपी-बिहार से सबसे ज्यादा पलायन
गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन की प्रक्रिया बहुत पुरानी है और पिछले कुछ वर्षों में इसमें तेजी देखने को मिली है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश एवं बिहार से पलायन करने वालों की संख्या देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। इन दो राज्यों से अकेले लगभग 20.9 मिलियन लोग पलायन कर चुके थे। पलायन का यह आँकड़ा देश में होने वाले कुल अंतर-राज्यीय पलायन का 37 प्रतिशत है।
 आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार ऐसे राज्य हैं, जहां सबसे अधिक लोग गांवों में रहते हैं, यह संख्या क्रमश 18.6 और 11.1 फीसदी थी। सर्वाधिक पलायन वाले अन्य राज्यों में राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा हैं। पिछली जनगणना के मुताबिक देश के दो बड़े महानगरों दिल्ली और मुंबई की ओर पलायन करने वालों की कुल संख्या 9.9 मिलियन थी, जो कि वहाँ की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा था। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल 45 करोड़ से ज्यादा प्रवासी हैं। 1991 जनगणना के मुताबिक तब प्रवासियों की संख्या 22  करोड़ थी, जिसका मतलब है कि 1991 से 2011 के बीच प्रवासियों की संख्या में लगभग दो गुनी बढ़ोत्तरी हुई है। गौरतलब है कि भारत में अभी तक प्रवासी शब्द की कोई एक व्याख्या या निश्चित परिभाषा नहीं है। यूएन चिल्ड्रेंस फंड (यूनिसेफ) द्वारा हाल ही मे जारी रिपोर्ट लॉस्ट एट होमके मुताबिक पिछले साल 2019 में पूरी दुनिया में कुल 3.3 करोड़ लोग विस्थापित हुए। भारत में सबसे ज्यादा 50 लाख से ज्यादा लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए, यानी उन्हें देश में ही प्राकृतिक आपदा, संघर्ष और हिंसा के चलते एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर पलायन करना पड़ा। मतलब विभिन्न कारणों से पलायन करने वाले लोगों और उसकी दर में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है।

डैमोग्रैफिकल स्वरूप पर खतरा
मेरा गृह राज्य और हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड भी पलायन की जबरदस्त मार झेल रहा है। पहले से ही कम जनसंख्या और उसके ऊपर विषम भौगोलिक परस्थितियों के चलते पलायन यहां के लिये अभिशाप बनता जा रहा है। अनियोजित पलायन के कारण नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर देवभूमि का डैमोग्रैफिकल स्वरूप निरंतर बिगड़ता जा रहा है। पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आतावाली बहुप्रसिद्ध कहावत अब उत्तराखंड की नई पहचान सा बन गया है। उत्तराखंड से रोजगार के लिये होने वाले पलायन के अलावा बड़ी संख्या में प्रतिभा पलायन भी हुआ है।
 अफसोसजनक बात यह है कि 19-20 साल के इस युवा पहाड़ी राज्य और यहां के गांवों से पलायन का यह सिलसिला रोके नहीं रूक रहा है।  पहाड़ के विकास की मूल अवधारणा और उत्तराखंड के रूप में नये-पृथक राज्य के सृजन के पीछे जो उद्देश्य थे, सरकारें उनको हासिल करने में पूरी तरह असफल रही है। वर्ष 2001 और 2011 की जनगणना में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की जनसंख्या वृद्धि की दर में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली थी, जिसका मूल कारण यहां के लोगों का विस्थापन रहा।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बसा एक खूबसूरत गांव। (Photo - Subhash Raturi)
अल्मोड़ा-पौड़ी सबसे ऊपर
यद्यपि पलायन प्रवृत्ति से बहुमुखी होता है लेकिन उत्तराखंड के मामले में पलायन गहरे दर्द और बिछोह देने वाला साबित हुआ। पुराने-नये पलायन के कारण बढते घावों पर मरहम लगाने के लिये सरकार द्वारा 17 सिंतबर 2017 में ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य पलायन के मूल कारणों को जानना, उनका समाधान प्रस्तुत करना, ग्रामीण विकास की नई संभावनाओं को खोजना आदि था। आयोग ने अपनी स्थापना के एक साल के भीतर 2018 में सरकार को अपनी पहली रिपोर्ट सौंपी, जो बेदह चौकाने वाली निकली। आयोग की पहली रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में 2011 में 1034 गांव खाली थे, जबकि साल 2018 तक कुल 1734 गांव खाली हो चुके थे। मतलब 7-8 सालों में राज्य के लगभग 700 गांव पूरी तरह खाली हो गये। राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं। प्रदेश में कुल 3.5 लाख से अधिक घर ऐसे हैं जो वीरान पड़े हैं। राज्य के 13 जिलों में सबसे ज्यादा पलायन अल्मोड़ा और पौड़ी जनपद से हुआ। इस रिपोर्ट से एक और चिंताजनक बात यह निकली कि पलायन करने वालों में 42.2 फीसदी 26 से 35 उम्रवर्ग के युवा हैं।

