सुभाष रतूड़ी
- मौत को नानी ने कभी पीठ नहीं दिखायी, बल्कि उसका जमकर मुकाबला किया। लाचार और बेजान सी देह को वह हर बार दृढ और जीवंत बनाने की कोशिश करती रही..
नानी का जितना ज्यादा और घनिष्ट सानिध्य मुझे और मेरे भाइयों को प्राप्त हुआ, अमूमन वह हर किसी को नसीब नहीं होता। मेरी मां तब केवल 4-5 साल की ही रही होगी, जब मेरे नाना उसे अनाथ छोड़कर स्वर्ग सिधार गये थे। इकलौती संतान होने के नाते मां की शादी के बाद नानी भी अकेली हो चली थी। ढलती उम्र को देखते हुए मेरे पिता ने नानी को हमेशा के लिये अपनी बेटी के पास हमारे गांव रतूड़ा बुला लिया था। तबसे नानी हमारे साथ ही रहने लगी। तब नानी की उम्र कुछ 60 के आसपास रही होगी। पिछले तीन दशक से अधिक समय से नानी हमारे साथ ही रही और केवल मेरी या हमारी नहीं बल्कि पूरे गांव की नानी बन गयी। नानी ने पौतों के रूप में हमें खूब लाड़-प्यार किया, लेकिन उतनी ही डांट-डपट भी। नानी बड़ी सख्त और अनुशासन प्रिय रहीं। वह बहुत कम और खास मौकों पर ही मुस्कराती और हंसती। लेकिन उसकी रौनकदार हंसी और मुस्कराहट देखने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को नसीब हुआ। नानी आज अपने जीवन के शताब्द वर्ष से महज दो वसंत दूर है लेकिन उसके जीवन की लताएं बुरी तरह मुरझाई हुई है। सावन-भादो के इस माह में उसके जीवन में आया यह पतझड़ कई मायनो में अबूझ है। महान वट वृक्ष की उसकी जीर्ण-शीर्ण काया में अब किसी हरित और ऊर्जावान नवांकुर के फूटने की कोई उम्मीद नही है। वक्त के सामने उसको नतमस्तक होकर अब जमींदोज होना होगा। उसके जीवन जड़ें जमीन छोड़ चुकी है।
नानी
अब न तो डांट-डपट कर सकती है और न ही हंसी-खुशी जता सकती है। अक्सर बिना बात के भी
‘बड़बड़’ और हर बात पर रोक-टोक करने वाली नानी के जीवन की सांझ अब दूर क्षीतिज
से परावर्तित हो रही कुछ रश्मियों पर ही टिकी है, जो किसी भी वक्त ओझल हो सकती है।
वह ऐसी गहरी खामोशी में है, जो अब कभी नहीं टूटेगी। वह धीरे-धीरे चिर निंद्रा में विलीन
होने की ओर बढ़ रही है। किसी भी पल, किसी
भी दिन वह उस अनंत यात्रा पर निकल जायेगी, जहां
से फिर वह कभी नहीं लौटेगी। लेकिन आश्चर्य यह कि ऐसा पहली बार नही है, जब नानी जीवन के अंतिम पड़ाव से पहले
कुछ देर के लिये इस तरह का ‘विश्राम’ कर रही हो। वह इस यथार्थ के एहसास से
पहले भी जूझ चुकी है और अब भी जूझ रही है। पिछले तीन-चार सालों में ऐसे वक्त कई
बार आ चुके है। दो-तीन बार तो ऐसा भी हुआ, जब
मत्यु सैय्या पर लैटी नानी को देखने और उसके अंतिम दर्शन के लिये कई लोग पहुंचे।
चूंकि, मैं गांव से दूर दिल्ली में रहता हूं, इस नाते मेरे बड़े-बुजुर्गों, परिजनों और शुभचिंतकों ने मुझे भी तब
नानी का आशीर्वाद लेने के लिये घर आने की सलाह दी, लेकिन कुछ विमर्श और परिस्थितियों के बाद मैं तब गांव नहीं गया। मेरा
अंदाजा था कि नानी मौत को मात दे देगी, क्योंकि
उसके अंदर गजब की जीवटता और जिजीविषा है। मेरा मानना था कि जीवन जीने की उसकी
संतृप्ति पूर्ण नहीं हुई है। मेरा अंदाजा तब सही भी निकला और नानी फिर से सामान्य
जीवन के चाल-चलन में लौट आयी। लेकिन इस बार आखिरी वक्त समझकर मैं नानी को देखने
स्वैच्छा से गांव गया और जीवन के प्रति नानी की प्रबल इच्छा देखकर फिर वापस लौट
