जो सरकारें और राजनीतिक पार्टियां आज तक प्रवासियों को घर वापसी के सपने बेचती और दिखाती रहीं, यह समय उनकी इच्छाशक्ति की परीक्षा का है।सुभाष रतूड़ी:
कोरोना महामारी को यदि हम संकटों का पिटारा कहें, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन संकट के इस पिटारे से एक ऐसा
खुशनुमा सरप्राइज पैकेज या गिफ्ट भी हमारी सरकार को प्राप्त हुआ है, जिसको पाने के लिये लंबे अरसे से काम किया जा रहा था और पैसा भी पानी की
तरह बहाया जा रहा था, लेकिन फिर भी इसमें अब तक सफलता हासिल
न हो सकी। कोरोना के पिटारे से निकला यह गिफ्ट हमें शहरों का रुख करने वाले प्रवासियों
का इस समय अपने गांवों या मूल जड़ों की तरफ वापस लौटने के रूप में मिला है। बड़ी
संख्या में रिवर्स माइग्रेशन के इस नये ट्रेंड ने राज्य सरकारों के बहुप्रतिक्षत
लक्ष्यों को कुछ हद तक आसान कर दिया है लेकिन उनके सामने एक नई चुनौती भी खड़ी कर
दी है। शहरों की तरफ हुए पलायन की तरह ही अब गांवों की ओर हो रहे इस बेवक्त
प्रवासन (रिवर्स माइग्रेशन) के भी कई जटिल आयाम और चिंताजनक कारण हैं। इन जटिलताओं
को सुलझाना सरकारों के लिये फिलहाल इतना आसान तो नहीं है, फिर
भी यह देखना काफी दिलचस्प है कि हाथ लगे इस सुनहरे मौके को सरकारें किस तरह अपने
लिये उपयोगी बनाती हैं।
सरकार की अग्नि परीक्षा का समय
यह मौका उत्तराखंड समेत उन सभी राज्य सरकारों की इच्छाश्क्ति की
परीक्षा भी है, जो दशकों से बाहर गये अपने लोगों या प्रवासियों की
हिमायती होने का दंभ भरती रहीं हैं। जो सरकारें आज तक प्रवासियों को घर वापसी के
सपने बेचती और दिखाती रहीं, यह समय उन सरकारों के लिये जागने
और वास्तविक धरातल पर कार्य करने का है। शहरों पर बढ़ते जनसंख्या बोझ के कारण घटते
संसाधनों का रोना रोने वाली केंद्र सरकार के लिये भी यह नया अवसर है, जिसे वह राज्यों के साथ बेहतर तालमेल व समन्वय स्थापित करके और उन्हें
जरूरी मदद की उपल्धता के साथ माहौल को अपने अनुकूल बना सकती है। शहरों में
जनसंख्या घनत्व आज एक बहुत बड़ी चुनौती है, जिसके लिये
जन-शून्यता की तरफ बढ़ रहे गांवों में लोगों का नियोजन या नई बसावट के अवसर पैदा
करना बेहद जरूरी है। सरकारें मिलकर इस दिशा में इस समय काम कर सकती है। यह वक्त
देश की डेमोग्रैफिकल समस्याओं को सुलझाने की दिशा में ठोस कार्य योजनाएं व नीतियां
बनाने के साथ ही नियोजन की एक अभिनव प्रणाली को विकसित करने की भी मांग करता है।
इस तरह के नये तंत्र के विकसित होने से सुरक्षित रोजगार की कमी को खत्म करने में
मदद मिलेगी और शहरों को घनी आबादी के घुटन और बिगड़ते ईको सिस्टम से भी निजात
मिलेगी।
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| घर जाने से पहले हरिद्वार में जांच और पंजीकरण |
रोजगार, भरण-पोषण सबसे बड़ी समस्या
यद्यपि हमारा संविधान भारतीय नागरिकों को उनके मूलभूत अधिकारों
(अनुच्छेद 19) के तहत उन्हें किसी भी प्रांत या राज्य में
आने-जाने, घूमने और सैटल होने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
इस कानूनी आधार के अलावा भी कई ऐसे कारण है, जिनसे पलायन पर
अंकुश लगाया जाना असंभव है। इसलिये पलायन को खत्म करने वाली सोच इंसान और समाज को
खतरे में डालने और विकास को बाधित करने वाली जैसी है। लेकिन जब अनियोजित, अंधाधुंध और बेतरतीब पलायन के कारण भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांव खाली
होने लगे हों और शहरों पर जनसंख्या घनत्व का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा हो, पूरा ईकोसिस्टम खराब हो रहा हो,
तो ऐसे में इन गंभीर समस्याओं का समाधान तलाशना सरकारों की