गांव वापस आने वालों की बढ़ती संख्या
वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि कोरोना संकट के समय की बात की जाये तो देश के विभिन्न शहरों में रह रहे उत्तराखंड के जो प्रवासी अपने गांव वापस लौटना चाहते हैं, उनमें भी अधिकतर युवा वर्ग है। ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग ने पिछले माह अप्रैल में उन लोगों भी रिपोर्ट जारी की, जो कोविड-19 प्रकोप के बाद  उत्तराखंड अपने गांवों में लौटे हैं। यह रिपोर्ट कोरोना महामारी के चलते प्रथम चरण के लॉकडाउन से ठीक पहले उस समय की है, जब देश में आवागमन और यातायात सुचारू था और ये लोग अपने काम-धंधे छोड़कर राज्य में वापस लौटे। इस रिपोर्ट में शहरी क्षेत्र वाले जिले शामिल नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान उत्तराखंड के 10 जिलों में कुल 59,360 लोगों ने घर वापसी की। सबसे ज्यादा वापसी पौड़ी और अल्मोड़ा के गांवों में हुई, जिनमें लोगो की संख्या क्रमश 12039 और 9303 है जबकि सबसे कम संख्या बागेश्वर (1541 लोग) है। अन्य जिलों- चमोली-3214, चंपावत-5707, नैनाताल-4771, पिथौरागढ़-5035, रूद्रप्रयाग-4247, टिहरी-8782 औऱ उत्तरकाशी-4721 लोगो ने वासपी की है। इस रिवर्स माइग्रेशन अधिकतर ग्राम पंचायतों में हुआ है। सबसे ज्यादा लोग (1811) चंपावत के ही चंपावत ब्लॉक में और सबसे कम (161) जनपद चमोली के पोखरी ब्लॉक में वापस अपने गांव आये।
दिल्ली के उपनगर बुराड़ी की कालोनियों को सैनेटाइज करते उत्तराखंडी लोग
कहां से कितने लौटे प्रवासी 
आयोग की इस रिपोर्ट के मुताबिक उक्त रिवर्स माइग्रेशन में 25 से 30 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो राज्य के शहरों (देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हलद्वानी, रुद्रपुर, रामनगर आदि) से अपने गांवों में लौटे हैं। जबकि 60 से 65 फीसदी लोग राज्य के बाहरी शहरों दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, चण्डीगढ़ आदि से वापस आये है। जबकि 3 से 5 फीसदी लोग विदेश से लौटने वाले है। वापस लौटे अधिकतर लोगों की उम्र 30-45 साल है। घर लौटे 30 फीसदी लोगों ने राज्य में ही रहने की इच्छा जतायी है। इन लोगों के मुताबिक गांवों में रहने में आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं का अभाव बड़ी बाधा है। पलायन आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में गांव लौटने वाले लोगों की संख्या में बड़े पैमाने पर बढ़ोत्तरी होने की भी संभावना जताई, जो सही साबित हुई।

