सुभाष रतूड़ी:
कोरोना की वैश्विक महामारी में जहां-तहां फंसे
प्रवासियों की सबसे बड़ी प्राथमिकता अपने सुरक्षित ठिकानों और घरों तक पहुंचने की
है। इस समस्या को लेकर सरकार भी खासा चिंतित है। देश में लॉकडाउन के चलते घर-गांव
से दूर फंसे प्रवासियों को इस मुश्किल समय में कोई संकट से उबारे तो उसे बड़ा
संकटमोचक ही कहा जायेगा। उत्तराखंड के मूल निवासी और सूरत (गुजरात) में रहने वाले
डा. देवेश्वर केशवानंद भट्ट भी इसी तरह की एक शख्सियत बनकर सामने आयी है, जिन्होंने के संकट
में फंसे सैकड़ों प्रवासियों को गुजरात से उत्तराखंड अपने गांवों को वापस भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सरकार से समन्वय कर इसके लिये
दो ट्रेनों को भी चलावाया। अब तक कुल 2400 प्रवासियों के लिये टिकट और ट्रेन की
व्यस्था करने वाले डा भट्ट अन्य लोगों के लिये 2 और ट्रेन लगवाने के प्रयास
में जुटे हुए है।
डां भट्ट ने खुद और सामाजिक तौर पर सक्रिय व सक्षम प्रवासियों की मदद से 11 और 12 मई की सुबह सूरत से क्रमश
काठगोदाम और हरिद्वार के लिये अपने प्रयासों से दो ट्रेनों को चलावाया,
जिनमें 1200-1200 प्रवासी सवार हुए। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने सभी 2400 लोगों
के लिये टिकट की व्यस्था भी करवाई।
डा. भट्ट की बेटी ममता भट्ट, जो कि एक रेडियो
जैकी है, ने उत्तराखंड के लोगों के लिये उनके पिता द्वारा किये गये इस सराहनीय
कार्य को गर्व के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया है। पिता के साथ एक वीडियो साझा
करते हुए ममता भट्ट ने 1200 टिकटों का वो बंच भी दिखाया है,
जो प्रवासियों के लिये ट्रेन द्वारा घर जाने के
लिये बनवाई गयीं है। गुजरात में रहने वाले उत्तराखंड के प्रवासी और घर लौटे लोग डा
भट्ट और उनकी टीम के इस उपकार को अब शायद ही कभी भूल पाएंगे।
![]() |
| डा. देवेश्वर भट्ट |
पूरे पहाड़ के फोन और नींद गायब
बेटी ममता भट्ट के साथ वीडियो में बातचीत करते
हुए डा. भट्ट कहते हैं कि कोरोना के कहर के कारण ही ऐसा हो पाया है। वे कहते हैं, गुजरात में “फैक्ट्रियां, होटल, रेस्टोरेंट्स आदि
बंद हो गये थे। कारीगर, वर्कर्स सभी खाली बैठकर एक नई मूसीबत में फंस गये। सभी लोग तरह तरह की
चिंताओं औऱ भय से घिरे हुए थे। यहां तक कि कुछ तो भागने की बात तक कर रहे थे। मुझे
जब ये सब पता चला तो मैंने उन्हें समझाया कि भागने और चिंता करने की कोई बात नहीं
है। हम कुछ जरूर करेंगे और समस्या का समाधान निकालेंगे”।
डा. भट्ट कहते हैं कि उत्तराखंड समाज सूरत
(गुजरात) का प्रेसीडेंट होने के नाते भी पूरे पहाड़ से उनके पास कई फोन आने शुरू
हुए। उत्तराखंड के लोग अपने परिजनों की मदद करने और कुशल क्षेम पूछने के लिये उनके
पास ही कई फोन कॉल करते रहे। तभी से उन्होंने संकट में फंसे लोगों की मदद करने की
ठीन ली और इस मुहिम में कुछ सक्रिय लोगों को भी अपने साथ जोड़ा।
प्रवासियों को संकट में फंसा देख डा भट्ट की नींद
गायब होनी स्वाभाविक थी, जिसके बाद वे दिन-रात अपने लोगों को घर भेजने के प्रयासों में जुट गये। उन्होंने
स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई। डा. भट्ट कहते हैं कि गुजरात
के मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर, स्थानीय प्रशासन और लोकल लोगों ने भी उनकी पूरी मदद की।
![]() |
| एक कार्यक्रम में दीप प्रज्वलित करते डा. भट्ट |
..मेहनत लाई रंग
आखिरकार डा भट्ट व उनकी टीम की दिन-रात की मेहनत रंग लायी और
उनकी गुहार पर सरकार उत्तराखंड के लिये दो ट्रेने चलाने को राजी हो गयी। पहली
ट्रेन 11 मई को सूरत से हलद्वानी (काठगोदाम) के लिये रवाना हुई। जबकि दूसरी
ट्रेन आज सुबह 4 बजे 12 मई को सूरत से हरिद्वार के लिये रवाना हुई है। इन दोनो ट्रेनों में 1200-1200 प्रवासी सवार हुए
हैं।
मूल रूप से पौड़ी के रहने वाले डा. भट्ट वीडियो
में कहते हैं कि उनके पास अब तक कुल लगभग 5000 ऐसे लोगों के नाम आ चुके हैं,
जो अपने गांव उत्तराखंड जाना चाहते हैं, इसलिये वे दो और
ट्रेनों को चलाने के प्रयास में जुटे हुए है। उनका कहना है कि इनके अलावा कई ऐसे
लोग भी हों, जो बसों और अन्य साधनों से उत्तराखंड रवाना हो चुके हैं। डा. भट्ट ने टिकट के अलावा ट्रेन से सवार होने से
पहले प्रवासियों के लिये एक मीटिंग स्पॉट भी तय किया, जहां उन्हें टिकट
वितरित किया गया साथ डॉक्टरी चेकअ और नाश्ते की भी व्यस्था की गयी।
दो-दो महाभारत
डा. भट्ट की बिटिया कहती है कि पिछले कुछ दिनों
में घर से दो महाभारत चल रहे थे, एक टीवी पर और एक पिता के साथ। वे कहती है कि उनके परिवार वालों को भी
कभी यकीन नहीं कि पिता इस मुश्किल घड़ी में ट्रेन चलवाने जैसा काम कर सकेंगे।
लेकिन अब उन्होंने जब असंभव को संभव कर दिखाया तो सभी को उन पर नाज है। डा भट्ट और उनकी टीम ने
संकट की इस घड़ी में मदद और मानवता की जो मिसाल कायम की है, वह सरकार समेत आम
आदमी को प्रेरित करने वाली है। उत्तराखंड समाज के कई लोग डा. भट्ट का इस नेक कार्य
के लिये लगातार आभार जता रहे हैं और इसके लिये उन्हें कई तरह के संदेश लिखकर भेज
रहे हैं।



2 comments:
commendable job
Post a Comment