आया हूं। उसकी जीवटता पर सोचने, विचारने, लिखने और पीछे पलटकर देखने को मजबूर हो
गया हूं। नानी जायेगी, जरूर जायेगी लेकिन तब जब वह चाहेगी। जब वह लड़कर हारेगी।
मौत
से नानी का सामना पहले भी कुछ मर्तबों पर हो चुका है। देहरी पर खड़ी मौत को नानी
ने इन मर्तबों पर कभी पीठ नहीं दिखायी, बल्कि
उसका जमकर मुकाबला किया। लाचार और बेजान सी देह को वह हर बार दृढ और जीवंत बनाने
की कोशिश करती रही है। मुझे लगता है कि जीवन में लगातार जूझते रहने के अभ्यास ने
ही नानी को हर बार मानसिक और आत्मिक मजबूती दी। नानी ने जीवन की निरंतरता के लिये
किये जाने वाले कठोर प्रयासों से कभी हार नहीं मानी। वह हमेशा मेहनतकश और संघर्ष
करने वाली रही है। हर चुनौती का डटकर सामना करना उसका स्वभाव रहा है। लगता है उसके
इसी कठोर स्वभाव से मौत को भी उससे उलझने में मजा आ रहा है। उलझन और विपदा से भरे
जीवन को नानी ने जिस तरीके से सुलझाया और आसान बनाया वह हर किसी के बस की बात नहीं
होती है। भरी जवानी में ही अस्वस्थ नाना मेरी नानी का साथ छोड़ चुके थे। उनके पंचतत्व
में विलीन होने के कुछ महीनों बाद ही नानी अपने असाध्य और कठिन जीवन पथ को साधने
में जुट गयी। नानी ने खुद और अपनी बेटी की परवरिश के लिये बंजर जमीन को उपजाऊ
खेतों में तब्दील किया। गधेरे से नाला निकालकर हर खेत-खलिहान और उसकी मेंढ़ तक
पानी पहुंचाया। खूब अनाज और साग-सब्जी उगाई। माटी-माटी को उपजाऊ बनाया। ताउम्र
गाय-भैंस पालकर घी-दूध और मक्खन बेचा। बचा-खुचा, बासी-कुबासी खुद खाया। नमक जैसी
जो चीज उपजाऊ नहीं थी, उसे अनाज और साग-सब्जी के विनिमय से पाया। वह अपनी लाचारी
और तंग कथा-व्यथा को अथक श्रम से मजबूती देती रही। नाना के जाने के बाद पूरी दुनिया
में एक शिशु कन्या ही उसके नीरस जीवन का अकेला रस था। उसके और खुद के लिये वह हमेशा
जूझती रही। खेती-किसानी करती रही, लेकिन कभी किसी से दया की भीख नहीं मांगी। अकेली
नानी ने अपनी बेटी (मेरी मां) के भरण-पोषण के लिये एक मेहनतकश और स्वाभिमानी पिता
की भूमिका भी निभाई।
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| दो साल पहले नानी |
नानी
के अलावा पूरे मातृकुल का इतिहास भी काफी जुझारु और अनिश्चितताओं से भरा रहा।
दुर्भाग्य से नाना भी दुनिया में अकेले रह गये थे। वह भी मेरी मां की ही तरह अपने
मां-बाप की इकलौती संतान थी। बाल्यकाल में ही उनकी भी मां चल बसी थी। मेरे परनाना
(मां के दादा) वर्तमान उत्तराखंड के टिहरी जिले के ब्राह्मण (सती) परिवार से आकर
चमोली जिले के कोटी गांव में शादी के बाद बतौर घरजवांई बस गये थे। लेकिन पुत्र के
रूप में मेरे नाना को जन्म देने के कुछ ही सालों बाद उनकी मां इस दुनिया से चल
बसी। शादी के 3-4 वर्षों बाद ही अपनी बेटी की मौत से दुखी परिजनों ने सोचा कि मेरे
जवान परनाना जरूर दूसरी शादी करेंगे, ऐसे
में उनकी संपत्ति पर किसी गैर का कब्जा हो जायेगा। इसके अलावा उन्होंने परनाना को
अपने लिये शुभ नहीं माना और रिश्ता तोड़ सा डाला। ससुरालियों के बदले स्वभाव और
बिगड़े हालातों के बीच उन्होंने अपने दुध मुंहे बच्चे के साथ घरजंवाई वाला कोटी
गांव-घर छोड़ दिया और अपने इकलौते पुत्र (मेरे नाना) के साथ सुख-दुख के भाव और