प्रवासियों की बढ़ती संख्या
उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन 3.0 शुरू होने के समय मई माह के शुरूआती दिनों में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों घर लौटने के इच्छुक प्रवासियों से ऑनलाइन पंजीकरण समेत अन्य तरीकों से उनका विवरण मंगाया था। महज 2-3 दिनों के अंदर ही हजारों लोगों द्वारा घर वापसी के लिये नाम देने से सभी राज्य सरकारों की नींद उड़ गयी। विभिन्न राज्यों से उत्तराखंड में अपने गांव लौटने के लिये पंजीकरण कराने वाले लोगों की संख्या 8 मई तक लाख 75 हजार 880 के पार पहुंच चुकी है, जिसमें से 18156 लोगों को लाये जा चुके हैं। कई लोगों ने ग्राम प्रधानों, पंचायत प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के जरिये भी अपने नाम दर्ज कराये। उत्तराखंड लौटने वाले ऐसे इच्छुक लोगों की संख्या का अभी स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है लेकिन इसमें जबरदस्त बढ़ोत्तरी हो सकती है।

सिफारिश, सक्षमता और अनुभव       
पलायन आयोग द्वारा अप्रैल में सरकार को सौंपी गयी अपनी उक्त रिपोर्ट में रिवर्स माइग्रेशन के बाद के उपायों को लेकर कुछ सिफारिशें भी की है। आयोग ने रिपोर्ट में सरकार से रिवर्स माइग्रेशन के आर्थिक पुनर्वास हेतु विशेष कार्यक्रम शुरू करने की सिफारिशें की है। इसके अलावा कृषि, बागवानी, पशुपालन तथा स्वरोजगार पर ध्यान फोकस करने का सुझाव दिया गया है। ताकि पर्वतीय जनपदों में ग्रामीण विकास को ज्यादा सुदर्ढ बनाया जा सके। इससे सामाजिक और आर्थिक परस्थितियों में सुधार होगा और लोग गांवों में आसानी से रह सकेंगे। इसके अलावा आयोग ने यह भी कहा कि कोविड-19 प्रकोप के बाद गांवों में वापस लौटे प्रवासी अपने-अपने क्षेत्र में काफी और विशेष अनुभव ऱखते हैं, जिसका लाभ विभिन्न क्षेत्रों में मिल सकता हैं साथ ही अनुभव के आधार पर अपने-अपने जनपदों में आजीविका भी पैदा कर सकते हैं, जो अन्य को भी रोजगार दे सकते हैं।

पुराने उदाहरणों से नई प्रेरणा
आयोग ने वापस लौटे प्रवासियों का डेटाबेस तैयार करने और उनके नियोजन हेतु एक डेडीकेटेड सेल (विशेष प्रकोष्ठ) बनाने की भी सलाह दी है। आयोग ने सरकार को दिये अपने कुल 13 प्वाइंट की सिफारिशों में यह बात भी कही है कि कोरोना प्रकोप से पहले गांवों में वापस लौटे कई लोग यहां आर्थिक सफलता भी प्राप्त कर चुके हैं, वर्तमान में लौटे लोगों को उनका उदाहरण प्रस्तुत करके रिवर्स माइग्रेश के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है।
बतायेगा वक्त, सड़क पहाड़ को गयी या परदेश को
गांव की छांव में सुरक्षा और सुकून    
बहाना भले ही कोरोना संकट का ही क्यों न हो, लेकिन प्रवासियों का अपनी जड़ों या गांवों की ओर लौटना वास्तव में काफी सुखद और एक अच्छे सरप्राइज पैकेज की तरह है। सबसे बड़ा संतोष यह भी है कि इस संकट में प्रवासियों को अपने वे गांव सुरक्षित नजर आ रहे हैं, जहां अक्सर स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं का रोना रोया जाता है। यह इस बात का भी संकेत है कि शहरों में रहने वाले अधिसंख्य लोगों के दिलों में आज भी गांव बसता है और वे अपनी जड़ों से जुड़े रहना पसंद करते हैं। साथ ही कोरोना जैसे संकट में प्रवासियों के मनों को गांव नई तरह की सुरक्षा, संबल और सुकून का बोध कराते हैं।

