Sunday, June 30, 2019

मेरे साथ चलिये मनमोहक बेनीताल की यात्रा पर



सुभाष रतूड़ी: 
नैसर्गिक सौंदर्य  और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर देवभूमि उत्तराखंड में लगभग चार दर्जन छोटी-बड़ी कुदरती झीलें हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ताल या कुंड भी कहा जाता है। यहां मौजूद प्रमुख तालों में नैनीताल, भीमताल, नौकुछिया ताल, मंसूर ताल, बासुकी ताल, विष्णुताल, संतोपथ ताल (झील), सुखताल, नचिकेता ताल, डोडी ताल, देवरियाताल, तप्त कुंड, रूप कुंड, ऋषिकुंड, हेमकुंड, गौरीकुंड आदि प्रमुख है। आपने भी इन तालों या कुंडों का नाम जरूर सुना होगा। सभी ताल राज्य के हर जनपद में मौजूद हैं। माना जाता है कि इन सभी तालों में कभी देवी-देवता, ऋषि-मुनी समेत वनदेवियों का स्नान होता था। इसके अलावा इन तालों का बड़ा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। आज भी देश-विदेशी सैलानियों और शोधकर्ताओं के लिये ये ताल रहस्य और आकर्षण के केंद्र बने हुए है। उत्तराखंड के इन तालों में कुछ ताल ऐसे भी है, जो सरकार की अनदेखी के कारण अपेक्षाकृत अधिक उपेक्षित है। इन्हीं तालों में शामिल है एक और ताल बेनीताल (Benital)। इस लेख में मैं आपको लिये चल रहा हूं खूबसूरत बेनीताल की यात्रा पर, जहां आप संक्षिप्त में रबरू होंगे इसके अतीत से और जानेंगे इसके वर्तमान की दर्द भरी कहानी..साथ ही यहां छुपी भविष्य की कुछ संभावनाएं भी।

जब बेनीताल में मौसम में अचानक बदली करवट (फोटो- सुभाष रतूड़ी)

बेनीताल का मार्ग
बेनीताल पहुंचने से पहले आपको इसकी लोकेशन जानना जरूरी है। बेनीताल उत्तराखंड राज्य में सीमांत जनपद चमोली के कर्णप्रयाग तहसील में स्थित है। बेनीताल के लिये आपको हरिद्वार या ऋषिकेश से बद्रीनाथ राजमार्ग होते हुए कर्णप्रयाग तक पहुंचना होगा, जो इसका नजदीकी बड़ा स्टेशन है। कर्णप्रयाग से बेनीताल की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। कर्णप्रयाग से नेनीताल की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित सिमली-रतूड़ा मार्ग से आप बेनीताल पहुंच सकते हैं। अपार पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए बेनीताल को अब चारों तरफ से सड़क मार्ग से जोड़ने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है। फिलहाल यह कर्णप्रयाग-सिमली-रतूड़ा मार्ग से सीधा जुड़ा हुआ है। बगोली-जेंटा-ग्वालखेत-पेंखोली मोटरमार्ग का बैनीताल तक विस्तारीकरण की भी योजना है। सिमली-बैनीताल मोटर मार्ग का जंगल चट्टी तक 8 किमी. विस्तारीकरण की भी योजना है। जंगलचट्टी तक इस सड़क के निर्माण के बाद बेनीताल उत्तराखंड की प्रस्तावित राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैंण) से सीधे जुड़ जायेगा।
बेनीताल झील के एक हिस्सा (फोटो- सुभाष रतूड़ी)

