Tuesday, May 3, 2016

क़ानूनी भय नहीं, सुरक्षा के लिए करें ट्रैफिक नियमों का पालन



भारत के लिए यह काफी चिंताजनक बात है कि देश में सड़क हादसों की तादाद प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है. बीते वर्ष 2015 में 1.46 लाख लोग सड़क हादसों में मारे गए, यह संख्या वर्ष 2014 की तुलना में 5 फीसदी अधिक है. यानि देश की सड़कों पर पिछले वर्ष 2015 में 3.6 मिनट के अंतराल में औसतन एक ब्यक्ति की मौत हुई. भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बनता जा रहा है जहाँ सर्वाधिक सड़क हादसे होते है और इन हादसों में सबसे ज्यादा लोग जान गँवा बैठते है. पिछले कुछ सालों में देश में हुई अप्राकृतिक मौतों की तुलना में अगर सड़क हादसों में हुई मौतों से की जाये तो जो आकडें सामने आते है वे काफी चौकाने वाले है. इन आकडों के मुताबिक़ आतंकवादी हमलों, देश की सीमाओं पर सैन्य बलों के साथ होने वाली मुठभेड़, प्राक्रतिक आपदा आदि के कारण हुई मौतों से ज्यादा लोग देश की सड़कों पर होने वाले सड़क हादसों में मारे गए. जाहिर है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों के कारण जान माल का भारी नुकसान होने के अलावा जो राष्ट्रीय और सामाजिक क्षति देश को उठानी पड़ती है उसकी भरपाई मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है.
ऐसा नहीं कि सरकार देश में बढते सड़क हादसों को लेकर चिंतित नहीं है या सरकार द्वारा सड़क हादसों में कमी लाने के प्रयास नहीं किया जा रहे है. दरअसल केन्द्र और राज्य सरकारें भी हर बार सड़क हादसों से निपटने के लिए कुछ न कुछ नयी
योजना लाती रहती है लेकिन अभी तक हादसों में कोई अपेक्षित कमी नहीं आ सकी. रोड इंजीनियरिंग और वाहन की तकनीक जैसी खामियों को छोड़ दिया जाये तो अधिकतर सड़क हादसों के पीछे ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करना सबसे बड़ा कारण है. ट्रैफिक नियमों की अनदेखी में ड्रंकन ड्राइविंग, ओवरस्पीडिंग, ओवरटेकिंग जैसे बड़े कारण भी शामिल हैं. समाज में आम आदमी समेत सड़क पर रोड यूजर्स और वाहन चालकों में बढ़ती संवेदनहीनता का मनोविज्ञान भी बढते सड़क हादसों के ग्राफ को बढ़ा रहा है. जीवन की आपाधापी, तेज रफ़्तार जीवन शैली और दौड़-धूप के कारण घर के अंदर और बाहर सड़क पर भी आम आदमी की सब्र की क्षमता कमजोर होती जा रही है जिसकी परिणिति सड़क पर हादसों के रूप में हो रही है, हालांकि यह बात दिल्ली जैसे बड़े महानगरों पर ज्यादा सटीक बैठती है, जहां हर आदमी में दूसरे से आगे निकलने की होड मची हुई है. हकीकत में देखा जाए तो सड़क हादसों में कमी लाने की जिम्मेदारी सरकार से पहले हर उस आदमी की भी है जो रोड यूजर्स है. यदि प्रत्येक ब्यक्ति स्वयं वाहन चलाते हुए दूसरे का भी ध्यान रखे और यातायात नियमों का विधिवत पालन करे तो सड़क हादसों में कमी आ सकती है. हर रोड यूजर्स और ड्राइवर्स को इस बात का ध्यान रखना  होगा कि रोड सेफ्टी के नियम उनकी कानूनी बाध्यता न होकर उनकी सुरक्षा के लिए बने है. जब हर ब्यक्ति के अंदर यह भावना जागेगी तो निश्चित ही सड़क हादसों में होने वाली अकाल मौतों पर ब्रेक लग सकेगा. सड़क सुरक्षा के प्रति जब तक प्रत्येक आदमी जागरूक नहीं होता और इसे अपनी प्रार्थमिकता नहीं मानता तब तक सड़क दुर्घटनाओं में कमी नहीं लाई जा सकती है. 
                                                           
By Subhash Raturi, 04 May 2016


1 comment:

Unknown said...

हम खुद इन हादसों के लिए जिम्मेदार हैं