कड़वे अनुभव बदलेंगे मिठास में?
बेतरतीब पलायन के कारण अपने अस्तित्व के लिये जूझ रहे गांवों को ये प्रवासी अब नई और वास्तविक पहचान दे सकते हैं, बशर्तें राज्य सरकार भी इस बारे में गंभीर और ईमानदार पहल करे। इस दिशा में मिलने वाली सफलता से सरकार एक तीर से कई निशाने साध सकती है। यह न केवल शहरों पर बढ़ते बोझ को कम करेगा बल्कि मानव संसाधन और श्रम शक्ति को ज्यादा उपयोगी बनाने वाला भी साबित होगा, साथ ही ग्रामीण विकास की सुस्त रफ्तार भी तेज होगी। यदि सरकार ऐसा करने में सफल होती है तो इसे कोरोना संकट के पैकेज में मिले एक सुनहरे गिफ्ट की तरह याद रखा जायेगा, जो इतिहास में इस महामारी के कड़वे अनुभवों को भुलाने का भी काम करेगी।
                                    Subhash Raturi

Friday, May 1, 2020

कोरोना महामारी: जो जैसे-तैसे बच गये, वो नये संकटों से घिर गये



हर नया दिन मौत के नये आंकड़े थमा रहा है और हर दर्द की तासीर गहराती व हरी होती जा रही है।
सुभाष रतूड़ी:  
कोरोना वैश्विक महामारी  से उपजे संकटों और अनुभवों की हम सभी के पास एक लंबी फेहरिस्त है और इसमें शामिल हर संकट की अपनी एक अलग कथा-व्यथा है। कोरोना महासंकट ने दुनिया के लगभग हर देश, देहात और इंसान की दिनचर्या को पटरी से उतारा और समाज के हर ताने-बाने पर अपना व्यापक कुप्रभाव छोड़ा। दबे पांव आना और अचानक धरती पर कहर बनकर टूटना हर महामारी की फितरत रही है, लेकिन जानलेवा आक्रमण की सबसे अलग प्रकृति और प्रवृति के कारण कोरोना वर्तमान पीढी के अब तक के काल की सभी महामारियों से ज्यादा क्रूर है। हर महामारी का लक्ष्य धरती को संकट में डालना और इंसानी वजूद को खत्म करना रहा है। अब कुलक्षणी कोरोना ने भी इसी घृणित साजिश की जाल बिछाई है। इसके आक्रमण ने हर इंसान के दिन को काला और जीवन प्रक्रिया को छिन्न-भिन्न किया हुआ है। कोरोना से संक्रमित दुनिया का हर नया दिन मौत के नये आंकड़े छोड़कर गुजर रहा है और दर्द की तासीर ज्यादा हरी होती जा रही है।

