सुभाष रतूड़ी:
कोरोना वैश्विक
महामारी से उपजे संकटों और अनुभवों की हम
सभी के पास एक लंबी फेहरिस्त है और इसमें शामिल हर संकट की अपनी एक अलग कथा-व्यथा
है। कोरोना महासंकट ने दुनिया के लगभग हर देश, देहात और इंसान की दिनचर्या को पटरी
से उतारा और समाज के हर ताने-बाने पर अपना व्यापक कुप्रभाव छोड़ा। दबे पांव आना और
अचानक धरती पर कहर बनकर टूटना हर महामारी की फितरत रही है, लेकिन जानलेवा आक्रमण
की सबसे अलग प्रकृति और प्रवृति के कारण कोरोना वर्तमान पीढी के अब तक के काल की सभी
महामारियों से ज्यादा क्रूर है। हर महामारी का लक्ष्य धरती को संकट में डालना और
इंसानी वजूद को खत्म करना रहा है। अब कुलक्षणी कोरोना ने भी इसी घृणित साजिश की
जाल बिछाई है। इसके आक्रमण ने हर इंसान के दिन को काला और जीवन प्रक्रिया को
छिन्न-भिन्न किया हुआ है। कोरोना से संक्रमित दुनिया का हर नया दिन मौत के नये
आंकड़े छोड़कर गुजर रहा है और दर्द की तासीर ज्यादा हरी होती जा रही है।
स्पेनिश फ्लू और कोरोना
कोरोना महामारी के
महाजाल में बेहद पेंच हैं। इसके प्रत्यक्ष संक्रमण से बचने वाले अधिसंख्य लोग अन्य
तरह संकटों में फंस सकते हैं। इसलिये कोरोना 100 साल पहले आये स्पेनिश फ्लू से कम
खतरनाक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक स्पेनिश फ्लू के कारण पूरे दुनिया में 10 से
20 करोड़ लोग मारे गये थे, जिसमें अकेले भारत में मरने वाले लोगों की संख्या 1
करोड़ 80 लाख के आसपास बताई जाती है। स्पेनिश फ्लू की व्यापक त्रासदी और बड़ी
संख्या में मौतों का सबसे बड़ा कारण तब दुनिया में विज्ञान, चिकित्सा और अन्य
संसाधनों का बेहद कम या अल्प विकसित होना था। भारत में कोरोना की तरह ही विदेशों
से आयी इस महामारी की शुरुआत 29 मई, 1918 को तब हुई थी, जब पहले
विश्व युद्ध से लौट भारतीय सैनिकों के जहाज़ ने बंबई बंदरगाह पर लंगर डाला। बंबई
से शुरू हुई यह बीमारी हिमालयी राज्यों समेत पूरे देश में फैली और कई लोगों को
लीलती चली गयी।
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| Photo: NBC News |
इस युद्ध में सारे समुदाय और राष्ट्र एक ही तरफ और एक ही शिविर में हैं
विश्व युद्ध से बड़ा युद्ध
घातक आक्रमण और अदृश्य
संक्रमण से अब तक कई निर्दोषों की जान लेने वाले कोरोना वायरस को भले ही दुनिया
तीसरे विश्व युद्ध की संज्ञा दे रही हो, लेकिन हकीकत में कोरोना प्रकल्प विश्व
युद्ध से भी ज्यादा खतरनाक है। कोई युद्ध या विश्व युद्ध हमेशा दो या दो से अधिक
समुदायों, राज्यों या राष्ट्रों के बीच लड़ा जाता है। लेकिन नवजात कोरोना के खिलाफ
पूरी दुनिया पहली बार एक होकर सामूहिक शक्ति के साथ लड़ रही है। मतलब इस युद्ध में सारे समुदाय
और राष्ट्र एक ही तरफ और एक ही शिविर में हैं। दूसरे शब्दों में कहा
जा सकता है कि विश्व युद्ध से बड़ा यह एक ऐसा युद्ध है, जिसमें इंसानों का किसी
समुदाय या राष्ट्र खेमों में बंटने का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन इससे इंसान का