बेनीतल टी स्टेट और इतिहास 
 माना जाता है कि 1815 के आसपास में कुछ अंग्रेज़ यात्रियों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों पर गया, जिसे वहां के स्थानीय क़बाइली लोग एक पेय बनाकर पीते थे। अंग्रेजों ने इसे खूब बढावा दिया। इसी के कुछ वर्षों बाद 1834 में भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड बैंटिक ने भारत में चाय की परंपरा शुरू की। उन्होंने इसके व्यवसायिक उत्पादन की संभावनाओं को तलाशने के लिये एक समिति का गठन किया। इस समिति के लोगों ने देश में उन स्थानों की पहचान की, जिसकी जलवायु और उत्पादकता चाय के उत्पादन के लिये अनुकूल थी। इसी समिति ने अपने खोज के दौरान बेनीताल को एक बड़े टी स्टेट रूप में चिन्हित किया। बेनीताल की खोज भी इसी समिति की देन मानी जाती है। अंग्रेजों ने बेनीताल को आजादी से पूर्व देश की 48 टी-स्टेटों में विशेष स्थान दिया। इसका सबसे बड़ा कारण यहां की चाय का सर्वोच्च गुणवत्ता युक्त होना था। यहां शीतोष्ण जलवायु की चाय उगायी जाती थी। इस चाय की गुणवत्ता सबसे उत्तम प्रकार की होती है। उत्तराखण्ड के अलावा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी ढालों की मध्यवर्ती भूमि पर इस प्रकार की चाय पैदा होती है।
बेनीताल टी स्टेट की चायपत्ती का ब्रिटेन में खासा महत्व था। यहां से उत्पादित चाय को इको-डस्ट और बदरीश-टी के नाम से कोलकाता होते हुए समुद्री रास्ते से ब्रिटेन भेजा जाता था। शुरूआत में अंग्रेजों ने बेनीताल क्षेत्र को केवल चाय उत्पादन के लिए विकसित किया लेकिन बाद में यह उनका एक पंसदीदा पर्यटक स्थल भी बन गया था।
बेनीताल झील का दूसरा हिस्सा (Photo By Suryansh)


बेनीताल का धार्मिक महत्व
बेनीताल का धार्मिक महत्व भी देवभूमि उत्तराखंड के अन्य तालों, कुंडों या प्रमुख स्थलों की तरह बेहद खास और व्यापक है, जिस पर अलग से लिखने की जरूरत है और कभी अलग से लिखूंगा। लेकिन इतना समझ लीजिये कि गढवाल और कुमांऊ क्षेत्र में स्थित सभी तालों का विशिष्ठ धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इतिहास और साहित्य में बेनीताल को बेनी लेक (Beni Lake) के नाम से भी जाना जाता है। बेनी शब्द उत्तराखंड की लोक बोलियों (भाषा) में प्रयुक्त होने वाले बैंणी शब्द से बना हुआ माना जाता है, जिसका अर्थ हिंदी में बहन होता है। अत: बेनी-ताल समेत कई तालों को नौ बैणियों (बहनों) का ताल माना जाता है। यहां नौ बैणियों का मतलब मां नंदा, नैणी या नागिनी देवी, मां पार्वती और देवी के नौ रूपों से है। जैसे नैनीताल को देवी नंदा के इन्हीं रूपों में से एक नैना देवी के लिये जाना है। इसी तरह यह ताल भी कई तरह के धार्मिक महत्वों से जुड़ा हुआ है। इस पर फिर कभी विस्तार से लिखा जायेगा।
हिमालय से बराबरी करता दिखता बेनीताल (फोटो- सुभाष रतूड़ी)

अनमोल बुग्याल, अनमोल तोहफा
बेनीताल उत्तराखंड को प्रकृति का दिया गया एक अनमोल तोहफा है। हरे-भरे घने जंगलों के तल से लगे पठारनुमा बड़े-बड़े तप्पड़ (मैदान) और इनके बीच बनी आकर्षक कुदरती झील बेनीताल का मुख्य आकर्षण है। झील के करीब चारों ओर धीर-धीरे उठते पठार और उन पर हमेशा आच्छादित हरियाली बेनीताल को एक छोटे बुग्याल के रूप भी देती है। यहां 24 घंटे चलने वाली शीतल हवाएं और हर मौसम में निखरने वाला बेनीताल का अलग-अलग तरह का सौंदर्य हर किसी को हमेशा के लिये अपना बना देता है। यहां खड़ा होकर कोई भी हिमालय से नजरें मिला सकता है। चांदपुरगढ़ के करीब और ऊपर होने के कारण यहां से चांदपुर पट्टी (परगना) के दर्जनों गावों का नयनाभिराम दृश्य अनायास ही हर किसी का मन मोह लेता है।

