वर्तमान
समय में लुधियाना में रहने वाले इशेर सिंह सोबती को बचपन से लेखन का शौक था लेकिन
भारत-पाक विभाजन की घटना ने उनके एक अच्छे लेखक बनने के सपने को तब चकनाचूर कर
दिया.
विभाजन
के समय सोबती सिंध (पकिस्तान) छोडकर भारत चले आये. उन्हें यहाँ अपने जीवन की
शुरुवात एक ट्रक ड्राइवर के रूप में करनी पडी. यहाँ लंबे समय तक वह ट्रक चलाकर
अपनी पेट की भूख को तो शांत करते रहे लेकिन उनके लेखन की भूख कभी शांत नहीं हुई.
ट्रक चलाते हुए भी जब-तब, जहाँ-तहां,जो देखा और जिया उसे वो लिखते रहे. कथा-कहानियों
की ही तरह, इस ट्रक ड्राइवर के जीवन में भी कई पडाव आये.
ट्रक ड्राईवरी के बाद उन्होंने एक फ्लोर मिल कर्मचारी के रूप में भी काम किया जो
बाद में एक कुशल किसान बनने के सफर तक जा पहुंचा. आज सोबती ९५ वर्ष के हैं. उम्र
की इस ढलान पर अब सोबती के जीवन में भी किसी उपन्यास के अच्छे क्लाइमेक्स की ही
तरह वह सुखद समय आया जिसकी कल्पना उन्होंने अपनी लिखी कहानियों में तो कम से कम
कभी नहीं की थी. सोबती को कुछ माह पहले ही ताइवान में वर्ल्ड अकेडमी आफ आर्ट्स एंड
कल्चर द्वारा आयोजित वर्ल्ड काँग्रेस ऑफ पोएट्स में साहित्य से सबसे बड़े सम्मान
डॉक्टर आफ लिटरेचर (डीलिट) की उपाधि से नवाजा गया.
लुधियाना
में बतौर किसानी काम करने वाले इशेर सिंह सोबती का लेखन का काम किसान बनने के बाद
भी जारी रहा. बचपन से लिखने का शौक रखने वाले सोबती अब तक कई किताबें लिख चुके हैं.
“अनोखे फूल” उनका पहला उपन्यास था. अनोखे फूल लिखने के बाद जीवन संघर्ष के चलते वह
लंबे समय तक लिख नहीं सके. भारत में उनकी पहली किताब कहानी संग्रह “नेकी” के
रूप में काफी लंबे समय के बाद 1989 में आयी. उसके बाद
उन्होंने कई सारी किताबे लिखी जिनमे “पूरब ते पच्छम”,
भारत पाक बंटवारे पर “सच्ची कहानी
बंटवारे की”, “अमन” आदि है. वर्ष 2006 में उन्हें उनकी पंजाबी पोएट्री “खायालें दे वेहाँ”
को राज्य सरकार ने सम्मानित किया. यह किताब दिल्ली में आयोजित विश्व
पुस्तक मेले में रिलीज की गयी थी जिसे संस्था ने डीलिट के लिए भेजा और पिछले साल ५
नवम्बर को उन्हें साहित्य की इस बड़ी मानद उपाधि से सम्मानित किया गया. इसके अलावा
उनकी कई किताबों में बतौर ट्रक ड्राइवर के अनुभव भी कहानियों के रूप में हैं.
By Subhash Raturi, 13th
May 2016
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