राष्ट्र या समुदायों से हमेशा के लिये अलग-थलग और काल कवलित होने का खतरा जरूर है।
यह हर तरह की युद्ध परंपरा में इस्तेमाल होने वाले संहार के सभी तरीकों में भी
सबसे नया और तीक्ष्ण है। यह अति सुक्ष्म और अदृश्य विषाणु इंसान ही नहीं बल्कि
दुनिया के वजूद को मिटाने की शक्ति भी रखता है। इसलिये अभी बाल्यकाल में ही विकराल
कोरोना को इसी अवस्था में अचेत करना और बड़े होने से रोका जाना सभी के लिये बेहद
जरूरी है।
बड़े ताकतवर की बड़ी लाचारी
कोरोना के आघात ने कई
बड़े और शक्तिशाली राष्ट्रों की नींव भी हिलाकर रख दी है। सबसे ताकतवर राष्ट्र
अमेरिका भी इसके सामने घुटने टेकने को लाचार है। कोरोना के कारण वहां मौतों का
आंकड़ा 60 हजार की संख्या को पार चुका है, जबकि 11 लाख से अधिक लोग संक्रमित है।
अमेरिका में किसी एक वजह से हुई मौतों की यह संख्या 20 साल (1955-1975) तक चले
भीषण वियतनाम युद्ध में मारे गये लोगों या सैनिकों (58,220) से ज्यादा है। अमेरिका
में कोरोना के कारण प्रति लाख लोगों में मरने वालों की संख्या फिलहाल 18 है।
वियतनाम युद्ध के चरम पर होने के समय (1968) वहां हर एक लाख लोगों की संख्या में 9
लोगों की मौत हुई थी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में वहां मरने
वाले लोगों की संख्या वियतनाम युद्ध की अपेक्षा दोगुनी से अधिक है। यह भी ध्यान
रखने योग्य बात है कि वियतनाम युद्ध 20 साल चला था जबकि कोरोना ने महज दो माह में इस
तरह का भीषण कहर बरपाया है, इस संख्या (मृतकों) में बढ़ोत्तरी होने की पूरी
संभावना है।
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| Photo: The Week (Courtesy) |
इंसान के खिलाफ इंसान ही हथियार
कोरोना ने केवल इंसान
की भौतिक शक्ति को ही चुनौती नहीं दी है बल्कि उसने विलक्षण इंसानो की बुद्धिमता
से उपजे विश्व विजयी सामर्थ्यों और संसाधनों को भी चंद दिनों में पंगुता पर ला
दिया है। जीव जगत में सर्वश्रेष्ठ इंसानी विवेक से निर्मित दुनिया की सबसे
विशालकाय, ताकतवर और अत्याधुनिक मशीनों का संचालन भी कोरोना के कारण ठप है। आकाश,
जमीन और समुद्रों को साधने वाली बेहद ऊर्जावान और सर्वसमर्थ अभियांत्रिक शक्तियां
भी फिलहाल लाचार होकर जड़ता में जा पहुंची है। कोरोना की आक्रमक और जानलेवा चालें
इंसान के लिये अब भी अबूझ बनी हुई हैं। उसके षणयंत्र और छल का सबसे भद्दा उदाहरण यह
है कि कोरोना विश्वभर में महामारी फैलाने और इंसानो को अपना ग्रास बनाने के लिये
इंसानो को ही अपना हथियार बना रहा है। एक देश से दूसरे देश या समाज को संक्रमित
करने और भौगोलिक सीमाओं को लांघने का जरिया भी उसने इंसानों को ही बनाया, जो बेहद
खौफनाक है।
प्रथम पंक्ति पर हमला
यह और भी ज्यादा
दुखद है कि इस महासंकट के परिहार के लिये पहले दिन से ही पहली पंक्ति में निडर
होकर खड़े देश और समाज के सचेत बहादुर योद्धाओं पर भी कोरोना ने जबरदस्त आक्रमण