बंगला परिसर में की गयी तारबाड़ (फोटो- सतीश रतूड़ी)

उपेक्षित झील
बेनीताल झील लगभग 400 मीटर लंबी और 80 मीटर चौड़ी है। माना जाता है कि इस झील का आकार पहले और भी कई बड़ा था, जो अथाह गहरी भी थी। कुछ लोककथाओं और गीतों में काफी समय पहले इस तालाब में एक रात को बारा बीसी (12 x 20) बारातियों के डूबने का भी जिक्र आता है, जिससे इसके विशाल आकार को समझा जा सकता है।  लेकिन रखरखाव के अभाव और सरकारी उपेक्षा के कारण इसका आकार लगातार घटता जा रहा है। कुछ सालों पहले इस झील में सदाबहार स्वेत कमल खिले रहते थे। झील के आस पास के क्षेत्रों में अंग्रेजों द्वारा लगाये गये सेब, खुबानी, आड़ू, नाशपाति, अखरोट आदि के पेड़ आज भी रसीले फल देते है जबकि इनकी उम्र सौ वर्षों से भी अधिक हो चुकी है। हालांकि अब कुछ पेड़ों पर उनका उनका बुढापा नजर आने लगा है। पूरे बेनीताल में अंग्रेजों द्वारा लगाये गये चायपत्ती के कुछ पौधे अब भी हरे-भरे दिखते है लेकिन देखरेख के अभाव में वे जीवन की निरंतरता की चुनौती से जूझते नजर आ रहे है।

बेनीताल में नवंबर के दूसरे फखवाड़े से लेकर फरवरी के मध्य तक अमूमन अति ठंझ रहती है। इसी बीच इस मौसम में बेनाताल की हरियाली और इसका आंचल बर्फ से ढ़का रहता है। बैनीताल आसपास भी इस दौरान हिमाच्छादित रहते है। श्वेत चादर ओढ़े बेनीताल को देखना हर व्यक्ति के लिये एक नया और अंचभित कर देने वाला अनुभव होता है।

बेनीताल स्टेट मैनेजर जग्गीराम जी (सबसे बाएं), पुरुषोतम रतूड़ूी (बाएं से दूसरे) और अध्यापक श्री शिव प्रसाद रतूड़ी (दाएं से दूसरे) (Photo By Suryansh)

बेनीताल को संवारते हैं एक अध्यापक

हाल के दिनों में लंबे समय बाद एक बार फिर मुझे भी बैनीताल जाने का मौका मिला। यह भ्रमण चाचा श्री शिव प्रसाद रतूड़ी जी के कारण काफी अहम रहा। शिव प्रसाद रतूड़ी जी वर्तमान समय में राजकीय इंटर कालेज खेती में बतौर वरिष्ठ अध्यापक तैनात है। वे पिछले दो दशकों से अध्यापन कार्य के अलावा क्षेत्रीय जनसरोकारों और पर्यावरण से संबंधित कार्यों में भी जुड़े हुए है। प्रकृति प्रेमी श्री रतूड़ी जी अक्सर बेनाताल की शांत वादियों में अक्सर आया करते हैं। पर्यटकों की बढती आवाजाही से दूषित होते बेनीताल कि चिंता उन्हें अक्सर यहां लेकर आती है। बेनीताल झील के बिगड़ते स्वरूप को लेकर भी वे काफी चिंतित है। वे जब भी यहां आते है, यहां फैले कचरे को इकट्ठा करते हैं और वापसी में अपने साथ लेकर इसका निस्तारण करते हैं। वे कहते है कि ऐसी सुंदर वादियों को प्रदूषित करना इंसान का अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना है। वे बेनीताल आने वालों से गंदगी न फैलाने की अपील करते रहते है। उनका कहना है कि कुदरत के सौंदर्य के बनाये रखने और उसे संवारने में सभी की सहभागिता जरूरी है। 