प्राथमिकता में जरूर शामिल होना चाहिये। मानवीय दृष्टिकोण से भी गांवों से होने
वाला यह पलायन बेहद चिंताजनक है। क्योंकि पलायन के सभी दर्जन भर बड़े कारणों में
रोजगार, परिवार का भरण-पोषण या उदर पूर्ति सबसे बड़ा कारण
है। दूसरे शब्दों में पलायन के पीछे का सबसे बड़ा कारण लोगों की विवशता है। इसलिये
इससे संबंधित अधिकतर मामलों को अनैच्छिक पलायन भी कहा जा सकता है।
महानगरों का नया संकट
पूरे देश में अनियोजित पलायन से समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही है।
सीमित भूमि व क्षेत्रफल के कारण अधिकतर महानगरों की विस्तारण क्षमता भी लगभग खत्म
हो चुकी है। यही कारण है कि देश की राजधानी दिल्ली का एनसीआऱ क्षेत्र पिछले कुछ
सालों में नोएडा, गुणगांव और फरीदाबाद से निकलकर कई अन्य शहरों और
कस्बों को भी अपने कब्जे में ले चुका है। हालत यह है कि नये उद्योगों और आवासीय
योजनाओं की स्थापना दिल्ली में अब संभव नहीं है। क्षमता से अधिक जनसंख्या के बड़े
दुष्परिणाम पर्यावरणीय और पारिस्थिकीय तंत्र के खतरे के रूप में सामने आ रहे है।
इंसानो के साथ वाहनों की निरंतर बढती संख्या, प्रदूषण का चरम
स्तर, मानव जनित गंदगी और कचरे जैसे कारणों से दिल्ली का इको
सिस्टम खतरे की रेखा को पार कर चुका है। इंसानी जीवन शैली, काम-काज,
स्वास्थ्य और हमारे व्यवहार पर भी इन सबके कुप्रभाव देखने को मिल
रहे है।
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| बस में सवार होने से पहले मां-बेटे की जांच |
यूपी-बिहार से सबसे ज्यादा पलायन
गांवों से शहरों की ओर होने वाले पलायन की प्रक्रिया बहुत पुरानी है
और पिछले कुछ वर्षों में इसमें तेजी देखने को मिली है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश एवं बिहार से
पलायन करने वालों की संख्या देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। इन दो
राज्यों से अकेले लगभग 20.9 मिलियन लोग पलायन कर चुके थे।
पलायन का यह आँकड़ा देश में होने वाले कुल अंतर-राज्यीय पलायन का 37 प्रतिशत है।
डैमोग्रैफिकल स्वरूप पर खतरा
मेरा गृह राज्य और हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड भी पलायन की जबरदस्त मार
झेल रहा है। पहले से ही कम जनसंख्या और उसके ऊपर विषम भौगोलिक परस्थितियों के चलते
पलायन यहां के लिये अभिशाप बनता जा रहा है। अनियोजित पलायन के कारण नैसर्गिक सौंदर्य
से भरपूर देवभूमि का डैमोग्रैफिकल स्वरूप निरंतर बिगड़ता जा रहा है। ‘पहाड़
का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आता’ वाली
बहुप्रसिद्ध कहावत अब उत्तराखंड की नई पहचान सा बन गया है। उत्तराखंड से रोजगार के
लिये होने वाले पलायन के अलावा बड़ी संख्या में प्रतिभा पलायन भी हुआ है।
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| उत्तराखंड के पहाड़ों में बसा एक खूबसूरत गांव। (Photo - Subhash Raturi) |
अल्मोड़ा-पौड़ी सबसे ऊपर
यद्यपि पलायन प्रवृत्ति से बहुमुखी होता है लेकिन उत्तराखंड के मामले
में पलायन गहरे दर्द और बिछोह देने वाला साबित हुआ। पुराने-नये पलायन के कारण बढते
घावों पर मरहम लगाने के लिये सरकार द्वारा 17 सिंतबर 2017 में ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य
पलायन के मूल कारणों को जानना, उनका समाधान प्रस्तुत करना,
ग्रामीण विकास की नई संभावनाओं को खोजना आदि था। आयोग ने अपनी
स्थापना के एक साल के भीतर 2018 में सरकार को अपनी पहली
रिपोर्ट सौंपी, जो बेदह चौकाने वाली निकली। आयोग की पहली
रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में 2011 में 1034 गांव खाली थे, जबकि साल 2018