किया। इस वायरस के अचूक आक्रमण के कारण भारत समेत कई देशों के डॉक्टर्स समेत
मेडिकल स्टॉफ, पुलिस, प्रशासन और प्रथम पंक्ति के तमाम लोग या तो जान गंवा चुके
हैं या संक्रमित होकर जनलेवा खतरे से जूझ रहे है।
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| Photo: The Print (Courtesy) |
भविष्य की अनिश्चितताएं
कोरोना के बेदर्द
फितरतों की लंबी फेहरिस्त है। इसने इंसान के मूल स्वभाव मतलब इंसान के सामाजिक
होने के प्राकृतिक सिद्धांत भी पर जोरदार हमला किया है। अतिसूक्ष्म वायरस ने हम
सभी को एक दूसरे से बड़ी, अभूतपूर्व और अनिवार्य सामाजिक दूरी बनाये रखने को विवश
किया। इस अनिवार्य दूरी और लॉकडाउन की विवशता ने हमारे समाज व समूचे परिदृश्य के
सामने कई नई परेशानियां, चुनौतियां और भविष्य हेतु कुछ अनिश्चितताएं भी खड़ी कर दी
है। ये परेशानियां भले ही बेहद अल्पकालिक ही क्यों न हों, लेकिन है बेहद गंभीर।
कोरोना काल में जीवन की जड़ों से जुड़े रहने के लिये जरूरी सामाजिक दूरी या
लॉकडाउन ने कई लोगों को उनके जीवन यापन की जरूरी जड़ों से अलग कर दिया है।
लॉकडाउन के चलते मैन्यूफैक्चिरिंग और सर्विस सैक्टर्स के बंद होने से निजी क्षेत्र के लाखों कर्मचारियों और श्रमिकों का रोजगार संकट में है।
जीवन यापन की नई चुनौती
कोरोना के कारण जरूरी
लॉकडाउन के चलते मैन्यूफैक्चिरिंग और सर्विस सैक्टर्स के बंद होने से निजी क्षेत्र
के लाखों कर्मचारियों और श्रमिकों का रोजगार संकट में पड़ गया है। उनके सामने
भविष्य की अनिश्चितताएं खड़ी हो गयी हैं। कंपनियों के बंद होने से रोजी-रोटी और
कमाई का जरिया भी बंद हो गया है। असंगठित क्षेत्र के प्रतिष्ठान और लाला टाइप कई
कंपनियां अपने इम्पॉलाय को बंद अवधि की पूरी या आधी सैलरी देने से कतरा रही हैं। निम्न
तबके के दिहाड़ी मजदूरों को जीवन यापन के लिये जरूरी खान पान और मूलभूत आवश्यकताओं
से जूझना पड़ रहा है।
मां ने पकाये पत्थर, तसल्ली में सोये बच्चे
कोरोना के कारण भारत
समेत दुनिया के हर देश से हर रोज ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जो मन को व्यथित और
मानवता को झकझोर कर रख देने वाले हैं। बीबीसी की 1 मई एक रिपोर्ट काफी हैरान और
परेशान करने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संकट के कारण कमाई और काम से हाथ
धो चुकी कीनीया की पेनिना बहाती कित्साओ नामक महिला इतनी गरीब हो गयी कि उसे अपने
बच्चों को बहलाने लिए रात भर भोजन के नाम पर पत्थर पकाने का नाटक करना पड़ा। मां
रात भर भूखे बच्चों के लिये पत्थरों को पकाती रही और बच्चे भोजन के इंतजार में ‘तसल्ली खाकर’ सो गये। खाना पकाने का जो स्वांग इस मां ने रचा दरअसल वह उसकी बेबसी को
बयां करती है।
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| Photo: News18.com (Courtesy) |
घर की डगर, मौत का सफर
भारत में भी इसी तरह
की विवशता और दर्द से भरे कई किस्से सामने आ चुके हैं। रामजी महतो 3 अप्रैल को