स्पेनिश फ्लू और कोरोना
कोरोना महामारी के महाजाल में बेहद पेंच हैं। इसके प्रत्यक्ष संक्रमण से बचने वाले अधिसंख्य लोग अन्य तरह संकटों में फंस सकते हैं। इसलिये कोरोना 100 साल पहले आये स्पेनिश फ्लू से कम खतरनाक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक स्पेनिश फ्लू के कारण पूरे दुनिया में 10 से 20 करोड़ लोग मारे गये थे, जिसमें अकेले भारत में मरने वाले लोगों की संख्या 1 करोड़ 80 लाख के आसपास बताई जाती है। स्पेनिश फ्लू की व्यापक त्रासदी और बड़ी संख्या में मौतों का सबसे बड़ा कारण तब दुनिया में विज्ञान, चिकित्सा और अन्य संसाधनों का बेहद कम या अल्प विकसित होना था। भारत में कोरोना की तरह ही विदेशों से आयी इस महामारी की शुरुआत 29 मई, 1918 को तब हुई थी, जब पहले विश्व युद्ध से लौट भारतीय सैनिकों के जहाज़ ने बंबई बंदरगाह पर लंगर डाला। बंबई से शुरू हुई यह बीमारी हिमालयी राज्यों समेत पूरे देश में फैली और कई लोगों को लीलती चली गयी।
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इस युद्ध में सारे समुदाय और राष्ट्र एक ही तरफ और एक ही शिविर में हैं
विश्व युद्ध से बड़ा युद्ध
घातक आक्रमण और अदृश्य संक्रमण से अब तक कई निर्दोषों की जान लेने वाले कोरोना वायरस को भले ही दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की संज्ञा दे रही हो, लेकिन हकीकत में कोरोना प्रकल्प विश्व युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक है। कोई युद्ध या विश्व युद्ध हमेशा दो या दो से अधिक समुदायों, राज्यों या राष्ट्रों के बीच लड़ा जाता है। लेकिन नवजात कोरोना के खिलाफ पूरी दुनिया पहली बार एक होकर सामूहिक शक्ति के साथ लड़ रही है। मतलब इस युद्ध में सारे समुदाय और राष्ट्र  एक ही तरफ और एक ही शिविर में हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि विश्व युद्ध से बड़ा यह एक ऐसा युद्ध है, जिसमें इंसानों का किसी समुदाय या राष्ट्र खेमों में बंटने का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन इससे इंसान का राष्ट्र या समुदायों से हमेशा के लिये अलग-थलग और काल कवलित होने का खतरा जरूर है। यह हर तरह की युद्ध परंपरा में इस्तेमाल होने वाले संहार के सभी तरीकों में भी सबसे नया और तीक्ष्ण है। यह अति सुक्ष्म और अदृश्य विषाणु इंसान ही नहीं बल्कि दुनिया के वजूद को मिटाने की शक्ति भी रखता है। इसलिये अभी बाल्यकाल में ही विकराल कोरोना को इसी अवस्था में अचेत करना और बड़े होने से रोका जाना सभी के लिये बेहद जरूरी है।

बड़े ताकतवर की बड़ी लाचारी
कोरोना के आघात ने कई बड़े और शक्तिशाली राष्ट्रों की नींव भी हिलाकर रख दी है। सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका भी इसके सामने घुटने टेकने को लाचार है। कोरोना के कारण वहां मौतों का आंकड़ा 60 हजार की संख्या को पार चुका है, जबकि 11 लाख से अधिक लोग संक्रमित है। अमेरिका में किसी एक वजह से हुई मौतों की यह संख्या 20 साल (1955-1975) तक चले भीषण वियतनाम युद्ध में मारे गये लोगों या सैनिकों (58,220) से ज्यादा है। अमेरिका में कोरोना के कारण प्रति लाख लोगों में मरने वालों की संख्या फिलहाल 18 है। वियतनाम युद्ध के चरम पर होने के समय (1968) वहां हर एक लाख लोगों की संख्या में 9 लोगों की मौत हुई थी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में वहां मरने वाले लोगों की संख्या वियतनाम युद्ध की अपेक्षा दोगुनी से अधिक है। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि वियतनाम युद्ध 20 साल चला था जबकि कोरोना ने महज दो माह में इस तरह का भीषण कहर बरपाया है, इस संख्या (मृतकों) में बढ़ोत्तरी होने की पूरी संभावना है।