तक कुल 1734 गांव खाली हो चुके थे। मतलब 7-8 सालों में राज्य के लगभग 700 गांव पूरी तरह खाली हो
गये। राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जहां 10 से भी कम लोग रहते हैं। प्रदेश में कुल 3.5 लाख से
अधिक घर ऐसे हैं जो वीरान पड़े हैं। राज्य के 13 जिलों में
सबसे ज्यादा पलायन अल्मोड़ा और पौड़ी जनपद से हुआ। इस रिपोर्ट से एक और चिंताजनक
बात यह निकली कि पलायन करने वालों में 42.2 फीसदी 26 से 35 उम्रवर्ग के युवा हैं।
गांव वापस आने वालों की बढ़ती संख्या
वर्तमान परिपेक्ष्य में यदि कोरोना संकट के समय की बात की जाये तो देश
के विभिन्न शहरों में रह रहे उत्तराखंड के जो प्रवासी अपने गांव वापस लौटना चाहते
हैं, उनमें भी अधिकतर युवा वर्ग है। ग्राम्य विकास एवं
पलायन आयोग ने पिछले माह अप्रैल में उन लोगों भी रिपोर्ट जारी की, जो कोविड-19 प्रकोप के बाद उत्तराखंड अपने गांवों में लौटे हैं। यह
रिपोर्ट कोरोना महामारी के चलते प्रथम चरण के लॉकडाउन से ठीक पहले उस समय की है,
जब देश में आवागमन और यातायात सुचारू था और ये लोग अपने काम-धंधे
छोड़कर राज्य में वापस लौटे। इस रिपोर्ट में शहरी क्षेत्र वाले जिले शामिल नहीं
है। रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान उत्तराखंड के 10 जिलों में
कुल 59,360 लोगों ने घर वापसी की। सबसे ज्यादा वापसी पौड़ी
और अल्मोड़ा के गांवों में हुई, जिनमें लोगो की संख्या क्रमश
12039 और 9303 है जबकि सबसे कम संख्या
बागेश्वर (1541 लोग) है। अन्य जिलों- चमोली-3214, चंपावत-5707, नैनाताल-4771, पिथौरागढ़-5035,
रूद्रप्रयाग-4247, टिहरी-8782 औऱ उत्तरकाशी-4721 लोगो ने वासपी की है। इस रिवर्स
माइग्रेशन अधिकतर ग्राम पंचायतों में हुआ है। सबसे ज्यादा लोग (1811) चंपावत के ही चंपावत ब्लॉक में और सबसे कम (161) जनपद
चमोली के पोखरी ब्लॉक में वापस अपने गांव आये।
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| दिल्ली के उपनगर बुराड़ी की कालोनियों को सैनेटाइज करते उत्तराखंडी लोग |
कहां से कितने लौटे प्रवासी
आयोग की इस रिपोर्ट के मुताबिक उक्त रिवर्स माइग्रेशन में 25 से 30 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो
राज्य के शहरों (देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार,
हलद्वानी, रुद्रपुर, रामनगर
आदि) से अपने गांवों में लौटे हैं। जबकि 60 से 65 फीसदी लोग राज्य के बाहरी शहरों दिल्ली, मुंबई,
अहमदाबाद, चण्डीगढ़ आदि से वापस आये है। जबकि 3 से 5 फीसदी लोग विदेश से लौटने वाले है। वापस लौटे
अधिकतर लोगों की उम्र 30-45 साल है। घर लौटे 30 फीसदी लोगों ने राज्य में ही रहने की इच्छा जतायी है। इन लोगों के
मुताबिक गांवों में रहने में आजीविका, शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य सुविधाओं का अभाव बड़ी बाधा है। पलायन आयोग ने अपनी इस
रिपोर्ट में गांव लौटने वाले लोगों की संख्या में बड़े पैमाने पर बढ़ोत्तरी होने
की भी संभावना जताई, जो सही साबित हुई।
प्रवासियों की बढ़ती संख्या
उल्लेखनीय है कि लॉकडाउन 3.0 शुरू होने के समय
मई माह के शुरूआती दिनों में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश समेत
कई राज्यों घर लौटने के इच्छुक प्रवासियों से ऑनलाइन पंजीकरण समेत अन्य तरीकों से
उनका विवरण मंगाया था। महज 2-3 दिनों के अंदर ही हजारों लोगों
द्वारा घर वापसी के लिये नाम देने से सभी राज्य सरकारों की नींद उड़ गयी। विभिन्न राज्यों से उत्तराखंड में अपने गांव लौटने के लिये पंजीकरण कराने वाले लोगों की संख्या 8 मई तक 1 लाख 75 हजार 880 के पार पहुंच चुकी है, जिसमें से 18156 लोगों को लाये जा चुके हैं। कई लोगों