उम्मीदों की पोटली लिये वापस टिहरी अपने मूल गांव लौटे गये। लेकिन तब तक ईश्वर
उनके भाग्य में संघर्ष और दुख भरे जीवन की पटकथा लिख चुका था। टिहरी में उनकी मां
की मौत हो चुकी थी। पिता पहले से ही स्वर्गवासी थे। परिवार में बचे अन्य दो भाइयों
में भी शादी के बाद जमीन-जायदाद, मकान
आदि का बंटवारा हो चुका था। समय और परिस्थितियों के साथ सभी इंसानों के व्यवहार बदल
चुके थे। भातृभाव खत्म और इंसानियत लाचार सी हो चुकी थी।
अपने
पुश्तैनी गांव टिहरी में रहने की सारी संभावनाएं खत्म होते देख मेरे परनाना अपने
बेटे को लेकर फिर वापस चमोली लौट आये। कई जगहों पर उन्होंने स्थाई ठिकाने की तलाश
की। आखिरकार अलकनंदा नदी के किनारे बसे लंगासू के दूसरे छोर पर स्थित गिरसा गांव
के नर्सिंग मंदिर में पूजा करने वाले एक पुजारी-साधु संग उन्हें अपने बच्चे के साथ
शरण मिली। दयालु ग्रामीणों समेत साधु बाबा ने उनकी भरपूर मदद की। साधु ने नाना की
कमर्ठता और पुत्र के प्रति उनके मोह को देखते हुए उन्हें मंदिर के नीचे स्थित अपने
आवास के आसपास ही खेती-बाड़ी और घर बनाने के लिये बंजर जमीन दे दी। नाना दिन भर उस
बंजर और पठारनुमा जमीन को खेती-बाड़ी के योग्य बनाते और शाम को अबोध बालक के साथ
पुजारी के घर पर रहते। नाना दिन भर उन्हीं साधु के संग ही रहते। नाना बड़े हो रहे
थे लेकिन उनके पिता का स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा था। इसके बावजूद भी उन्होंने
लंगासू स्कूल में नाना का दाखिला करवाया। तब गिरसा और लंगासू के बीच अलकनंदा नदी
पर एक पुल था, जो बाद में बिरही बाढ़ के दौरान टूट
गया और जिलासु के पास नया पुल बनाया गया। नाना उसी पुराने पुल से बेटे को स्कूल
छोड़ने जाते और छुट्टी होने तक लंगासू की तरफ पुल के किनारे या खेतों में बैठे
बेटे का इंतजार करते रहते। खेती किसानी के बीच उन्होंने अपने बेटे को कुछ दर्जे तक
की पढ़ाई भी कराई।
नाना
बड़े हो रहे थे लेकिन उनके पिता का स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा था। कुछ सालों
बाद परनाना भी चल बसे। लेकिन तब तक साधु द्वारा दान की गयी जमीन पर वो अपना घर और
खेती बाड़ी जमा चुके थे। नाना अब साधु के गले पड़ चुके थे। बूढ़े हो रहे साधु बाबा
को बड़े हो रहे नाना के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पूरा आभास था। ठीक-ठाक उम्र
देखकर नाना की शादी करवा दी गयी। लेकिन लड़की वालों (नानी पक्ष) को नाना का साधु
की जमीन और उनके वहां रहना पसंद न था इसलिये शादी के समय नानी के घरवालों ने नाना
के नाम एक जमीन दाननामा लिखवा दी, जो
गिरसा से थोड़ी ही दूर पर श्यमार नामक जगह पर मौजूद थी। इसके अलावा जिलासू गांव
में नाना-नानी को रहने के लिये एक कोठरी भी नानी के घर वालों ने दे दी थी।
शादी
के बाद नाना-नानी ने गांव में मिली कोठरी में रहने के साथ-साथ दान में मिले श्यमार
में भी एक घास-फूस की झोपड़ी भी तैयार कर दी थी। मेहनती परंपरा को आगे बढ़ाते हुए
नाना-नानी ने सालों से बेजान और उजाड़ श्यमार को कुछ छोटे-बड़े खेतों का रूप दे
दिया। इस काम में नानी ने भी उनका खूब साथ दिया। अब माता-पिता की छत्र-छाया से वंचित
दंपति को एक-दूसरे के रूप में बड़ा सहारा और पूरा खुशहाल संसार मिल चुका था। वे