दिल्ली से 1100 किलोमीटर दूर बिहार के बेगूसराय में स्थित अपने घर के लिए पैदल
निकले। महतो 850 किमी का सफर तय कर 16 अप्रैल को यूपी के वाराणसी में बेहोश होकर
गिर पड़े। उन्हें एंबुलेंस में चढ़ाया ही था कि उन्होंने दम तोड़ दिया। मध्य
प्रदेश के मोतीलाल साहू नवी मुंबई में पेंटर का काम करते थे। 24 अप्रैल को वे
मुंबई से 1400 किमी दूर अपने घर के लिये पैदल निकले। लेकिन 60 किमी के सफर के बाद
ठाणे में रास्ते में ही उनकी मौत हो गई। उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का इंसाफ
अली मुंबई में हेल्पर था। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हुआ तो वह 13 अप्रैल को मुंबई
से यूपी के लिए निकल पड़ा। वह 1500 किमी का सफर तय कर जैसे-तैसे 14 दिन बाद यानी
27 अप्रैल को अपने गांव मठकनवा पहुंचा, जहां उसे क्वारैंटाइन कर
दिया गया। उसी दिन दोपहर में इंसाफ की मौत हो गई। ऐसे कई और उदाहरण है, जो कोरोना
संकट से बचे लेकिन दूसरे संकट में जा फंसे।
आगे का हर मार्ग फिलहाल बेहद धुंधला व संकटों से भरा पड़ा दीख रहा है और यथास्थिति से उपजे उबाऊपन की छटपटाहट में हर किसी का दम घुटे जा रहा है
सड़क से संसद तक सभी लाचार
कुल मिलाकर कोरोना
के कारण असंख्य लोगों के सामने खुद के पेट और परिवार के भरण-पोषण का नया संकट खड़ा
हो गया है। जीवन में अचानक आयी इस नई चुनौती से निपटने में वे सक्षम नहीं रह गये
हैं, क्योंकि रोजी-रोटी की उनक मूल व्यस्था छिन चुकी है। ऐसे लोग कोरोना संक्रमण
से भले बच गये हों लेकिन जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिये आगे का उनका सफर
फिलहाल आसान नजर नहीं आता। पेट और परिवार का पोषण ऐसे लोगों को नये तरह के जानलेवा
संकट में डाल सकता है। उदर पोषण और बेरोजगारी की समस्या ने ऐसे लोगों का जीना दूभर
कर दिया है। कोरोना के कारण असंख्य लोग ‘न घर के न घाट के’
बनकर रह गये हैं। सभी की लाचार नजरें और टूटी उम्मीदें सरकार पर ही टिकी हुई है।
कोरोना संकट के इस
दौर में सरकार की विवशता भी कुछ कम नहीं है। सरकार के सामने भी ‘आगे बाघ पीछे आग’ वाली स्थिति है। महामारी में सुधार होने से पहले, जल्दबाजी या दबाव में
आकर सरकार यदि उद्योगों को खोलती है तो जानलेवा कोरोना का खतरा बढता
है, यदि लंबे समय तक यथास्थिति रहती है तो लोगों के सामने भूख का संकट गहराता है। कोरोना
के कारण उपजी इस बहुआयामी समस्या ने सभी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से
आगे का हर मार्ग फिलहाल बेहद धुंधला व संकटों से भरा पड़ा दीख रहा है और यथास्थिति से उपजे उबाऊपन की छटपटाहट में हर किसी का दम घुटे जा रहा है।
Subhash Raturi




1 comment:
Each n every word describing finely how helplessness today we are! In addition to self care It encourage us to be reponsible towards such trouble and condition not only in India but all over the world..
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