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इंसान के खिलाफ इंसान ही हथियार 
कोरोना ने केवल इंसान की भौतिक शक्ति को ही चुनौती नहीं दी है बल्कि उसने विलक्षण इंसानो की बुद्धिमता से उपजे विश्व विजयी सामर्थ्यों और संसाधनों को भी चंद दिनों में पंगुता पर ला दिया है। जीव जगत में सर्वश्रेष्ठ इंसानी विवेक से निर्मित दुनिया की सबसे विशालकाय, ताकतवर और अत्याधुनिक मशीनों का संचालन भी कोरोना के कारण ठप है। आकाश, जमीन और समुद्रों को साधने वाली बेहद ऊर्जावान और सर्वसमर्थ अभियांत्रिक शक्तियां भी फिलहाल लाचार होकर जड़ता में जा पहुंची है। कोरोना की आक्रमक और जानलेवा चालें इंसान के लिये अब भी अबूझ बनी हुई हैं। उसके षणयंत्र और छल का सबसे भद्दा उदाहरण यह है कि कोरोना विश्वभर में महामारी फैलाने और इंसानो को अपना ग्रास बनाने के लिये इंसानो को ही अपना हथियार बना रहा है। एक देश से दूसरे देश या समाज को संक्रमित करने और भौगोलिक सीमाओं को लांघने का जरिया भी उसने इंसानों को ही बनाया, जो बेहद खौफनाक है।

प्रथम पंक्ति पर हमला
यह और भी ज्यादा दुखद है कि इस महासंकट के परिहार के लिये पहले दिन से ही पहली पंक्ति में निडर होकर खड़े देश और समाज के सचेत बहादुर योद्धाओं पर भी कोरोना ने जबरदस्त आक्रमण किया। इस वायरस के अचूक आक्रमण के कारण भारत समेत कई देशों के डॉक्टर्स समेत मेडिकल स्टॉफ, पुलिस, प्रशासन और प्रथम पंक्ति के तमाम लोग या तो जान गंवा चुके हैं या संक्रमित होकर जनलेवा खतरे से जूझ रहे है।

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भविष्य की अनिश्चितताएं 
कोरोना के बेदर्द फितरतों की लंबी फेहरिस्त है। इसने इंसान के मूल स्वभाव मतलब इंसान के सामाजिक होने के प्राकृतिक सिद्धांत भी पर जोरदार हमला किया है। अतिसूक्ष्म वायरस ने हम सभी को एक दूसरे से बड़ी, अभूतपूर्व और अनिवार्य सामाजिक दूरी बनाये रखने को विवश किया। इस अनिवार्य दूरी और लॉकडाउन की विवशता ने हमारे समाज व समूचे परिदृश्य के सामने कई नई परेशानियां, चुनौतियां और भविष्य हेतु कुछ अनिश्चितताएं भी खड़ी कर दी है। ये परेशानियां भले ही बेहद अल्पकालिक ही क्यों न हों, लेकिन है बेहद गंभीर। कोरोना काल में जीवन की जड़ों से जुड़े रहने के लिये जरूरी सामाजिक दूरी या लॉकडाउन ने कई लोगों को उनके जीवन यापन की जरूरी जड़ों से अलग कर दिया है।
लॉकडाउन के चलते मैन्यूफैक्चिरिंग और सर्विस सैक्टर्स के बंद होने से निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और श्रमिकों का रोजगार संकट में है।
जीवन यापन की नई चुनौती
कोरोना के कारण जरूरी लॉकडाउन के चलते मैन्यूफैक्चिरिंग और सर्विस सैक्टर्स के बंद होने से निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और श्रमिकों का रोजगार संकट में पड़ गया है। उनके सामने भविष्य की अनिश्चितताएं खड़ी हो गयी हैं। कंपनियों के बंद होने से रोजी-रोटी और कमाई का जरिया भी बंद हो गया है। असंगठित क्षेत्र के प्रतिष्ठान और लाला टाइप कई कंपनियां अपने इम्पॉलाय को बंद अवधि की पूरी या आधी सैलरी देने से कतरा रही हैं। निम्न तबके के दिहाड़ी मजदूरों को जीवन यापन के लिये जरूरी खान पान और मूलभूत आवश्यकताओं से जूझना पड़ रहा है।