उतनी ही उपज उगाते जितनी उन दो प्राणियों की जरूरत थी। शादी के तीन-चार वर्षों बाद
ईश्वर ने उनके जीवन को नया विस्तार दिया था। अब वे दो से तीन हो चुके थे। मेरी मां
के रूप में बेटी पाकर उनकी खुशियां सातवें आसमान पर थीं। उनका जीवन धन्य सा हो गया
था। बेटी के लाड़ ने नाना को पूरी तरह बदल दिया था। उनके जीवन पर साधु का गहरा
प्रभाव था। वह तीर्थों के नाम से परिचित थे, इसलिये
उन्होंने अपनी बेटी को मथुरा नाम दे दिया।
किसी
बात के लिये राजी करने या पटाने में नानी बहुत बहुत टेढी खीर रही है। लेकिन एक बार
काफी अनुनय-विनय के बाद नानी ने मुझे बताया था कि मां के जन्म के बाद मेरे नाना की
पूरी दिनचर्या ही बदल गयी थी। बेटी को लाड़-प्यार करने और खेलने-खिलाने के लिये
उन्होंने खेतों में काम करना तक छोड़ दिया था। बेटी के प्रति नानी के प्यार की भी
बानगी देखिये। नाना जब भी अपनी बेटी से खेलते, उसे
पुचकारते तो नानी उन्हें यह कहकर टोक देती कि बच्ची को परेशान कर रहे हो, उसे दर्द हो रहा होगा, आदि-आदि..। और नाना भी ऐसा समझकर बेटी
संग खेलना छोड़ देते। गिरसा और जिलासू के बीच स्थित एकांत श्यमार में तीनों का
जीवन खुशियों से बीत रहा था।
श्यमार
के तीर बहने वाली अलकनंदा नदी ही इन तीन प्राणियों के जीवन उल्लास को देखने वाली
एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी थी। सावन-भादो के बाद घिरे-भरे मेघों के रूठ जाने से
अलकनंदा के जल-तल और वेग में गिरावट की तरह ही श्यमार की रौनक भी अचानक घटने लगी
थी। प्रकृति कोई निष्ठुर मजाक करेगी, इसका
अंदाजा कोई नहीं लगा सका। मेहनती कृषक होने के बावजूद भी नाना रोगग्रस्त हो गये और
उनकी सेहत लगातार गिरती गयी। प्रकृति का चक्र यदि अनुकूल न हो तो मनुष्य उसे
कुचक्र कहता है। नाना भी कुछ इसी तरह वक्त के कुचक्र में फंस गये और असमय काल का
ग्रास बन गये। तब मेरी मां की उम्र महज 4-5 साल रही होगी। क्रूर काल ने तब केवल एक
जीवन नहीं छीना था। बल्कि एक अबोध कन्या के सर से बाप का साया, उसका प्यार-दुलार और एक युवती के जीवन
से उसका पति, उसका सिंदूर और श्रंगार भी छीना था। इस
क्रूर काल ने अभी-अभी नई-नई डगर थामे एक मां-बेटी के जीवन को अनिश्चितताओं से घेर
दिया था। काल के इस कुचक्र ने सबसे ज्यादा दुख और चुनौतियां मेरी नानी के सामने
खड़ी की थी। उसका जीवन दो विपरीत धाराओं में बंट-कट चुका था। उसके सामने एक तरफ
पति की मौत का गहरा दुख तो दूसरी तरफ अबोध कन्या के जीवन का हर्षोल्लास था।
नानी
के लिये इस काल का हर पहर घोर अंधकार और भारी अनिश्चितताओं से भरा था। युवावस्था
में ही विधवा हुई नानी पर दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा था, जिसकी जद में आकर इंसान का पगलाना
स्वाभाविक और जीवन का चुनाव करना मुश्किल होता है। नानी के लिये जीवन की निरंतरता
को त्यागना और जीने के विकल्प को ठुकराना तब ज्यादा आसान था। तीनों बहनों में
दूसरे नंबर की ‘अपशगुन’ नानी को तब उसके घर-समाज से ताने-उलाहने भी खूब मिले। उसकी पारिवारिक
पृष्ठभूमि भी काफी तंगहाल थी। श्यमार में अकेली बैठी नानी तब मौत के लिये कभी
अलकनंदा की तरफ ताकती तो कभी अपनी अबोध बेटी की तरफ। नानी को तब मौत और जीवन के