ने ग्राम प्रधानों, पंचायत प्रतिनिधियों और सामाजिक
संगठनों के जरिये भी अपने नाम दर्ज कराये। उत्तराखंड लौटने वाले ऐसे इच्छुक लोगों
की संख्या का अभी स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है लेकिन इसमें जबरदस्त बढ़ोत्तरी
हो सकती है।
सिफारिश, सक्षमता और अनुभव
पलायन आयोग द्वारा अप्रैल में सरकार को सौंपी गयी अपनी उक्त रिपोर्ट
में रिवर्स माइग्रेशन के बाद के उपायों को लेकर कुछ सिफारिशें भी की है। आयोग ने
रिपोर्ट में सरकार से रिवर्स माइग्रेशन के आर्थिक पुनर्वास हेतु विशेष कार्यक्रम
शुरू करने की सिफारिशें की है। इसके अलावा कृषि, बागवानी, पशुपालन तथा स्वरोजगार पर ध्यान फोकस करने का सुझाव दिया गया है। ताकि
पर्वतीय जनपदों में ग्रामीण विकास को ज्यादा सुदर्ढ बनाया जा सके। इससे सामाजिक और
आर्थिक परस्थितियों में सुधार होगा और लोग गांवों में आसानी से रह सकेंगे। इसके
अलावा आयोग ने यह भी कहा कि कोविड-19 प्रकोप के बाद गांवों
में वापस लौटे प्रवासी अपने-अपने क्षेत्र में काफी और विशेष अनुभव ऱखते हैं,
जिसका लाभ विभिन्न क्षेत्रों में मिल सकता हैं साथ ही अनुभव के आधार
पर अपने-अपने जनपदों में आजीविका भी पैदा कर सकते हैं, जो
अन्य को भी रोजगार दे सकते हैं।
पुराने उदाहरणों से नई प्रेरणा
आयोग ने वापस लौटे प्रवासियों का डेटाबेस तैयार करने और उनके नियोजन
हेतु एक डेडीकेटेड सेल (विशेष प्रकोष्ठ) बनाने की भी सलाह दी है। आयोग ने सरकार को
दिये अपने कुल 13 प्वाइंट की सिफारिशों में यह बात भी कही है कि
कोरोना प्रकोप से पहले गांवों में वापस लौटे कई लोग यहां आर्थिक सफलता भी प्राप्त
कर चुके हैं, वर्तमान में लौटे लोगों को उनका उदाहरण
प्रस्तुत करके रिवर्स माइग्रेश के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है।
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| बतायेगा वक्त, सड़क पहाड़ को गयी या परदेश को |
गांव की छांव में सुरक्षा और सुकून
बहाना भले ही कोरोना संकट का ही क्यों न हो, लेकिन प्रवासियों का अपनी जड़ों या गांवों की ओर लौटना वास्तव में काफी सुखद
और एक अच्छे सरप्राइज पैकेज की तरह है। सबसे बड़ा संतोष यह भी है कि इस संकट में
प्रवासियों को अपने वे गांव सुरक्षित नजर आ रहे हैं, जहां
अक्सर स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं का रोना रोया जाता है। यह इस बात का भी संकेत
है कि शहरों में रहने वाले अधिसंख्य लोगों के दिलों में आज भी गांव बसता है और वे
अपनी जड़ों से जुड़े रहना पसंद करते हैं। साथ ही कोरोना जैसे संकट में प्रवासियों
के मनों को गांव नई तरह की सुरक्षा, संबल और सुकून का बोध
कराते हैं।
कड़वे अनुभव बदलेंगे मिठास में?
बेतरतीब पलायन के कारण अपने अस्तित्व के लिये जूझ रहे गांवों को ये
प्रवासी अब नई और वास्तविक पहचान दे सकते हैं, बशर्तें राज्य सरकार
भी इस बारे में गंभीर और ईमानदार पहल करे। इस दिशा में मिलने वाली सफलता से सरकार
एक तीर से कई निशाने साध सकती है। यह न केवल शहरों पर बढ़ते बोझ को कम करेगा बल्कि
मानव संसाधन और श्रम शक्ति को ज्यादा उपयोगी बनाने वाला भी साबित होगा, साथ ही ग्रामीण विकास की सुस्त रफ्तार भी तेज होगी। यदि सरकार ऐसा करने
में सफल होती है तो इसे कोरोना संकट के पैकेज में मिले एक सुनहरे गिफ्ट की तरह याद
रखा जायेगा, जो इतिहास में इस महामारी के कड़वे अनुभवों को
भुलाने का भी काम करेगी।
Subhash Raturi






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