अंग्रेजों द्वारा लगाये गये सेब और नाशपाती के कई पेड़ अब बूढ़े होने लगे हैं। (Photo By Satish Raturi)

प्रबंधक गज्जीराम जी की चिंता
गज्जीराम जी पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से बेनीताल टी स्टेट के प्रबंधक है और लगातार आते रहने के कारण शिव प्रसाद रतूड़ी जी के भी अच्छे मित्र हैं। हाल के दिनों पर्यटकों की आवाजाही बढ़ जाने के कारण उन्होंने अपने बंगले की चारदिवारी कर दी है, ताकि कोई अंदर न घुस सके। गज्जीराम जी भी कहते है कि यहां कई तरह के लोगों का आना जाना लगा रहता है। प्रकृति के इस तोहफे को लोग एक पिकनिक स्पॉट समझते है और शराब पीने-कबाब खाने के लिये यहां आ रहे है। पर्यटकों द्वारा फैलायी जा रही गंदगी के कारण वे भी खासे परेशान औ चिंतित है। यहां आने वाले लोगों द्वारा बढ़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा छोडा जाना अति चिंताजनक है। गज्जीराम जी खुद कॉन्वेंट स्कूल से पढ़े लिखे है और फर्टेदार अंग्रेजी बोलते है। उनका कहना है कि हाल के दिनों में यहां बाहरी और पढ़े-लिखे लोगों का आवागमन बढा है। लेकिन पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण को लेकर उनमें से कुछ लोगों का रवैया अति अशोभनीय लगता है, क्योंकि वे यहां आकर गंदगी-कचरा फैलाने के साथ-साथ बर्ताव भी ठीक नहीं करते। प्रकृति के प्रति इस तरह के लोगों का कम होता दर्द सभी के लिये चिंताजनक है।





घरजवैं, फ्य़ौली समेत कई गढ़वाली फिल्मों में काम कर चुके वयोवृद्ध लोक फिल्म कलाकार श्री पुरुषोतम रतूड़ी भी बेनीताल को लेकर सरकार की अनदेखी से खासे नाराज है। मृतप्राय होती झील को लेकर वे आश्चर्य में पड़ जाते है। उनका कहना है कि वे यहां कुछ सालों पहले एक गढ़वाली फिल्म का फिल्मांकन भी कर चुके है लेकिन तब झील में पूरा पानी था कई तरह के फूल खिले हुए थे। चारों ओर हरियाली थी। लेकिन अब झील का अस्तित्व संकट है। वे सभी स्थानीय लोगों से एकजुट होने और झील को संवारने की दिशा में कार्य करने की अपील करते हैं।  






खतरे में वजूद
बेनीताल के पास आज भी आथाह नैसर्गिक सौंदर्य, प्राकृतिक संसाधन,पर्यटन, सुदृढ़ आर्थिकी समेत वानिकी के कई अनमोल तोहफे सरकार समेत आम आदमी के लिये मौजूद है, लेकिन लंबे समय से सरकार की उपेक्षा के कारण इसका प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक पहचान दोनों खतरे में है। बेनी झील अब अत्यधिक गाद और खरपतवार से पटी हुई है और अपने प्राचीन अस्तित्व को ढूंढती हुई लाचार नजर आती है। झील से पानी लगातार कम होता जा रहा है। झील का गिरता जलस्तर पूरे क्षेत्र समेत दर्जनों गावों के लिये खतरे की घंटी है, क्योंकि झील की तलहटी में चारों ओर फैले जंगलों से निकलने वाले प्राकृतिक जल स्रोतों से ही यहां के गांवों के लिये पानी की आपूर्ति होती है। यहां के पानी की आपूर्ति बणगांव समेत सिमली के समीप स्थित कई गांवों तक होती है, जो यहां से कई किलोमीटर दूर है।  

राजनीतिक महत्व और शहीदी मेला
बाबा मोहन उत्तराखंडी शहीद स्मारक (फोटो क्रेडिट- www.Ratura.in) 