विकल्प में से एक का चुनाव करना था क्योंकि उसके सामने ‘आगे आग पीछे बाघ’ की स्थिति थी। लेकिन नानी किसी और माटी
की बनी थी। उसने अपनी अबोध बेटी को देख उसके लिये जीने का मन बन लिया था। विधाता
ने भले ही उसे एक अबला नारी का जीवन और दुर्बल भाग्य दिया था लेकिन उसने विधाता के
लिखे भाग को चुनौती देने की ठान ली थी। वह खुद ही गहरे अवसाद और शोक से उबरी। खुद
ही अपने मन को सांत्वना दी और असाध्य जीवन को साधने में जुट गयी। सबला बनने की
उसकी जिद ने उसके अंदर एक अलग सी ऊर्जा का संचार कर दिया था। अनपढ़ लेकिन कर्मशील
नानी ने अपने हाथों अपने भाग्य का पुनर्निर्माण करने की ठान ली थी। श्यमार का आंचल
फिर हरी भरी फसलों से लहलहाने लगा। अब वहां फसल के अलावा कई तरह की साग-सब्जियां
और फल-फूल भी उगने लगे थे। बेटी के लिये जीने की ख्वाइश ने नानी को एक ऐसी अजेय
वीरांगना बना डाला, जिसका संघर्ष हमेशा खुद से रहा। नानी
के पास हमेशा कर्म और शरीर नामक दो ही साधन रहे, जिसके बल पर उसने क्रूर काल की गुलामी करने से इंकार किया। इन दो
साधनों से नानी ने कई युद्ध जीते। लेकिन
होनी ने अब नानी के इन दो अचूक साधनों को कुंद कर दिया है। वह अब साधनहीन
है। वह ज्यादा बोल तो नहीं सकती, लेकिन
उसे देखकर लगता है कि वह काल के सामने आत्मसमर्पण करने के मूड़ में नहीं है। उसे
लड़कर हारना पसंद है लेकिन पीठ दिखाकर बैठ जाना नहीं। विवश, लाचार और निहत्थी होने का बावजूद भी वह
जीवन शत्रु से अपना अंतिम युद्ध बखूबी लड़ रही है। वक्त की चालबाजी ने उसके दो
मजबूत साधनों को छीना है। नानी का हारना तय है। उसके हार की घोषणा होनी बाकी है।
लेकिन मैं उसकी हार को हमेशा जीत मानूंगा। क्योंकि वह ऐसे नीति नियंता से लड़ रही है, जिसकी जीत पूर्व निर्धारित है। उससे जूझना ही जीत है। नानी की हार का मुझे कोई शोक, क्षोभ और मलाल नहीं होगा। मुझे उसकी जीवंतता
प्रेरित और गौरवान्वित करती रहेगी।
(ब्लॉगर एवं लेखक सुभाष रतूड़ी मूल रूप से उत्तराखंड निवासी है और दिल्ली में बतौर पत्रकार कार्यरत है। सुभाष कई प्रमुख मीडिया समूहों में प्रबंध संपादक समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वे पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा एवं जनसंचार में प्रथम श्रेणी पोस्ट ग्रेजुएट व बैच टॉपर है और कई तरह की सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए है )
(ब्लॉगर एवं लेखक सुभाष रतूड़ी मूल रूप से उत्तराखंड निवासी है और दिल्ली में बतौर पत्रकार कार्यरत है। सुभाष कई प्रमुख मीडिया समूहों में प्रबंध संपादक समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वे पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा एवं जनसंचार में प्रथम श्रेणी पोस्ट ग्रेजुएट व बैच टॉपर है और कई तरह की सामाजिक गतिविधियों से जुड़े हुए है )


2 comments:
नानी जी को सादर प्रणाम!नानी वास्तव में पूरे गांव की नानी है।आपकी लेखन छमता को पुनः सलाम ! नानी के बारे में आज पहली बार सही तरीके से मालूम हुआ ।नानी की यादें सदा स्मृतियों में बसी रहेंगी।नानी वास्तव में सूपर नानी हैं।
Very sttrugalful life
Nani's story she was very brev an honestly in life
One shanti
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