मां ने पकाये पत्थर, तसल्ली में सोये बच्चे
कोरोना के कारण भारत समेत दुनिया के हर देश से हर रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जो मन को व्यथित और मानवता को झकझोर कर रख देने वाले हैं। बीबीसी की 1 मई एक रिपोर्ट काफी हैरान और परेशान करने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संकट के कारण कमाई और काम से हाथ धो चुकी कीनीया की पेनिना बहाती कित्साओ नामक महिला इतनी गरीब हो गयी कि उसे अपने बच्चों को बहलाने लिए रात भर भोजन के नाम पर पत्थर पकाने का नाटक करना पड़ा। मां रात भर भूखे बच्चों के लिये पत्थरों को पकाती रही और बच्चे भोजन के इंतजार में तसल्ली खाकर सो गये। खाना पकाने का जो स्वांग इस मां ने रचा दरअसल वह उसकी बेबसी को बयां करती है।
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घर की डगर, मौत का सफर
भारत में भी इसी तरह की विवशता और दर्द से भरे कई किस्से सामने आ चुके हैं। रामजी महतो 3 अप्रैल को दिल्ली से 1100 किलोमीटर दूर बिहार के बेगूसराय में स्थित अपने घर के लिए पैदल निकले। महतो 850 किमी का सफर तय कर 16 अप्रैल को यूपी के वाराणसी में बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें एंबुलेंस में चढ़ाया ही था कि उन्होंने दम तोड़ दिया। मध्य प्रदेश के मोतीलाल साहू नवी मुंबई में पेंटर का काम करते थे। 24 अप्रैल को वे मुंबई से 1400 किमी दूर अपने घर के लिये पैदल निकले। लेकिन 60 किमी के सफर के बाद ठाणे में रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का इंसाफ अली मुंबई में हेल्पर था। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हुआ तो वह 13 अप्रैल को मुंबई से यूपी के लिए निकल पड़ा। वह 1500 किमी का सफर तय कर जैसे-तैसे 14 दिन बाद यानी 27 अप्रैल को अपने गांव मठकनवा पहुंचा, जहां उसे क्वारैंटाइन कर दिया गया। उसी दिन दोपहर में इंसाफ की मौत हो गई। ऐसे कई और उदाहरण है, जो कोरोना संकट से बचे लेकिन दूसरे संकट में जा फंसे।
आगे का हर मार्ग फिलहाल बेहद धुंधला व संकटों से भरा पड़ा दीख रहा है और यथास्थिति से उपजे उबाऊपन की छटपटाहट में हर किसी का दम घुटे जा रहा है  

सड़क से संसद तक सभी लाचार
कुल मिलाकर कोरोना के कारण असंख्य लोगों के सामने खुद के पेट और परिवार के भरण-पोषण का नया संकट खड़ा हो गया है। जीवन में अचानक आयी इस नई चुनौती से निपटने में वे सक्षम नहीं रह गये हैं, क्योंकि रोजी-रोटी की उनक मूल व्यस्था छिन चुकी है। ऐसे लोग कोरोना संक्रमण से भले बच गये हों लेकिन जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिये आगे का उनका सफर फिलहाल आसान नजर नहीं आता। पेट और परिवार का पोषण ऐसे लोगों को नये तरह के जानलेवा संकट में डाल सकता है। उदर पोषण और बेरोजगारी की समस्या ने ऐसे लोगों का जीना दूभर कर दिया है। कोरोना के कारण असंख्य लोग न घर के न घाट के बनकर रह गये हैं। सभी की लाचार नजरें और टूटी उम्मीदें सरकार पर ही टिकी हुई है।
कोरोना संकट के इस दौर में सरकार की विवशता भी कुछ कम नहीं है। सरकार के सामने भी आगे बाघ पीछे आग वाली स्थिति है। महामारी में सुधार होने से पहले, जल्दबाजी या दबाव में आकर सरकार यदि उद्योगों को खोलती है तो जानलेवा कोरोना का खतरा बढता है, यदि लंबे समय तक यथास्थिति रहती है तो लोगों के सामने भूख का संकट गहराता है। कोरोना के कारण उपजी इस बहुआयामी समस्या ने सभी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से आगे का हर मार्ग फिलहाल बेहद धुंधला व संकटों से भरा पड़ा दीख रहा है और यथास्थिति से उपजे उबाऊपन की छटपटाहट में हर किसी का दम घुटे जा रहा है।  
                                           Subhash Raturi