पहाड़ी राज्य होने के कारण गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाये जाने की मांग उत्तराखंड राज्य स्थापना के वक्त से चली आ रही है। इसी मांग को लेकर पूर्व सैनिक रह चुके पौड़ी निवासी बाबा मोहन उत्तराखंडी ने लगभग एक माह तक बेनीताल में आंदोलन और भूख हड़ताल की। प्रशासन के कई अनुनय-विनय के बाद भी उन्होंने भूख हड़ताल को खत्म नहीं किया और आखिरकार प्राण त्याग दिये। यद्यपि उनकी मौत को लेकर आज भी कई सवाल उठाये जाते है और प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया जाता है। उनके इस इस बलिदान पर बेनीताल में प्रत्येक  साल 9 अगस्त को बाबा उत्तराखंडी के नाम से शहीदी मेले का आयोजन किया जाता है। उनकी याद में यहां एक समारक भी बनाया गया है।  

ब्यूरोक्रेट्स को बुलावा
बाबा उत्तराखंडी शहीद मेले को आयोजित करने वाली मेला समिति ने इस बार बेनीताल में 3 अगस्त से 9 अगस्त तक एक सप्ताह तक मेला आयोजित करने के निर्णय लिया है। इसके लिये 7 जुलाई को सिमतोली गांव में अहम निर्णय हेतु एक बैठक का आयोजन भी सुनिश्चित किया गया है।
इस बार समिति इस मेले में उत्तराखंड सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों को देख रहे स्थानीय एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनोद रतूड़ी, केरल के मुख्य सचिव रह चुके सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी पी.के मोहंती और अन्य सेवानिवृत्त आईआरएस अधिकारी श्री सेमवाल को क्षेत्रीय निवासी होने के कारण आमंत्रित करने का निर्णय लिया गया है।


बेनीताल में श्रीमद्भागवत कथा

मेला समिति से जुड़े और बाबा मोहन उत्तराखंड़ी के आंदोलन के गवाह रह चुके सोशल एक्टिविस्ट बीरेन्द्र सिंह मिंगवाल ने अपनी फेसबुक वॉल पर बेनीताल में इस बार श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन कराने की घोषणा की है, इसके लिये उन्हेंने सभी स्थानीय लोगों से उचित सहयोग की भी अपील की है। 

मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई

अंग्रेजों के जाने के बाद बेनीताल स्टेट का मालिकना हक 1945 में दिल्ली निवासी राजीव सरीन के पिता को मिला। बाद में इस भूमि को लेकर कानूनी विवाद शुरू हुआ और राजीव सरीन वर्सेस उत्तराखंड सरकार एवं अन्य के नाम पर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गयी। अगस्त 2011 में बेनीताल का अधिकतर भू-भाग उत्तराखंड सरकार को सौंपा गया। कुमांऊ एवं उत्तराखंड जमीदारी एबोलेशन एंड लेंड रिफॉर्म्स एक्ट1960 (17 ऑफ 1960), यूपी वन अधिनियम, कुल्जार एक्टयूपी प्राइवेट फॉरेस्ट एक्ट 1948वन अधिनियम आदि कानूनों के तहत सुनवाई हुई। अंत में शीर्ष अदालत के फैसले के बाद उत्तराखंड सरकार द्वारा राजीव सरीन को भूमि का उचित मुआवजा दिया गया, लेकिन कुछ मुद्दों को लेकर कानूनी विवाद अभी भी जारी है। बेनीताल के कुछ हिस्से पर अब सरकार और कुछ हिस्से पर राजीव सरीन का अधिकार है।







बेनीताल का क्षेत्रफल, जनसंख्या और साक्षरता

बेनीताल का कुल क्षेत्रफल 800-900 हेक्टेयर या लगभग 1600 एकड़ के आसपास बताया जाता है।उत्तराखंड शासन के अनुसार 2011 की जनगणना के दौरान में बेनीताल में केवल 4 घर मौजूद हैं। यहां 11 पुरूष और 12 महिलाओं के साथ यहां की जनसंख्या कुल 23 है। जिसमें 2 शैय्डूल कास्ट बालिगों के अलावा  4 बच्चे भी शामिल हैं।यहां रहने वाले लोगों की कुल साक्षरता दर 94.12 प्रतिशत है। जिसमें पुरूष 100 प्रतिशत और महिला साक्षरता दर 87.50 प्रतिशत है।


