पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड
(देवभूमि) में एक के बाद एक अलग अलग तरह की आपदा-विपदा लगातार बढ़ती जा रही है, अब लगभग
हर ऋतु में वहाँ कुछ न कुछ अनिष्ट हो रहा है. आजकल गर्मियों में भयंकर आग ने त्रासदी
मचा रखी है, बरसात के दिनों में भूस्खलन से तबाही और शीतकाल में असहनीय बर्फवारी जैसी
पीड़ा इस हिमालयी राज्य की नियति बनती जा रही है. जाहिर है कि वहाँ अब दनावल के
कारण वसंत आने से पहले ही मुरझाता जा रहा है. देवभूमि और वहाँ के लोग न जाने किस चक्रचाल
में फंसते जा रहे हैं? वहाँ लगातार जंगल कट रहे है और हरियाली खत्म हो रही है. जंगलों
में सुनियोजित प्लांटेशन और पर्यावरणीय देखभाल के अभाव में चीड के वृक्ष लगातार बढ़
रहे है, जो जंगलों में आग भड़कने के सबसे बड़े कारणों में से एक है. शहरों के निकट नित नयी बस्तियां बस
रही है और सुदूर बसे प्राचीन गांव खाली हो रहे, नदियों को रोका जा रहा है और
बहुतायत छोटे-बड़े बांधों का निर्माण हो रहा है. सूदूरवर्ती गांव तक सुगम पहुँच के
लिए सडकों के निर्माण के लिए हरे-भरे घने जंगलों के सीने चीरे जा रहे है. विभिन्न
कारणों से उजडते जंगलों की वजह से वहाँ की प्राचीन वनस्पतियां भी खत्म होती जा रही
है और पारस्थिकीय संतुलन निरंतर बिगडता जा रहा है. इस वजह से जंगली जानवर भोजन की
तलाश में इंसानी बस्तियों की ओर बढ़ रहे है. उत्तराखंड में प्रतिवर्ष दर्जनों लोग
इन जानवरों के हमलों का शिकार बन रहे है. इन सब वजहों से जानवरों के साथ साथ वहाँ प्रक्रति
भी हमलावर होने लगी है.
वैसे यह सब कुछ
अनायास नहीं है, इसके लिए हम और हमारी लोग या यूं कहें कि तुच्छ मानवीय
सोच ही जिम्मेदार
है. प्रकृति से अनावाश्यक छेड़छाड़ और उससे कुछ पाने के तुच्छ लालच ने ही इन
त्रासदियों को जन्म दिया है. वर्तमान समय में वहाँ लगी आग की ही बात करें तो इसके
पीछे भी कुछ इंसानों की तुच्छ सोच ही सामने आती है. जंगलों में लगी आग के पीछे टिम्बर
मर्चेंट्स (लकड़ी के ब्यापारियों) और कुछ भू माफियाओं का हाथ बताया जा रहा है. टिम्बर
मर्चेंट्स वन विभाग के साथ मिलकर करोड़ों रूपये की लकड़ी प्रतिवर्ष बेचते है जबकि
भू-माफिया इस तरह की जमीन खरीद-फरोख्त का काम करते है. हालांकि कभी-कबार मानवीय
लापरवाही से भी आग लग जाती है लेकिन इस तरह की आग का एक सीमित दायरा होता है. यह
किसी गाँव के जंगल या इसके अहाते,पट्टी आदि तक ही सीमित होती है. इसके अलावा वहाँ
के ग्रामीण भी कभी कभी किसी निश्चित जगह या छोटे छोटे हिस्सों में जानबूझकर भी आग
लगाते है ताकि पशुओं के लिए ज्यादा चारा पैदा हो सके या फिर ग्रामीण लोगों को सूखी
लकडियाँ मिल सके. लेकिन मौजूदा वनाग्नि पूरी तरह से अलग है. उत्तराखंड के सभी १३
जनपदों के जंगल में इतने बड़े पैमाने पर आग का लगना कोई संयोग या मानवीय लापरवाही
नहीं बल्कि एक सोची समझी साजिश ही है. अब तक वहाँ के 13 जिलों में फैला 2800 हेक्टेयर से भी ज्यादा
जंगल तबाह हो चुका है. वन्यजीव, जड़ीबूटियां और
वहाँ की दुर्लभ वनस्पतियां राख हो रही है, मवेशी
चारे और पानी के बिना बेहाल हैं, वातावरण में घना धुँआ भरा हुआ है, कई गाँव के लोगों को सांस
लेने में तकलीफें हो रही है. उत्तराखंड के पौड़ी, चमोली, नैनीताल और अल्मोड़ा जिलों में हालात ज्यादा खराब हैं. बताया जाता है कि अब तक वनाग्नि से अलग-अलग जगहों पर
छह लोगों की मौत हो चुकी है. कई लोग घायल हैं. यह हरे-भरे वनों से
आच्छादित, हिमालयी नदियों से सींचित और हमेशा से शुद्ध वायुमंडल वाले उत्तराखंड के
लिए लिए एक बुरे सपने की तरह है. इन सभी तुच्छ मानवीय क्रियाकलापों पर यदि समय
रहते विराम नहीं लगा तो भविष्य में उत्तराखंड के सौंदर्य पर और भी कई काले दाग लग
सकते हैं, इसका अस्तित्व झुलस सकता है या फिर बरसात में बहकर या हिमपात में
ठिठुरकर धराशायी हो सकता है. हमें इसके प्राकृतिक वजूद को बचाने के लिए समय रहते
जरूरी कदम उठाने होंगे.
By
Subhash Raturi, 02 May 2016


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