वक्त की मांग
बेनीताल के पास आज भी अथाह नैसर्गिक सौंदर्य, प्राकृतिक संसाधन, पर्यटन, सुदृढ़ आर्थिकी समेत वानिकी के कई अनमोल तोहफे हमारे लिये बचे हुए हैं, लेकिन लंबे समय से सरकार की उपेक्षा के कारण बेनीताल की ऐतिहासिक पहचान और प्राकृतिक सौंदर्य दोनों खतरे में है और वक्त की मांग है कि इसे हर कीमत पर बचाया और संवारा जाए।

(ब्लॉगर एवं लेखक सुभाष रतूड़ी मूल रूप से उत्तराखंड निवासी है और दिल्ली में बतौर पत्रकार कार्यरत है। सुभाष कई प्रमुख मीडिया समूहों में प्रबंध संपादक समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वे पत्रकारिता एवं जनसंचार में प्रथम श्रेणी में पोस्ट ग्रेजुएट व  बैच टॉपर है  और कई तरह की सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए है )   

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12 comments:

Jay Prakash Dyundi said...
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Jay Prakash Dyundi said...

भाई जी प्रणाम!बहुत सुन्दर लेख ,वास्तव में बेनीताल एक बहुत ही सुन्दर पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो सकता है,और रोजगार के अवसर खोल सकता है केवल राजनेतिक इच्छाशक्ति की आवयश्कता है।आपका हमेशा की तरह बहुत सुंदर लेख है। चाचाजी शिव प्रसाद रतूडी का समाज व गाँव के प्रति सकारात्मक सोच व योगदान के लिए हार्दिक अभिनन्दन।

Unknown said...

बहुत सुंदर लेख

Unknown said...

बहुत बहुत आभार जय..

Prakash said...

बहुत सुंदर विस्तृत ज्ञानपूर्ण लेख..👍

Unknown said...

❣️

Dwarika chamoli said...

बेनिताल जैसे नैसर्गिग स्थान के विषय मे विस्तारपूर्वक, बेहद ही सटीक व सुंदर शब्दों के साथ रखना आपकी लेखन कला को दर्शाता है। चाय बागान व काफलों के बगीचों के बीच स्थित इस स्थान की एक समय चर्चा खूब हुआ करती थी। यहां जो तालाब था उसका पानी सात रंगों का दिखाई देता था। बुग्यालों से सजा यह स्थान बड़ा ही रमणीक है व धार्मिक स्थल आदिबद्री से काफी नजदीक है। पर्यटकों के लिए यह स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं। आदिबद्री से 5 किलोमीटर पैदल मार्ग मे प्रकृति का खजाना बिखरा पड़ा है जिसकी अनुभूति से थकान महसूस ही नहीं होती। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं व स्वर्गिक लुफ्त उठाना चाहते हैं तो आजकल बेनिताल का सौंदर्य देखने से न चुकें
सुभाष रतूड़ी जी ने इस स्थान के धार्मिक व प्राकृतिक गुणों के विषय मे बताकर जो जागृति का काम किया है उसके लिए उन्हें साधुवाद।

Anonymous said...

Bahut badiya chacha ji....
Regards - Deepak raturi

Jyoti said...

Bahut Shandar Chachaji Prakriti ki Shant sundarta ko Bayan karne ke liye bahut Sundar shabdon ka istemal Kiya Hai

Jyoti said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

बहुत sundar lekh ji

Sudarshan Chauhan said...

यह जगह वाकई बहुत खूबसूरत है, इसे ज्यादा प्रसिद्ध मत करो नहीं तो बाहर वाले आ के यहां गंदगी मचा देंगे जैसे मसूरी का हाल किया है.16 घंटों का गाड़ियों का जाम और kuरा कचरा अलग.